27 जनवरी 2025... उत्तराखंड ने एक ऐसा फैसला लागू कर दिया, जिसकी नींव भारत के संविधान में करीब 75 साल पहले रख दी गई थी... लेकिन जिसे कोई भी केंद्र सरकार पूरे देश में लागू नहीं कर सकी।** नाम था—Uniform Civil Code! यानी शादी हो... तलाक हो... गुजारा-भत्ता हो या विरासत में मिलने वाली संपत्ति... आपका धर्म अलग हो सकता है, आपकी पूजा-पद्धति अलग हो सकती है... लेकिन इन नागरिक मामलों में कानून समान हो। सुनने में यह सिर्फ एक कानून, एक व्यवस्था की कहानी लगती है... लेकिन अगर मामला इतना सीधा था, तो संविधान में Article 44 होने के बावजूद UCC सात दशकों तक फाइलों और राजनीतिक बहसों में क्यों फंसा रहा? क्योंकि इसके पीछे सिर्फ कानून नहीं... धर्म, राजनीति, महिलाओं के अधिकार और वोटबैंक—चारों की एक ऐसी लड़ाई है, जिसने 1985 में राजीव गांधी की प्रचंड बहुमत वाली सरकार तक को अपना कदम पीछे खींचने पर मजबूर कर दिया था। और अब कहानी ने एक बार फिर करवट ली है... उत्तराखंड इसे लागू कर चुका है, दूसरे राज्यों में इसकी तैयारी और बहस आगे बढ़ रही है... और केंद्र की BJP सरकार लगातार पूरे देश के लिए UCC की बात कर रही है। तो सवाल है—क्या उत्तराखंड सिर्फ एक शुरुआत है? क्या राज्यों में तैयार हो रहा UCC मॉडल आगे चलकर पूरे भारत का मॉडल बन सकता है? और अगर ऐसा हुआ... तो करोड़ों भारतीयों की शादी, तलाक और विरासत से जुड़े नियम आखिर कैसे बदल जाएंगे? लेकिन इन सवालों का जवाब समझने के लिए हमें 2025 से नहीं... बल्कि उस दौर में वापस जाना होगा, जब भारत आज़ाद भी नहीं हुआ था।
और इसकी कहानी शुरू होती है साल 1772 से... जब भारत पर ईस्ट इंडिया कंपनी का नियंत्रण लगातार बढ़ रहा था। अंग्रेजों के सामने एक बड़ी चुनौती थी—इतने विशाल देश को आखिर किस कानून से चलाया जाए? इसलिए धीरे-धीरे अपराध और प्रशासन जैसे कई मामलों में एक जैसी कानूनी व्यवस्था बनाने की कोशिश शुरू हुई... लेकिन शादी, तलाक, विरासत और धार्मिक मामलों को अंग्रेजों ने छुआ तक नहीं। 1781 की व्यवस्था में साफ किया गया कि हिंदुओं के ऐसे मामलों का फैसला उनके Personal Law के अनुसार होगा और मुसलमानों का उनके Personal Law के अनुसार। यानी जिस भारत में आगे चलकर Criminal Law जैसे क्षेत्रों में एक common legal framework तैयार हुआ... उसी भारत में परिवार से जुड़े नागरिक मामलों में कानून धर्म के आधार पर अलग-अलग बने रहे। 1833 के Charter Act के बाद कानूनों को codify करने की प्रक्रिया और तेज हुई, पहला Law Commission बना और आगे चलकर इसी प्रक्रिया से Indian Penal Code जैसे कानून निकले... लेकिन Personal Laws की अलग व्यवस्था बनी रही। और यहीं इस पूरी कहानी का पहला बड़ा contradiction पैदा होता है—अगर अंग्रेज पूरे भारत के लिए अपराध का कानून एक कर सकते थे... तो शादी और विरासत के कानून एक क्यों नहीं किए? क्योंकि उनके सामने सिर्फ कानून बनाने का सवाल नहीं था... करोड़ों भारतीयों के धर्म और परंपराओं में हस्तक्षेप करने का राजनीतिक खतरा भी था। और यही अलग-अलग Personal Laws की व्यवस्था अंग्रेज भारत में छोड़कर गए... लेकिन 1947 में जब अंग्रेज चले गए, तो नए भारत के संविधान निर्माताओं के सामने वही पुराना सवाल एक बार फिर खड़ा था—क्या आज़ाद भारत में भी एक ही देश के नागरिकों के Civil Rights धर्म के आधार पर अलग-अलग रहेंगे?
