NIO TIMES Special Ground Explainer: तारीख थी 22 जून 2026.. हिमाचल प्रदेश के सीनियर ज्यूडिशियल ऑफिसर अरविंद मल्होत्रा अदालत पहुंचे। शिकायत ये थी कि हाई कोर्ट में जज बनाने के लिए उनसे जूनियर अधिकारियों के नाम आगे बढ़ गए... लेकिन उनका नहीं। अब पहली नजर में ये किसी अफसर के प्रमोशन का मामला लग सकता है। लेकिन असली सवाल प्रमोशन का था ही नहीं। सवाल था—अगर एक सीनियर आदमी को छोड़कर जूनियर को जज बनाया जा सकता है... तो फैसला होता किस आधार पर है?
मामला जस्टिस बी.वी. नागरत्ना और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की बेंच के सामने था। कोर्ट ने कहा—सिर्फ सीनियर होने से किसी को हाई कोर्ट जज बनने का हक नहीं मिल जाता। और कॉलेजियम के फैसलों की तह में जाने की बात आई, तो बेंच ने इसे एक तरह का “पैंडोराज़ बॉक्स” खोलने जैसा बताया। तो सवाल उठा कि आखिर क्या है —पैंडोराज़ बॉक्स और इसके अन्दर क्या है?
भारत में डीएम कैसे चुना जाएगा, उसके नियम हैं... आईएएस कैसे बनेगा, उसके लिए परीक्षा है... सांसद कौन बनेगा, जनता वोट देती है... प्रधानमंत्री कौन होगा, उसकी भी संवैधानिक प्रक्रिया है। लेकिन जो सुप्रीम कोर्ट सरकार के फैसले पलट सकता है... संसद के बनाए कानून को असंवैधानिक बता सकता है... और जरूरत पड़े तो प्रधानमंत्री तक के खिलाफ फैसला दे सकता है—उस सुप्रीम कोर्ट का अगला जज कौन होगा, इसे तय करने में सबसे बड़ी भूमिका खुद कुछ जजों की होती है।
इसी व्यवस्था का नाम है—कॉलेजियम। और दिलचस्प बात ये है कि “कॉलेजियम” शब्द आपको भारत के संविधान में मिलेगा ही नहीं। तो फिर ये ताकत आई कहां से?
इसका जवाब समझने के लिए किसी कानून की किताब खोलने से पहले भारत की राजनीति के उस दौर में जाना पड़ेगा... जब दिल्ली में इंदिरा गांधी की सरकार बेहद ताकतवर थी और दूसरी तरफ सुप्रीम कोर्ट धीरे-धीरे सरकार की ताकत के सामने एक बाउंड्री खींच रहा था। और ये टकराव इतना बढ़ा कि पहले तीन सीनियर जज पीछे किए गए... फिर प्रधानमंत्री का चुनाव कोर्ट ने रद्द कर दिया... फिर इमरजेंसी लगी... फिर संविधान बदला गया... और फिर एक ऐसे जज की बारी आई जिसने सरकार के खिलाफ अकेले खड़े होने की कीमत अपने करियर से चुकाई... यहीं से कॉलेजियम की असली कहानी शुरू होती है।
1. 1973: केशवानंद भारती केस और 1 वोट का ऐतिहासिक फैसला
24 अप्रैल 1973। सुप्रीम कोर्ट में एक-दो नहीं... 13 जज बैठे थे। भारत के इतिहास में इतनी बड़ी बेंच यूं ही नहीं बैठी थी। सवाल था—क्या संसद के पास संविधान बदलने की कोई सीमा है... या फिर जिस सरकार के पास पर्याप्त बहुमत हो, वो संविधान में जो चाहे बदल सकती है? मामला था—केशवानंद भारती बनाम स्टेट ऑफ केरल।
फैसला आया 7:6 से। अब इस नंबर को सिर्फ आंकड़ा मत समझिए... 13 जजों में सिर्फ एक जज का अंतर। और इसी एक वोट के अंतर से भारतीय राजनीति के ऊपर एक ऐसी संवैधानिक दीवार खड़ी हुई जो आज तक मौजूद है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा—संसद संविधान में बदलाव कर सकती है... लेकिन उसकी बेसिक स्ट्रक्चर (बुनियादी पहचान) को खत्म नहीं कर सकती। अभी यहां तक मामला कानून का था। लेकिन अगले ही दिन मामला राजनीति का हो गया।
