क्या बीजेपी की सत्ता भी उसी आरक्षण-विरोध की आग में खत्म हो जाएगी…जिस आग ने कभी कांग्रेस का पूरा पॉलिटिकल साम्राज्य खत्म दिया था? क्या जिस जनरल कैटेगरी ने .हर मुश्किल दौर में बीजेपी के लिए जमीन तैयार की…आज वही जनरल कैटेगरी बीजेपी की सत्ता के नीचे से जमीन खींच जा रही है? कभी हिंदुओं को एकजुट करके, हिंदू-मुस्लिम पॉलिटिक्स के सहारे अपनी सत्ता के सिंहासन की दीवारें खड़ी करने वाली बीजेपी ..आज सत्ता बचाने के लिए वही बीजेपी आपने फैसलों से हिन्दुओं को जातियों में बाँट रही है .......... ऐसे में सवाल इस बात का है की क्या बीजेपी की राजनीति अब सवर्ण विरोध हो गयी है…या सत्ता बचाने के लिए उसका पूरा पॉलिटिकल कैलकुलेशन बदल चुका है? ......क्या बीजेपी भी उसी पोलटिक्कीस तरफ बढ़ चुकी .. जिसने कभी कोंग्रेस की दशको पुरने सत्ता को एक झटके में खत्म कर दिया है .. ... चलिए इस रिपोर्ट में समझते है ...................
बीजेपी की इस नई पॉलिटिक्स को समझने से पहले कांग्रेस के उस पॉलिटिकल प्रयोग को समझना जरूरी है…जिसने उसे पहले गुजरात और फिर देश की सत्ता से हमेशा के लिए बाहर कर दिया। इस पॉलिटिकल बदलाव की शुरुआत वर्ष 1985 के गुजरात से हुई…जब मुख्यमंत्री माधवसिंह सोलंकी ने क्षत्रिय, हरिजन, आदिवासी और मुस्लिम समुदायों को जोड़कर एक नया सोशल कॉम्बिनेशन तैयार किया, जिसे ‘खाम फॉर्मूला’ कहा गया। इसी खाम फॉर्मूले और सोशल इंजीनियरिंग के सहारे कांग्रेस ने वर्ष 1985 के गुजरात विधानसभा चुनाव में 182 में से रिकॉर्ड 149 सीटें जीत लीं। लेकिन इस ऐतिहासिक जीत के पीछे एक ऐसा पॉलिटिकल फैसला छिपा था…जो आगे चलकर गुजरात में कांग्रेस के अंत की शुरुआत बन गया।
और वो फैसला था चुनाव से ठीक पहले पिछड़े वर्गों का आरक्षण 10 प्रतिशत से बढ़ाकर 28 प्रतिशत करना । इस फैसले के बाद गुजरात में एंटी-रिजर्वेशन मूवमेंट शुरू हो गया…कॉलेज और यूनिवर्सिटी के छात्र सड़कों पर उतर आए…और प्रोटेस्ट का प्रेशर इतना बढ़ा कि रिकॉर्ड बहुमत मिलने के केवल चार महीने बाद जुलाई 1985 में माधवसिंह सोलंकी को मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देना पड़ा।...............................
लेकिन कांग्रेस का असली पॉलिटिकल नुकसान सोलंकी के इस्तीफे के बाद दिखाई दिया। खाम फॉर्मूले में खुद को साइडलाइन महसूस कर रहे पाटीदार, ब्राह्मण और बनिया जैसे प्रभावशाली वर्ग कांग्रेस से दूर होकर बीजेपी की तरफ शिफ्ट होने लगे। नतीजा—1985 में 149 सीटें जीतने वाली कांग्रेस 1990 के चुनाव में केवल 33 सीटों पर सिमट गई…यानी सिर्फ पांच वर्षों में उसकी 116 सीटें कम हो गईं। दूसरी तरफ बीजेपी 11 सीटों से बढ़कर 67 सीटों तक पहुंच गई।.....फिर वर्ष 1995 में बीजेपी ने पहली बार अपने दम पर गुजरात की सत्ता हासिल कर ली…और वर्ष 1985 के बाद कांग्रेस आज तक गुजरात में पूर्ण बहुमत की सरकार नहीं बना सकी। यानी जातियों के जिस पॉलिटिकल फॉर्मूले ने कांग्रेस को रिकॉर्ड मेजॉरिटी दिलाई…उसी फॉर्मूले ने उसके पुराने और सबसे प्रभावशाली वोटर को उससे दूर भी कर दिया। कांग्रेस चुनाव तो जीत गई थी…लेकिन उस जीत के भीतर ही उसने अपनी भविष्य की हार की नींव रख दी थी।....................