और यहीं से UCC की असली लड़ाई शुरू होती है... तारीख थी 23 नवंबर 1948। संविधान सभा में उस दिन Draft Constitution के Article 35, यानी आज के Article 44, पर बहस हो रही थी—जिसमें कहा गया था कि राज्य पूरे भारत में नागरिकों के लिए एक Uniform Civil Code सुनिश्चित करने का प्रयास करेगा। लेकिन जैसे ही यह प्रस्ताव सामने आया, सभा दो हिस्सों में बंटी दिखाई दी। मोहम्मद इस्माइल साहिब, नज़ीरुद्दीन अहमद, महबूब अली बेग और हुसैन इमाम जैसे सदस्यों ने इसका विरोध किया; उनकी चिंता थी कि विवाह, तलाक और विरासत केवल civil matters नहीं, बल्कि समुदायों की धार्मिक और सांस्कृतिक परंपराओं से भी जुड़े हैं, इसलिए राज्य को Personal Law में जबरन हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए। यहां तक प्रस्ताव आया कि किसी समुदाय को उसका Personal Law छोड़ने के लिए मजबूर न किया जाए। लेकिन दूसरी तरफ के.एम. मुंशी और अल्लादी कृष्णस्वामी अय्यर जैसे सदस्य इसके समर्थन में खड़े थे। मुंशी का तर्क बेहद महत्वपूर्ण था—अगर Personal Law को हमेशा धर्म का अभिन्न हिस्सा मानकर बदलाव से बाहर रखा गया, तो महिलाओं को समान अधिकार देने जैसे सामाजिक सुधार आखिर होंगे कैसे? और फिर इस बहस में खड़े हुए संविधान की Drafting Committee के Chairman डॉ. बी.आर. आंबेडकर। आंबेडकर ने एक दिलचस्प सवाल उठाया—भारत में Criminal Law, Transfer of Property और Negotiable Instruments जैसे कई क्षेत्रों में पहले से बड़े पैमाने पर common laws मौजूद हैं; फिर विवाह और उत्तराधिकार जैसे क्षेत्रों को हमेशा अलग क्यों रखा जाए? लेकिन यहां एक ऐसी बात भी थी जिसे आज की UCC debate में अक्सर छोड़ दिया जाता है—आंबेडकर UCC के समर्थक जरूर थे, मगर उन्होंने यह भी कहा कि भविष्य की संसद शुरुआत में इसे स्वैच्छिक रूप से लागू करने जैसी व्यवस्था अपना सकती है। यानी संविधान निर्माताओं ने UCC का रास्ता बंद नहीं किया... लेकिन इसे उसी समय हर नागरिक पर अनिवार्य भी नहीं बनाया। और आखिरकार यही compromise संविधान के Article 44 में दर्ज हुआ—UCC को Fundamental Right नहीं, बल्कि Directive Principle of State Policy बनाया गया। यानी लक्ष्य संविधान में लिख दिया गया... लेकिन उसे हासिल कब और कैसे करना है, यह आने वाली सरकारों पर छोड़ दिया गया। और शायद किसी ने उस वक्त नहीं सोचा होगा कि यही एक अधूरा Article... आने वाले दशकों में भारत की सबसे विस्फोटक राजनीतिक बहसों में से एक बनने वाला था।
लेकिन शाह बानो तक पहुंचने से पहले, यहां एक चीज समझना बहुत जरूरी है... क्योंकि संविधान लागू होने के बाद भारत सरकार ने UCC को पूरे देश में लागू तो नहीं किया, लेकिन Personal Laws में बदलाव की शुरुआत जरूर कर दी थी। और इसका सबसे बड़ा उदाहरण था—Hindu Code reforms। 