25 अप्रैल को तत्कालीन चीफ जस्टिस एस.एम. सीकरी रिटायर हुए। उनके बाद सीनियरिटी में आगे तीन नाम थे—जस्टिस जे.एम. शेलट, जस्टिस के.एस. हेगड़े और जस्टिस ए.एन. ग्रोवर। लेकिन इनमें से किसी को चीफ जस्टिस नहीं बनाया गया। इंदिरा गांधी सरकार ने इन तीनों को पीछे छोड़कर उनसे जूनियर जस्टिस ए.एन. रे को चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया बना दिया। यही इस कहानी का सबसे बड़ा ट्विस्ट था।
जिन तीन जजों को बाईपास करके ए.एन. रे को चीफ जस्टिस बनाया गया, वे तीनों एक दिन पहले केशवानंद भारती मामले में उस तरफ थे जिसने सरकार और संसद की ताकत पर बेसिक स्ट्रक्चर की सीमा लगाई थी। यानी इंदिरा गांधी के खिलाफ फैसला दिया था... तो क्या ये बदला था? इसे बिना प्रमाण के हम ऐसा नहीं कह सकते। लेकिन सवाल जरूर खड़ा हो गया था—अगर सरकार के खिलाफ फैसला देने वाले जजों का भविष्य भी आखिर सरकार के फैसले से तय होना है... तो जज सरकार से पूरी तरह बेखौफ होकर फैसला कैसे करेगा?
यही सवाल याद रखिए। क्योंकि आगे चलकर इसी सवाल से कॉलेजियम सिस्टम का जन्म होगा... लेकिन 1973 में कहानी वहां तक नहीं पहुंची थी। अभी तो सरकार और अदालत की खींचतान और तेज होनी थी। और दो साल बाद जो हुआ... उसमें इस बार किसी जज की कुर्सी नहीं, खुद प्रधानमंत्री की कुर्सी दांव पर थी।
2. 1975: जब अदालत ने देश के प्रधानमंत्री का चुनाव रद्द कर दिया
चार साल पहले 1971 में इंदिरा गांधी रायबरेली से लोकसभा चुनाव जीती थीं और उनके सामने थे राज नारायण। राज नारायण चुनाव हार गए, लेकिन उन्होंने इंदिरा गांधी की जीत को अदालत में चुनौती दे दी। करीब चार साल तक मामला चला और आखिरकार अदालत ने इंदिरा गांधी के रायबरेली चुनाव को अमान्य घोषित करते हुए उन्हें Corrupt Practice का दोषी ठहराया और छह साल के लिए अयोग्य घोषित कर दिया।
अब ये फैसला कितना बड़ा था, इसे ऐसे समझिए कि ये किसी सामान्य सांसद की सीट का मामला नहीं था। जिस नेता का चुनाव अदालत ने अमान्य घोषित किया था, वही उस वक्त देश की प्रधानमंत्री थीं। यानी हाई कोर्ट के एक फैसले ने सीधे इंदिरा गांधी की राजनीतिक स्थिति को संकट में डाल दिया था। विपक्ष ने इसे बड़ा मुद्दा बनाया और इंदिरा गांधी से इस्तीफे की मांग तेज हो गई। लेकिन इंदिरा गांधी ने इस्तीफा देने के बजाय इलाहाबाद हाई कोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देने का फैसला किया।
24 जून 1975 को सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस वी.आर. कृष्ण अय्यर ने इंदिरा गांधी को अंतरिम राहत दी, लेकिन ये राहत पूरी नहीं थी। हाई कोर्ट के फैसले पर Conditional Stay मिला, जिससे उनकी अयोग्यता फिलहाल स्थगित हो गई और उनकी लोकसभा सदस्यता बनी रही, लेकिन सांसद के तौर पर उनके अधिकार सीमित कर दिए गए। वे लोकसभा की कार्यवाही में हिस्सा नहीं ले सकती थीं और वोट नहीं कर सकती थीं, हालांकि प्रधानमंत्री के तौर पर उनके पद पर बने रहने पर रोक नहीं लगाई गई थी। यानी प्रधानमंत्री की कुर्सी फिलहाल बच गई थी, लेकिन संकट खत्म नहीं हुआ था।