अब लगभग चार दशक बाद बीजेपी के सामने भी वैसा ही पॉलिटिकल कॉन्फ्लिक्ट खड़ा होता दिखाई दे रहा है। फर्क सिर्फ इतना है कि उस समय जातियों का नया कॉम्बिनेशन बनाकर कांग्रेस ने अपने ट्रेडिशनल वोटर को खोया था…और आज बीजेपी दलित तथा पिछड़ा वोट बैंक बचाने की कोशिश में उसी जनरल कैटेगरी का भरोसा खोने का खतरा उठा रही है, जिसने कभी गुजरात से लेकर दिल्ली तक उसकी सत्ता की जमीन तैयार की थी।...................
और बीजेपी के लिए इस खतरे की पहली बड़ी वार्निंग वर्ष 2018 में ही आ चुकी थी। 20 मार्च 2018 को सुप्रीम कोर्ट ने एससी-एसटी एक्ट के कथित मिसयूज को रोकने के लिए अपने फैसले में तीन लीगल सेफगार्ड जोड़े। पहला—एफआईआर दर्ज करने से पहले शुरुआती जांच। दूसरा—किसी आरोपी को गिरफ्तार करने से पहले सक्षम अधिकारी की मंजूरी। और तीसरा—पहली नजर में मामला न बनने पर अग्रिम जमानत की गुंजाइश। लेकिन मोदी सरकार की वोट की राजीति ने इसे 150 दिनों के भीतर संसद से कानून बदलकर सुप्रीम कोर्ट के फैसले को पलट दिया। सिर्फ पलटा ही नहीं . इसमें नई धारा 18ए जोड़कर साफ कर दिया कि एफआईआर से पहले किसी शुरुआती जांच की जरूरत नहीं होगी…आरोपी की गिरफ्तारी के लिए किसी अधिकारी से पहले मंजूरी नहीं लेनी होगी…और अदालत के किसी भी पुराने फैसले के बावजूद अग्रिम जमानत पर रोक लागू रहेगी। .................................
सवाल कानून की जरूरत का नहीं था…सवाल सरकार की पॉलिटिकल प्रायोरिटी का था। क्योंकि एक वर्ग के प्रोटेस्ट के बाद सरकार ने सुप्रीम कोर्ट का फैसला तक पलट दिया…लेकिन फर्जी मुकदमों और बिना जांच गिरफ्तारी का डर जता रहे अपने ही कोर वोटर की बात सुनना तक जरूरी नहीं समझा।नतीजा यह हुआ कि 6 सितंबर 2018 को जनरल कैटेगरी और कई दूसरे संगठनों ने भारत बंद कर दिया। .....और जमकर विरोध किया ..नतीजा ये हुआ .. की केवल तीन महीने बाद बीजेपी मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़—तीनों राज्यों की सत्ता हार गई। ..... जनरल कैटेगरी के गुस्से ने बीजेपी को पहली बार दिखा दिया कि जिसे वह अपना फिक्स वोट बैंक समझ रही है…वही वोट बैंक नाराज होकर उसकी बनी-बनाई सत्ता का पूरा पॉलिटिकल कैलकुलेशन बिगाड़ सकता है।.......
लेकिन वर्ष 2018 की इस पॉलिटिकल वार्निंग के बावजूद बीजेपी और जनरल कैटेगरी के बीच पैदा हुई दूरी खत्म नहीं हुई। एससी-एसटी एक्ट के कथित मिसयूज पर सवाल अभी बाकी ही थे कि 13 जनवरी 2026 को यूजीसी ने उच्च शिक्षण संस्थानों के लिए नए य्रेयूजीसी गुलेशंस जारी कर दिए। इन नियमों में एससी, एसटी और ओबीसी छात्रों को तो शामिल किया गया…लेकिन जनरल कैटेगरी के छात्रों और शिक्षकों को इसमें शामिल नहीं किया गया .जनरल कैटेगरी के छात्रों और शिक्षकों ने पूछा—अगर जाति के आधार पर भेदभाव गलत है…तो पीड़ित की जाति देखकर उसकी सुरक्षा क्यों तय की जा रही है? क्या जनरल कैटेगरी का व्यक्ति केवल आरोपी हो सकता है…जातिगत भेदभाव का शिकार नहीं?..............................................
विरोध बढ़ा मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंच और सुप्रीम कोर्ट ने 29 जनवरी 2026 को यूजीसी के नए नियमों पर रोक लगा दी।..लेकिन यहां जनरल कैटेगरी के लिए सबसे बड़ा पॉलिटिकल मैसेज यह था कि नियम सरकार या यूजीसी ने वापस नहीं लिए उन्हें राहत सुप्रीम कोर्ट ने दी।...यानी वर्ष 2018 में एक वर्ग के प्रोटेस्ट के बाद मोदी सरकार ने केवल 150 दिनों में सुप्रीम कोर्ट के दिए सेफगार्ड पलट दिया …लेकिन वर्ष 2026 में जनरल कैटेगरी के विरोध के बावजूद सरकार यूजीसी के नियमों को लेकर पीछे हटती दिखाई नहीं दी। ...................