1950 के दशक में जवाहरलाल नेहरू की सरकार के दौरान एक के बाद एक कानून आए—Hindu Marriage Act 1955, Hindu Succession Act 1956, Hindu Minority and Guardianship Act 1956 और Hindu Adoptions and Maintenance Act 1956। इन कानूनों ने हिंदुओं के विवाह, तलाक, उत्तराधिकार और गोद लेने जैसे मामलों को बड़े पैमाने पर codify और reform किया; और इन कानूनों में “Hindu” की कानूनी परिभाषा के तहत बौद्ध, जैन और सिख भी कई प्रावधानों के दायरे में आए। लेकिन यहां एक बड़ा सवाल खड़ा हुआ—अगर सरकार Personal Law में सुधार कर सकती थी, तो फिर यही प्रक्रिया सभी समुदायों के लिए एक common civil code तक क्यों नहीं पहुंची? इसका जवाब तत्कालीन सामाजिक और राजनीतिक परिस्थितियों में छिपा था। Hindu Code reforms का खुद देश के भीतर जबरदस्त विरोध हुआ था; यहां तक कि राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने प्रस्तावित Hindu Code Bill के कई पहलुओं पर गंभीर आपत्ति जताई थी। आखिरकार एक विशाल comprehensive code की जगह अलग-अलग Acts के जरिए reforms आगे बढ़े। लेकिन दूसरे धार्मिक समुदायों के Personal Laws को उसी तरह एक common code में नहीं बदला गया। नतीजा यह हुआ कि संविधान का Article 44 किताब में मौजूद रहा... जबकि भारत का Personal Law system अलग-अलग कानूनी धाराओं में चलता रहा। और अगले करीब तीन दशकों तक UCC कोई ऐसा मुद्दा नहीं बना जिसने पूरे देश की राजनीति को हिला दिया हो... लेकिन 1985 में मध्य प्रदेश के इंदौर से आया एक मामला Supreme Court पहुंचा—और एक 62 साल की तलाकशुदा महिला की गुजारा-भत्ते की लड़ाई ने Article 44 को संविधान के पन्नों से निकालकर सीधे देश की राजनीति के बीच खड़ा कर दिया। उस महिला का नाम था—शाह बानो बेगम।
कहानी की शुरुआत 1978 से होती है। इंदौर की रहने वाली शाह बानो बेगम, जिनकी उम्र उस समय करीब 62 साल थी, को उनके पति और वकील मोहम्मद अहमद खान ने लंबे वैवाहिक जीवन के बाद घर से अलग कर दिया था। पांच बच्चों की मां शाह बानो के पास नियमित आय का साधन नहीं था, इसलिए उन्होंने अदालत का दरवाजा खटखटाया और CrPC की धारा 125 के तहत अपने पति से गुजारा-भत्ता मांगा। लेकिन इसी दौरान उनके पति ने उन्हें तलाक दे दिया और तर्क दिया कि मुस्लिम Personal Law के तहत इद्दत की अवधि और मेहर से जुड़ी जिम्मेदारी पूरी होने के बाद उन पर लगातार maintenance देने का दायित्व नहीं रह जाता। मामला निचली अदालत से होते हुए Supreme Court पहुंचा और 23 अप्रैल 1985 को पांच जजों की Constitution Bench ने शाह बानो के पक्ष में फैसला सुनाया। Court का मूल तर्क था कि Section 125 कोई धार्मिक कानून नहीं, बल्कि ऐसा secular provision है जो खुद का भरण-पोषण न कर पाने वाली पत्नी पर लागू हो सकता है, चाहे उसका धर्म कुछ भी हो। लेकिन फैसले में एक और बात लिखी गई जिसने इस maintenance dispute को सीधे राष्ट्रीय राजनीति से जोड़ दिया—Supreme Court ने Article 44 का उल्लेख करते हुए कहा कि देश में Uniform Civil Code की दिशा में प्रगति न होना चिंता का विषय है। और यहीं से मामला बदल गया। कई मुस्लिम धार्मिक और राजनीतिक संगठनों ने फैसले का विरोध किया; उनका तर्क था कि Supreme Court का फैसला Muslim Personal Law में हस्तक्षेप कर रहा है। दूसरी तरफ महिला अधिकारों और समान नागरिक अधिकारों के समर्थकों ने इसे gender justice की बड़ी जीत माना। अब दबाव उस सरकार पर था जिसके पास लोकसभा में 400 से ज्यादा सीटों का ऐतिहासिक बहुमत था—राजीव गांधी सरकार। और 1986 में सरकार ने Muslim Women (Protection of Rights on Divorce) Act पारित कर दिया। इस कानून ने तलाकशुदा मुस्लिम महिलाओं