अब तारीखों का ये क्रम समझिए, क्योंकि आगे की पूरी कहानी के लिए यही सबसे जरूरी है। 12 जून को इलाहाबाद हाई कोर्ट का फैसला आया, 24 जून को सुप्रीम कोर्ट से इंदिरा गांधी को सीमित राहत मिली और इसके ठीक अगले दिन 25 जून को जयप्रकाश नारायण ने दिल्ली के रामलीला मैदान में सरकार के खिलाफ बड़ी रैली की। उसी रात देश में Emergency लगाने का फैसला हुआ और 26 जून की सुबह देश को इसकी जानकारी दी गई।
लेकिन यहां यह कहना सही नहीं होगा कि सिर्फ इलाहाबाद हाई कोर्ट के फैसले की वजह से Emergency लगा दी गई थी। उस समय जेपी आंदोलन, सरकार-विरोधी प्रदर्शन और आर्थिक तथा राजनीतिक अस्थिरता जैसे कई दूसरे कारण भी मौजूद थे। लेकिन इस chronology को नजरअंदाज भी नहीं किया जा सकता, क्योंकि जिस वक्त इंदिरा गांधी की सरकार पहले से विपक्ष के भारी दबाव में थी, उसी समय अदालत के फैसले ने खुद प्रधानमंत्री की कुर्सी पर कानूनी संकट खड़ा कर दिया था।
अब लड़ाई सिर्फ इस बात की नहीं थी कि इंदिरा गांधी प्रधानमंत्री रहेंगी या नहीं। असली सवाल ये बनने वाला था कि अगर अदालत प्रधानमंत्री के खिलाफ फैसला दे सकती है, तो क्या संसद अपनी ताकत का इस्तेमाल करके उस फैसले को पलट सकती है? और इसी एक सवाल ने सिर्फ इंदिरा गांधी के चुनाव का भविष्य नहीं बदला, बल्कि संसद, सरकार और न्यायपालिका के बीच ताकत की लड़ाई को एक बिल्कुल नए मुकाम पर पहुँचा दिया।
3. 39वां संविधान संशोधन और Article 329-A का विवाद
प्रधानमंत्री की कुर्सी बचाने की लड़ाई सिर्फ अदालत में नहीं चली, बल्कि संसद तक पहुंच गई। इमरजेंसी के दौरान अगस्त 1975 में 39वां संविधान संशोधन लाया गया और संविधान में आर्टिकल 329-A जोड़ा गया। इस संशोधन के जरिए प्रधानमंत्री के चुनाव से जुड़े विवाद को सामान्य अदालती प्रक्रिया से अलग करने की कोशिश की गई और आर्टिकल 329-A के क्लॉज 4 के जरिए इलाहाबाद हाई कोर्ट के फैसले को निष्प्रभावी करने का रास्ता बनाया गया।
इसी दौरान चुनावी कानूनों में भी पीछे की तारीख से बदलाव किए गए, जिनसे उन कानूनी आधारों पर असर पड़ा जिन पर हाई कोर्ट ने इंदिरा गांधी का चुनाव रद्द किया था... हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने बाद में इसी क्लॉज 4 को असंवैधानिक घोषित कर दिया। यानी सरकार संविधान बदलकर अदालत की ताकत को सीमित करने की कोशिश कर रही थी, लेकिन सुप्रीम कोर्ट बार-बार उसके सामने संवैधानिक सीमा खींच रहा था।
4. ADM जबलपुर केस (1976) और जस्टिस एच.आर. खन्ना का साहस
लेकिन सरकार और सुप्रीम कोर्ट के बीच ये टकराव यहीं खत्म नहीं हुआ। बल्कि कुछ ही महीनों बाद अदालत के सामने एक ऐसा सवाल पहुंचा, जो प्रधानमंत्री की कुर्सी से भी बड़ा था। इमरजेंसी के दौरान विपक्षी नेताओं समेत बड़ी संख्या में लोगों को हिरासत में लिया जा रहा था। अब सवाल था—अगर सरकार किसी नागरिक को जेल में डाल दे, तो क्या वो अदालत से ये पूछ सकता है कि उसे किस कानून के तहत और किस आधार पर बंद किया गया है? मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा और अप्रैल 1976 में पांच जजों की बेंच ने फैसला सुनाया—मामला था ADM जबलपुर बनाम शिवकांत शुक्ला का।