यही वजह है की सुप्रीम कोर्ट के स्टे के बाद भी जनरल कैटेगरी के भीतर पैदा हुआ गुस्सा खत्म नहीं हुआ। क्योंकि अब लड़ाई केवल यूजीसी के नियमों तक सीमित नहीं थी। सवाल पूरी आरक्षण व्यवस्था के रिव्यू, क्रीमी लेयर, और एससी-एसटी एक्ट में मिसयूज रोकने के लिए लीगल सेफगार्ड का था। इन्हीं मांगों को लेकर 21 अगस्त 2026 को बड़ी संख्या में लोग दिल्ली के जंतर-मंतर पहुंचे। तो उन्हें परमिशन नहीं दी गई…जबकि कुछ महीनों पहले ...इसी सरकार की पुलिस cjp को परमिशन देने ... एअरपोर्ट तक गयी थी .जिस जनरल कैटेगरी के वोटर ने वर्षों तक बीजेपी के लिए सोशल मीडिया पर लड़ाई लड़ी…चुनाव में बूथ संभाले…रैलियों में भीड़ जुटाई और विपक्ष के हर हमले के सामने ढाल बनकर खड़ा रहा…आज वही वोटर अपनी सरकार तक आवाज पहुंचाने के लिए परमिशन तलाश रहा है ..
आज जनरल कैटेगरी बीजेपी से आरक्षण खत्म करने का वादा नहीं…अपनी बात सुनने का अधिकार, कानून में बराबरी और आरक्षण व्यवस्था पर एक ईमानदार रिव्यू मांग रहा है। लेकिन अगर उसकी हर मांग को आरक्षण-विरोधी बताकर खारिज किया जाएगा…तो यह नाराजगी केवल जंतर-मंतर तक सीमित नहीं रहेगी।
यही गलती कभी कांग्रेस ने गुजरात में की थी। उसने नए सोशल कॉम्बिनेशन को बचाने के लिए अपने पुराने वोटर की नाराजगी को नजरअंदाज किया। फिर वही वोटर कांग्रेस से दूर होकर बीजेपी की सबसे बड़ी पॉलिटिकल ताकत बन गया। आज बीजेपी भी दलित और पिछड़ा वोट बैंक बचाने के लिए उसी जनरल कैटेगरी का भरोसा खोने का रिस्क ले रही है…जिसने कभी कांग्रेस की सत्ता खत्म करके बीजेपी के लिए रास्ता तैयार किया था।
इसलिए अब सवाल यह नहीं है कि आरक्षण खत्म होगा या नहीं। सवाल यह है कि क्या जनरल कैटेगरी का बीजेपी पर बचा हुआ भरोसा खत्म हो जाएगा? क्या वह वोटर अगले चुनाव में बीजेपी के लिए घर से निकलेगा…बूथ संभालेगा…और पहले की तरह पार्टी के लिए लड़ाई लड़ेगा? अगर बीजेपी ने इस गुस्से को केवल सोशल मीडिया का शोर समझा…तो शायद उसकी सत्ता अगले चुनाव में तुरंत खत्म न हो…लेकिन उसके पतन की पॉलिटिकल स्क्रिप्ट जरूर लिखी जा सकती है। क्योंकि सरकारें तब खत्म नहीं होतीं, जब विपक्ष मजबूत होता है…सरकारें तब खत्म होती हैं, जब उन्हें सत्ता तक पहुंचाने वाला अपना ही वोटर उनके लिए लड़ना छोड़ देता है।
बीजेपी एक खतरनाक पॉलिटिकल ट्रैप में फंस चुकी है। अगर वह आरक्षण में रिफॉर्म और रिव्यू की बात करती है, तो उसका दलित और पिछड़ा वोट बैंक नाराज हो सकता है। अगर वह हर रिफॉर्म की मांग को खारिज करती है, तो उसका ट्रेडिशनल सवर्ण वोट बैंक टूट सकता है। और अगर वह केवल चुनावी चुप्पी साधती है…तो दोनों पक्षों का भरोसा खत्म हो सकता है। यानी जिस सोशल इंजीनियरिंग के सहारे बीजेपी ने कांग्रेस को सत्ता से बाहर किया था…आज उसी सोशल इंजीनियरिंग की दरारें बीजेपी के अपने किले तक पहुंच चुकी हैं।