के maintenance के लिए अलग statutory framework बनाया और इसे शाह बानो फैसले के प्रभाव को सीमित करने वाले कदम के रूप में व्यापक रूप से देखा गया। लेकिन इसका राजनीतिक परिणाम शायद कानून से भी बड़ा था—विपक्ष ने राजीव गांधी सरकार पर minority appeasement का आरोप लगाया, महिला अधिकारों को लेकर सवाल उठे और UCC पहली बार बड़े पैमाने पर राष्ट्रीय राजनीतिक मुद्दा बन गया। यानी जो Article 44 करीब 35 साल से संविधान में मौजूद था... एक 62 साल की महिला की maintenance की लड़ाई ने उसे अचानक चुनावी राजनीति के केंद्र में ला खड़ा किया। और इसी राजनीतिक जमीन पर कुछ वर्षों बाद BJP ने UCC को अपने राष्ट्रीय एजेंडे के सबसे बड़े मुद्दों में शामिल करना शुरू किया।
और यहीं से UCC की कहानी अदालत से निकलकर सीधे चुनावी राजनीति में प्रवेश करती है। शाह बानो के फैसले और 1986 के कानून के बाद BJP को एक ऐसा मुद्दा मिल चुका था, जिसे वह सिर्फ Personal Law नहीं बल्कि “समान नागरिक अधिकार” और कांग्रेस की तुष्टिकरण की राजनीति के सवाल से जोड़ सकती थी। लेकिन एक महत्वपूर्ण तथ्य यहां समझना जरूरी है—BJP ने UCC को अचानक 2014 में नहीं उठाया था। 1989 के लोकसभा चुनाव के घोषणापत्र में पार्टी ने साफ कहा कि वह Uniform Civil Code की दिशा में काम करेगी; और इसके बाद UCC धीरे-धीरे BJP के उस बड़े वैचारिक एजेंडे का हिस्सा बन गया जिसमें राम जन्मभूमि और Article 370 जैसे मुद्दे भी शामिल थे। लेकिन इसी दौर में Supreme Court ने भी इस बहस को जिंदा रखा। 1995 के Sarla Mudgal case में मामला ऐसे हिंदू पुरुषों से जुड़ा था जिन्होंने पहली शादी खत्म किए बिना इस्लाम स्वीकार कर दूसरी शादी की; Supreme Court ने कहा कि केवल दूसरी शादी के उद्देश्य से धर्म परिवर्तन पहली शादी को अपने-आप खत्म नहीं करता, और इसी फैसले में Court ने एक बार फिर Article 44 और Uniform Civil Code की जरूरत पर टिप्पणी की। फिर 2003 के John Vallamattom case में भी Supreme Court ने Article 44 का उल्लेख किया। यानी अब UCC को आगे बढ़ाने वाली दो अलग धाराएं दिखाई देने लगी थीं—एक तरफ BJP इसे अपने राजनीतिक और वैचारिक एजेंडे में लगातार उठा रही थी... और दूसरी तरफ देश की सर्वोच्च अदालत अलग-अलग मामलों में Article 44 की याद दिला रही थी। लेकिन इसके बावजूद केंद्र की किसी सरकार ने nationwide UCC लागू नहीं किया। अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में BJP सत्ता तक पहुंची, लेकिन coalition politics में UCC जैसे विवादित मुद्दे NDA के common governing agenda से बाहर रहे। और यही इस कहानी का अगला बड़ा सवाल पैदा करता है—जिस मुद्दे को BJP दशकों से अपनी विचारधारा का हिस्सा बता रही थी... उसे लागू करने के लिए उसे आखिर किस चीज का इंतजार था? जवाब शायद 2014 के उस चुनाव में छिपा था, जब पहली बार BJP अपने दम पर पूर्ण बहुमत के साथ दिल्ली की सत्ता में पहुंची।