फैसला 4:1 से आया। चार जजों ने इमरजेंसी के उस दौर में सरकार के पक्ष वाली कानूनी स्थिति स्वीकार की। लेकिन पांचवां जज अकेला खड़ा हो गया। उसने सरकार की दलील से असहमति जताई और कहा कि कानून के अधिकार के बिना राज्य किसी व्यक्ति की जिंदगी और व्यक्तिगत स्वतंत्रता नहीं छीन सकता। उस जज का नाम था—जस्टिस एच.आर. खन्ना। लेकिन कहानी का असली ट्विस्ट उनके इस फैसले में नहीं था... असली ट्विस्ट करीब नौ महीने बाद आने वाला था।
जनवरी 1977 में चीफ जस्टिस ए.एन. रे रिटायर होने वाले थे और सीनियरिटी के हिसाब से अगला नंबर जस्टिस एच.आर. खन्ना का था। लेकिन सरकार ने खन्ना को छोड़कर उनसे जूनियर जस्टिस एम.एच. बेग को चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया नियुक्त कर दिया। इसके बाद जस्टिस खन्ना ने इस्तीफा दे दिया। और यहीं वही सवाल दूसरी बार सामने खड़ा था, जिसकी पहली झलक हम 1973 में देख चुके हैं—अगर सरकार के खिलाफ फैसला देने वाले जज के करियर का सबसे बड़ा फैसला भी सरकार के प्रभाव वाली नियुक्ति प्रक्रिया से तय होगा, तो न्यायपालिका की स्वतंत्रता को सुरक्षित कैसे रखा जाएगा?
5. तीन 'Judges Cases': 1981, 1993 और 1998 की पूरी दास्तान
अब आपको लग सकता है कि दो बार ऐसा होने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने जजों की नियुक्ति की ताकत सरकार से लेकर अपने हाथ में ले ली होगी। लेकिन नहीं... अगला फैसला कहानी को ठीक उल्टी दिशा में ले गया।
1981: First Judges Case (S.P. Gupta Case)
1981 में सुप्रीम कोर्ट के सामने S.P. Gupta बनाम Union of India मामला आया, जिसे बाद में First Judges Case कहा गया। और इस बार पूरा विवाद संविधान में लिखे सिर्फ एक शब्द पर टिक गया था—कंसल्टेशन (Consultation)।
संविधान के मुताबिक जजों की नियुक्ति राष्ट्रपति करता है और इसके लिए Chief Justice समेत तय संवैधानिक पदाधिकारियों से consultation किया जाता है। लेकिन सवाल था—क्या consultation का मतलब ये है कि सरकार को Chief Justice की राय माननी ही पड़ेगी? सुप्रीम कोर्ट ने कहा—नहीं। Consultation का मतलब Concurrence यानी अनिवार्य सहमति नहीं है। यानी Chief Justice की राय महत्वपूर्ण थी, लेकिन अंतिम निर्णय में सरकार की भूमिका ज्यादा मजबूत बनी रही।
अब यहां कहानी को रोककर सिर्फ एक चीज समझिए। 1973 में जजों की सीनियरिटी तोड़ी गई... 1977 में खन्ना पीछे किए गए... और 1981 में सुप्रीम कोर्ट ने भी नियुक्तियों में न्यायपालिका को अंतिम शब्द नहीं दिया। यानी जिस समस्या को हम शुरुआत से देख रहे हैं, उसका समाधान अभी तक निकला ही नहीं था। सवाल वहीं था—जज चुनेगा कौन? सरकार... या खुद न्यायपालिका? और इस सवाल का जवाब आने में 12 साल और लगे।
1993: Second Judges Case (कॉलेजियम की असली शुरुआत)