लेकिन 2014 में पूर्ण बहुमत मिलने के बाद भी मोदी सरकार सीधे UCC लेकर नहीं आई। और यहीं BJP की रणनीति को समझना जरूरी है। क्योंकि जिन मुद्दों को पार्टी दशकों से उठाती रही थी, उनमें अगले कुछ वर्षों में एक-एक करके बड़े बदलाव दिखाई देने लगे। 2019 में Triple Talaq को अपराध बनाने वाला कानून आया... उसी साल 5 अगस्त को Article 370 के अधिकतर प्रावधान निष्प्रभावी कर जम्मू-कश्मीर की विशेष संवैधानिक स्थिति में बड़ा बदलाव किया गया... और नवंबर 2019 में Supreme Court के फैसले के बाद अयोध्या में राम मंदिर निर्माण का रास्ता साफ हुआ। लेकिन UCC अभी भी बाकी था। और इसी बीच इस मुद्दे पर एक ऐसा institutional assessment आया, जिसने कहानी को और दिलचस्प बना दिया। 2018 में 21वें Law Commission ने UCC पर अपनी consultation paper में कहा कि Uniform Civil Code उस समय “neither necessary nor desirable at this stage” है। आयोग का तर्क यह नहीं था कि Personal Laws में असमानताएं बनी रहनी चाहिए; बल्कि उसका approach था कि अलग-अलग Family Laws के भीतर मौजूद discriminatory provisions को reform किया जाए और equality हासिल करने के लिए हर जगह absolute uniformity जरूरी नहीं है। यानी एक तरफ संविधान का Article 44 UCC की दिशा में प्रयास करने की बात करता था... BJP इसे दशकों से अपने manifesto में रखती आई थी... Supreme Court भी अलग-अलग मामलों में इस मुद्दे का उल्लेख कर चुका था... लेकिन दूसरी तरफ सरकार द्वारा गठित Law Commission ही कह रहा था कि उस समय nationwide UCC जरूरी या desirable नहीं है। तो फिर ऐसा क्या बदला कि पांच साल बाद, 2023 में यही मुद्दा अचानक देश की राजनीति के केंद्र में वापस आ गया? इसका जवाब किसी court judgement में नहीं... बल्कि 14 जून 2023 को जारी हुए एक public notice और उसके ठीक 13 दिन बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के भोपाल में दिए गए एक भाषण में छिपा था।
और तारीख थी 27 जून 2023... जगह—भोपाल। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी BJP कार्यकर्ताओं को संबोधित कर रहे थे, लेकिन इसी भाषण में उन्होंने UCC को लेकर एक ऐसा सवाल उठाया जिसने इस बहस को फिर राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में ला दिया। मोदी ने कहा—“एक घर में परिवार के एक सदस्य के लिए एक कानून हो और दूसरे सदस्य के लिए दूसरा कानून हो, तो क्या वह घर चल पाएगा?” उनका तर्क था कि जब संविधान भी समान नागरिक संहिता की बात करता है, तो एक देश में अलग-अलग Personal Laws की व्यवस्था आखिर कब तक चलेगी। लेकिन इस भाषण की timing ज्यादा महत्वपूर्ण थी—क्योंकि इसके सिर्फ 13 दिन पहले, 14 जून 2023 को 22वें Law Commission ने UCC पर जनता और मान्यता प्राप्त धार्मिक संगठनों से दोबारा राय मांगनी शुरू की थी।** यानी जिस मुद्दे पर 2018 का Law Commission कह चुका था कि UCC उस समय “न तो आवश्यक है और न वांछनीय”, वही मुद्दा पांच साल बाद एक बार फिर institutional consultation और national politics—दोनों में लौट चुका था। और प्रतिक्रिया भी तुरंत हुई। All India Muslim Personal Law Board ने इसका विरोध किया; Congress ने सरकार की मंशा और timing पर सवाल उठाए; DMK ने धार्मिक स्वतंत्रता और federal structure की चिंता जताई; Shiromani Gurdwara Parbandhak Committee ने Sikh traditions और identity पर संभावित प्रभाव को लेकर आपत्ति दर्ज की; और North-East में मामला और भी संवेदनशील था, क्योंकि वहां कई tribal communities के