1993 में नौ जजों की सुप्रीम कोर्ट बेंच बैठी। मामला था Supreme Court Advocates-on-Record Association बनाम Union of India, जिसे आज Second Judges Case कहा जाता है। और इस बार सुप्रीम कोर्ट ने 1981 वाली दिशा बदल दी। अदालत ने कहा कि जजों की नियुक्ति में Chief Justice of India की राय को प्राथमिकता (Judicial Primacy) मिलेगी। लेकिन ये अकेले Chief Justice की व्यक्तिगत राय नहीं होगी; CJI अपने दो सबसे वरिष्ठ जजों के साथ मिलकर राय बनाएगा। और यही वो पल था, जिसका जवाब खोजने के लिए हम 2026 से पचास साल पीछे आए हैं।
न संसद ने कोई Collegium Act बनाया... न संविधान में “Collegium” शब्द जोड़ा गया... लेकिन सुप्रीम कोर्ट के इसी फैसले से जजों की नियुक्ति में न्यायपालिका की सामूहिक राय को प्राथमिकता मिली और यहीं से Collegium System की नींव पड़ी।
1998: Third Judges Case (5 जजों का कॉलेजियम)
लेकिन कहानी में अभी एक आखिरी ट्विस्ट बाकी था। क्योंकि 1993 का Collegium आज वाला Collegium नहीं था। सवाल अभी भी बाकी था—Chief Justice कितने जजों से सलाह करेगा? अगर उनमें मतभेद हो जाए तो किसकी चलेगी? और क्या CJI अकेले किसी नाम को आगे बढ़ा सकता है?
इसका जवाब 1998 में आया। राष्ट्रपति ने संविधान के Article 143 के तहत सुप्रीम कोर्ट से राय मांगी और इसी Presidential Reference को आम तौर पर Third Judges Case कहा जाता है। सुप्रीम कोर्ट ने नियुक्ति प्रक्रिया को और स्पष्ट किया—सुप्रीम कोर्ट के जजों की नियुक्ति के लिए Collegium में Chief Justice of India और चार सबसे वरिष्ठ Supreme Court judges, यानी कुल पांच सदस्य होंगे। CJI अकेले अपनी व्यक्तिगत राय से नियुक्ति तय नहीं करेगा।
और अब पूरी कहानी एक लाइन में समझिए—जिस डर की शुरुआत Executive के प्रभाव से हुई थी, उसका जवाब धीरे-धीरे Judicial Primacy बन गया। सरकार की ताकत को सीमित करते-करते भारत ऐसी व्यवस्था तक पहुंच गया, जिसमें जजों की नियुक्ति के लिए सबसे महत्वपूर्ण नाम अब खुद न्यायपालिका तय करने लगी। लेकिन समस्या यहां खत्म नहीं हुई.. बल्कि एक और नया सवाल खड़ा हो गया कि —कॉलेजियम में किसका नाम आगे बढ़ेगा और किसका रुक जाएगा… इसका फैसला आखिर किस आधार पर होगा? और यही सवाल आगे सरकार को NJAC तक ले जाने वाला था।
6. 2014-2015: NJAC का उदय और सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक 4:1 फैसला
लेकिन NJAC था क्या? इसे भी समझिए—जिस कॉलेजियम में जजों की नियुक्ति की सबसे बड़ी ताकत न्यायपालिका के पास थी, NJAC उसी ताकत को बांटने वाला था। यानी अब अगला जज कौन बनेगा, ये फैसला सिर्फ जजों की राय से नहीं होना था... उस टेबल पर न्यायपालिका के साथ सरकार और न्यायपालिका से बाहर के लोग भी बैठने वाले थे।
साल था 2014। नरेंद्र मोदी सरकार सत्ता में आई और इसी साल संसद ने 99वां संविधान संशोधन पारित किया। इसके साथ बनाया गया NJAC (National Judicial Appointments Commission)। इसका काम था हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के जजों की नियुक्ति और हाई कोर्ट के जजों के ट्रांसफर के लिए नामों की सिफारिश करना। यानी अगर ये व्यवस्था पूरी तरह लागू होकर टिक जाती, तो करीब दो दशक से चली आ रही कॉलेजियम व्यवस्था की जगह NJAC ले लेता। लेकिन अब सबसे जरूरी सवाल था—इस नए सिस्टम में जज चुनेगा कौन?
NJAC में कुल छह सदस्य रखे गए—भारत के चीफ जस्टिस, सुप्रीम कोर्ट के दो सबसे वरिष्ठ जज, केंद्रीय कानून मंत्री और दो एमिनेंट पर्सन्स (प्रतिष्ठित व्यक्ति)। यानी छह कुर्सियों में तीन पर सुप्रीम कोर्ट के जज... और बाकी तीन पर न्यायपालिका के बाहर के सदस्य रखे गए। पहली नजर में ये पावर शेयरिंग जैसा दिखाई देता था। लेकिन असली ट्विस्ट इन छह कुर्सियों में नहीं... दो वोटों में छिपा था।
NJAC कानून में व्यवस्था थी कि अगर आयोग के कोई भी दो सदस्य किसी उम्मीदवार के नाम से सहमत नहीं होते, तो उस व्यक्ति की नियुक्ति की सिफारिश नहीं की जाएगी। यानी किसी संभावित जज का नाम रोकने के लिए छह में से सिर्फ दो सदस्यों की असहमति काफी हो सकती थी। और यहीं 1970 के दशक से चली आ रही पूरी कहानी फिर इस नए सिस्टम से टकराने लगी। सवाल उठा—जिस नियुक्ति प्रक्रिया में सरकार के प्रभाव को कम करने के लिए Judicial Primacy और फिर Collegium विकसित हुआ था... क्या केंद्रीय कानून मंत्री को उसी नियुक्ति वाली टेबल पर बैठाकर Executive को फिर से अंदर लाया जा रहा है?
लेकिन दूसरी तरफ NJAC के समर्थन में सवाल भी कम मजबूत नहीं था—अगर जजों की नियुक्ति में सिर्फ जजों की ही निर्णायक भूमिका रहेगी, तो Transparency और Accountability आएगी कैसे? यानी अब टकराव साफ था। एक तरफ न्यायपालिका की स्वतंत्रता... दूसरी तरफ नियुक्ति प्रक्रिया की जवाबदेही। और इस बार संसद ने सिर्फ कोई सामान्य कानून बनाकर प्रयोग नहीं किया था। 99वें संविधान संशोधन के जरिए Article 124A, 124B और 124C संविधान में जोड़े गए। यानी यहां एक दिलचस्प स्थिति बन चुकी थी—जिस Collegium का नाम संविधान में नहीं था, उसे बदलने के लिए बनाई गई NJAC अब संविधान में लिखी जा चुकी थी।
16 अक्टूबर 2015: सुप्रीम कोर्ट ने NJAC को किया रद्द
मामला सुप्रीम कोर्ट पहुँचा और पांच जजों की संविधान पीठ बैठी। तारीख थी 16 अक्टूबर 2015। फैसला आया—4:1 से। सुप्रीम कोर्ट ने 99वें संविधान संशोधन और NJAC कानून को असंवैधानिक घोषित कर दिया। बहुमत का आधार था कि न्यायपालिका की स्वतंत्रता संविधान के Basic Structure का हिस्सा है, और जजों की नियुक्ति में न्यायपालिका की प्रधान भूमिका को इस तरह कमजोर नहीं किया जा सकता। यानी संसद ने संविधान बदलकर जिस NJAC को खड़ा किया था... सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले के बाद वही व्यवस्था टिक नहीं सकी। और इसके साथ कॉलेजियम फिर वापस आ गया।
लेकिन रुकिए... इस फैसले का सबसे दिलचस्प हिस्सा 4 नहीं, वो अकेला “1” था। पांच जजों में जस्टिस जे. चेलमेश्वर अकेले ऐसे जज थे, जिन्होंने NJAC को असंवैधानिक मानने से इनकार किया। और उन्होंने सवाल सरकार के पक्ष में खड़े होकर भर नहीं उठाया था; उनका निशाना उस कॉलेजियम की कमजोरी पर था, जिसके वो खुद हिस्सा बनने वाले थे। उन्होंने कॉलेजियम की पारदर्शिता और जवाबदेही पर गंभीर सवाल उठाए। उनके मुताबिक समस्या ये थी कि जजों की नियुक्ति जैसी महत्वपूर्ण प्रक्रिया के रिकॉर्ड आम लोगों की पहुंच से लगभग पूरी तरह बाहर रहते हैं।