marriage, inheritance और social customs को संविधान के विशेष प्रावधानों से सुरक्षा मिली हुई है—यहां तक कि Mizoram विधानसभा फरवरी 2023 में UCC के खिलाफ resolution पारित कर चुकी थी। यानी अब सरकार के सामने सवाल केवल यह नहीं था कि Muslim Personal Law का क्या होगा... असली सवाल था—भारत जैसे देश में, जहां धर्म के साथ-साथ सैकड़ों tribal और customary laws मौजूद हैं, वहां “Uniform” की सीमा आखिर तय कैसे होगी? और शायद इसी सवाल का जवाब केंद्र ने सीधे संसद में कानून लाकर नहीं... बल्कि पहले एक छोटे पहाड़ी राज्य में तलाशना शुरू किया—उत्तराखंड।
और UCC की इस नई कहानी में उत्तराखंड अचानक नहीं आया था... इसकी जमीन 2022 के विधानसभा चुनाव में ही तैयार हो चुकी थी। चुनाव से ठीक पहले मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने वादा किया कि BJP की सरकार वापस आई तो राज्य में Uniform Civil Code के लिए एक expert committee बनाई जाएगी। BJP सत्ता में लौटी और मई 2022 में सुप्रीम कोर्ट की पूर्व न्यायाधीश Justice Ranjana Prakash Desai की अध्यक्षता में पांच सदस्यीय समिति बना दी गई। समिति ने करीब दो साल तक अलग-अलग वर्गों से सुझाव लिए और 2 फरवरी 2024 को अपनी रिपोर्ट सरकार को सौंप दी। इसके सिर्फ चार दिन बाद, 6 फरवरी 2024 को विधानसभा में UCC Bill पेश हुआ और 7 फरवरी को पारित कर दिया गया। मार्च में राष्ट्रपति की मंजूरी मिलने के बाद यह कानून तो बन गया... लेकिन असली बदलाव 27 जनवरी 2025 को आया, जब उत्तराखंड ने इसे लागू कर दिया और इस तरह आजाद भारत में अपना नया Uniform Civil Code लागू करने वाला पहला राज्य बन गया। अब सवाल था—जमीन पर UCC ने बदला क्या? सबसे पहले विवाह—अलग-अलग धर्मों की विवाह पद्धतियां खत्म नहीं की गईं; यानी कोई फेरे ले सकता है, कोई निकाह कर सकता है और कोई आनंद कारज... लेकिन विवाह की कानूनी शर्तों और registration के लिए common framework बनाया गया। कानून में एक समय में एक ही spouse, पुरुष के लिए न्यूनतम विवाह आयु 21 और महिला के लिए 18 वर्ष रखी गई; तलाक के लिए भी statutory grounds तय किए गए। Succession और inheritance के लिए भी common provisions बनाए गए और सरकार ने इसे खास तौर पर महिलाओं के समान अधिकार से जोड़ा। लेकिन इसी कानून का सबसे विवादित हिस्सा बना—live-in relationship का registration। उत्तराखंड में रहने वाले live-in partners को निर्धारित प्रक्रिया के तहत relationship की statement Registrar को देनी होती है, और नियम न मानने पर कानूनी परिणाम भी हो सकते हैं। यानी जिस UCC को राष्ट्रीय बहस में मुख्य रूप से शादी, तलाक और विरासत की समानता के रूप में पेश किया जाता था... उत्तराखंड का मॉडल उससे आगे जाकर नागरिकों के निजी संबंधों तक पहुंच गया। और यहीं कहानी में सबसे बड़ा contradiction सामने आता है—इसका नाम Uniform Civil Code था... लेकिन Scheduled Tribes को इसके दायरे से बाहर रखा गया। तो सवाल उठना तय था—अगर एक राज्य के भीतर ही हर नागरिक पर समान कानून लागू नहीं है... तो इसे Uniform कितना कहा जा सकता है? और इससे भी बड़ा सवाल—क्या उत्तराखंड सिर्फ एक राज्य का प्रयोग था... या पूरे देश के लिए तैयार किया जा रहा एक prototype?
और उत्तराखंड का यही प्रयोग अब सिर्फ उत्तराखंड तक सीमित दिखाई नहीं देता। क्योंकि UCC लागू होने के करीब डेढ़ साल बाद, 15 अगस्त 2026 को राजस्थान के मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा ने घोषणा कर दी कि राजस्थान भी अपना Civil Code लाने जा रहा है। यानी जो मुद्दा दशकों तक दिल्ली की संसद और Supreme Court की टिप्पणियों के बीच घूमता रहा... अब वह राज्यों के जरिए जमीन पर उतरता दिखाई दे रहा है। लेकिन यहीं एक दिलचस्प pattern बनता है—केंद्र सरकार ने अभी तक संसद में पूरे देश के लिए कोई nationwide UCC कानून पेश नहीं किया, जबकि BJP शासित राज्यों में इसके अलग-अलग मॉडल आगे बढ़ रहे हैं। और इसके पीछे एक practical कारण भी समझ आता है—विवाह, तलाक, adoption और succession जैसे विषय Constitution की Concurrent List में आते हैं यानी इन क्षेत्रों में संसद के साथ राज्य विधानसभाएं भी कानून बना सकती हैं, हालांकि टकराव की स्थिति में संविधान का Article 254 महत्वपूर्ण हो जाता है और कुछ state laws को Presidential assent की आवश्यकता पड़ सकती है। तो क्या रणनीति यह हो सकती है कि पहले राज्यों में UCC को लागू करके उसके legal और administrative effects देखे जाएं... फिर उन्हीं अनुभवों के आधार पर किसी national framework की जमीन तैयार हो? सरकार ने इसे औपचारिक रूप से ऐसी “pilot strategy” घोषित नहीं किया है, इसलिए इसे तथ्य नहीं बल्कि एक संभावित राजनीतिक और नीतिगत pattern की तरह देखना चाहिए। लेकिन BJP की दिशा छिपी भी नहीं है। 2024 के Lok Sabha manifesto में पार्टी ने साफ कहा था कि जब तक भारत Uniform Civil Code नहीं अपनाता, तब तक महिलाओं को समान अधिकार पूरी तरह नहीं मिल सकते, और BJP UCC बनाने के अपने संकल्प को दोहराती है। इसके कुछ महीने बाद 15 अगस्त 2024 को लाल किले से प्रधानमंत्री मोदी ने इस बहस को एक नई framing दी—उन्होंने कहा कि देश को अब “Secular Civil Code” की तरफ बढ़ना चाहिए। यानी राजनीतिक messaging में UCC को केवल “एक कानून” नहीं, बल्कि धर्म से अलग नागरिक अधिकारों की व्यवस्था के रूप में पेश करने की कोशिश दिखाई देती है। और अगर उत्तराखंड के बाद राजस्थान और फिर दूसरे राज्य भी इसी दिशा में बढ़ते हैं... तो असली सवाल यह नहीं रह जाता कि UCC BJP के manifesto में है या नहीं। असली सवाल है—क्या भारत में UCC दिल्ली से एक साथ लागू होने के बजाय... राज्यों से धीरे-धीरे दिल्ली की तरफ बढ़ रहा है?
लेकिन अगर UCC का मकसद समानता है... महिलाओं को बराबर अधिकार देना है... और धर्म से ऊपर एक समान Civil Law बनाना है, तो फिर इसका इतना विरोध क्यों होता है? क्योंकि विरोध करने वालों की सबसे बड़ी आपत्ति “समानता” शब्द से नहीं... बल्कि इस सवाल से है कि Uniformity तय कौन करेगा? All India Muslim Personal Law Board लंबे समय से कहता रहा है कि शादी, तलाक और विरासत से जुड़े Muslim Personal Laws धार्मिक आस्था और शरीयत से जुड़े हैं, इसलिए एक अनिवार्य common code Article 25 में मिली धार्मिक स्वतंत्रता को प्रभावित कर सकता है। लेकिन मामला केवल मुस्लिम Personal Law तक सीमित नहीं है। Shiromani Gurdwara Parbandhak Committee यानी SGPC भी UCC का विरोध कर चुकी है और उसका तर्क रहा है कि भारत की विविध धार्मिक परंपराओं और Sikh identity से जुड़े personal practices को एक uniform framework में बांधना ठीक नहीं होगा। और North-East में यह सवाल और ज्यादा जटिल हो जाता है। क्योंकि Article 371A नागालैंड में Naga customary law और social practices को विशेष संवैधानिक सुरक्षा देता है, जबकि Article 371G Mizoram में Mizo customary law और social practices को संरक्षण देता है; इन विषयों पर संसद का कानून भी संबंधित राज्य विधानसभा के निर्णय के बिना स्वतः लागू नहीं होता। यही कारण है कि Mizoram विधानसभा 2023 में UCC के खिलाफ resolution पारित कर चुकी है। और शायद इस complexity का सबसे बड़ा प्रमाण खुद उत्तराखंड का UCC है—जिसने Scheduled Tribes को कानून के application से बाहर रखा। यानी national UCC की सबसे बड़ी चुनौती केवल यह नहीं कि अलग-अलग धर्मों के Personal Laws को कैसे एक किया जाए... चुनौती यह भी है कि भारत के constitutionally protected tribal customs का क्या होगा। लेकिन दूसरी तरफ UCC समर्थकों का जवाब भी उतना ही महत्वपूर्ण है—क्या किसी परंपरा को सिर्फ इसलिए हमेशा बचाए रखा जा सकता है क्योंकि वह पुरानी या धार्मिक है, अगर उसी व्यवस्था के भीतर किसी नागरिक—खासकर महिला—के समान अधिकार प्रभावित होते हों? और यहीं UCC की असली constitutional लड़ाई खड़ी होती है—Article 25 की religious freedom एक तरफ... Article 14 की equality और Article 15 की non-discrimination दूसरी तरफ... और Article 44 का Uniform Civil Code तीसरी तरफ। यानी सवाल सिर्फ यह नहीं कि UCC लागू होगा या नहीं... सवाल यह है कि अगर पूरे भारत के लिए UCC बनाया गया, तो संविधान के इन अलग-अलग अधिकारों के बीच संतुलन आखिर बनाया कैसे जाएगा?
CLIMAX — NARRATION
तो अब इस पूरी कहानी को एक बार फिर वहीं लाकर खड़ा कर दीजिए, जहां से हमने शुरुआत की थी—उत्तराखंड। क्योंकि जिस Uniform Civil Code का सपना संविधान निर्माताओं ने Article 44 में रखा था... जिस पर 1948 की संविधान सभा में टकराव हुआ... जिसे शाह बानो के एक मुकदमे ने 1985 में देश की राजनीति के केंद्र में ला दिया... और जिसे BJP ने दशकों तक अपने राजनीतिक एजेंडे का हिस्सा बनाए रखा—वह आज कम से कम एक राज्य में सिर्फ बहस नहीं, कानून बन चुका है। लेकिन उत्तराखंड ने UCC का एक जवाब देने के साथ ही उससे बड़ा सवाल भी पैदा कर दिया है। अगर Scheduled Tribes को इस कानून से बाहर रखना पड़ा... अगर North-East में Constitution खुद कई customary laws को विशेष सुरक्षा देता है... और अगर अलग-अलग राज्यों को अपने-अपने Civil Code बनाने पड़ रहे हैं... तो पूरे भारत का “Uniform” Civil Code आखिर कितना Uniform हो सकता है? दूसरी तरफ सवाल सरकार से भी आगे जाता है—अगर संविधान हर नागरिक को समानता देता है, तो क्या शादी, तलाक और विरासत जैसे नागरिक अधिकार किसी व्यक्ति के धर्म के आधार पर अलग-अलग होने चाहिए? शायद यही वजह है कि नरेंद्र मोदी अब इसे सिर्फ Uniform Civil Code नहीं, बल्कि “Secular Civil Code” की बहस के रूप में सामने रख रहे हैं। उत्तराखंड के बाद राजस्थान भी इस दिशा में कदम बढ़ा रहा है... इसलिए आने वाले समय की असली लड़ाई शायद यह नहीं होगी कि UCC आएगा या नहीं . असली लड़ाई इस बात पर होगी कि उस UCC के भीतर क्या होगा, किसे छूट मिलेगी और समानता की सीमा कौन तय करेगा। क्योंकि 1948 में संविधान सभा के सामने जो सवाल खड़ा था... करीब आठ दशक बाद भारत फिर उसी सवाल के सामने खड़ा दिखाई देता है—क्या एक देश में समान नागरिक अधिकारों के लिए समान Civil Law जरूरी है... या भारत की विविधता को बचाने के लिए कानूनों में कुछ अंतर भी जरूरी हैं? और अगर मोदी सरकार इस संवैधानिक पहेली का ऐसा समाधान निकाल पाती है जिसमें Article 14 की समानता, Article 25 की धार्मिक स्वतंत्रता और Article 44 का UCC—तीनों एक साथ संतुलित रह सकें... तो यह सिर्फ एक और कानून नहीं होगा; यह आज़ाद भारत के Personal Law framework में सबसे बड़े बदलावों में से एक हो सकता है। लेकिन अगर यह संतुलन बिगड़ा... तो जिस UCC को समानता के समाधान के रूप में पेश किया जा रहा है, वही भारत की अगली बड़ी संवैधानिक और राजनीतिक लड़ाई भी बन सकता है।