चेलमेश्वर अकेले नहीं थे जिन्हें मौजूदा कॉलेजियम में समस्या दिखाई दे रही थी। NJAC को रद्द करने वाले बहुमत में शामिल जस्टिस कुरियन जोसेफ ने भी माना कि कॉलेजियम में सब कुछ ठीक नहीं है। उन्होंने इसकी Transparency, Accountability पर सवाल उठाये, लेकिन उनका मानना था कि इन कमियों को सुधारकर ठीक किया जा सकता है। यानी सुप्रीम कोर्ट ने NJAC को तो खत्म कर दिया... लेकिन उसी फैसले के अंदर कॉलेजियम की बीमारी भी दर्ज हो चुकी थी।
7. कमरे के अंदर का सच: हाई कोर्ट में जज कैसे चुने जाते हैं?
अब यहां सवाल और पेचीदा हो गया। अगर NJAC निरस्त कर दिया गया है... और कॉलेजियम में भी कमियां हैं... तो जज चुने कैसे जाएंगे? क्योंकि कॉलेजियम वापस तो आ चुका था, लेकिन कॉलेजियम पर उठे सवाल खत्म नहीं हुए थे। और इनमें सबसे बड़ा सवाल वही था, जहां से हमने इस कहानी की शुरुआत की थी—अगर एक सीनियर ज्यूडिशियल ऑफिसर मौजूद है, तो उससे जूनियर व्यक्ति का नाम हाई कोर्ट के जज के लिए आगे कैसे निकल सकता है? आखिर कॉलेजियम किसी नाम को चुनता किस आधार पर है?
इसे समझने के लिए अब इतिहास को यहीं छोड़िए... और सीधे उस कमरे के अंदर चलिए, जहां से एक नाम के हाई कोर्ट जज बनने का सफर शुरू होता है। क्योंकि ये कोई ऐसी परीक्षा नहीं है जिसमें सबसे ज्यादा नंबर आए और आप जज बन गए। हाई कोर्ट में जज दो प्रमुख स्रोतों से आते हैं—बार से वकील और ज्यूडिशियल सर्विस से न्यायिक अधिकारी। और यहीं पहली गलतफहमी टूटती है—सीनियरिटी महत्वपूर्ण है... लेकिन सीनियरिटी अकेली टिकट नहीं है।
किसी हाई कोर्ट में नियुक्ति की प्रक्रिया शुरू होती है, तो सबसे पहले उसी हाई कोर्ट का कॉलेजियम, जिसमें चीफ जस्टिस और उसके दो सबसे वरिष्ठ साथी जज होते हैं, नामों पर विचार करता है। यहां सिर्फ ये नहीं देखा जाता कि कौन कितने साल से सेवा में है। उम्मीदवार की मेरिट (योग्यता), इंटीग्रिटी (ईमानदारी और सत्यनिष्ठा), कानूनी क्षमता, अनुभव और सूटेबिलिटी (उस संवैधानिक पद के लिए उपयुक्तता) जैसे पहलुओं पर विचार किया जाता है।
लेकिन नाम हाई कोर्ट से निकल गया... तो क्या जज बनना तय हो गया? नहीं। असली फिल्ट्रेशन अभी बाकी है। प्रस्ताव राज्य और केंद्र के स्तर पर आगे बढ़ता है। केंद्र सरकार उम्मीदवार के बारे में उपलब्ध रिपोर्ट्स और इनपुट्स जुटाती है। बार से आने वाले उम्मीदवारों के मामले में इंटेलिजेंस ब्यूरो (IB) की जांच भी प्रक्रिया का हिस्सा हो सकती है। फिर ये सामग्री सुप्रीम कोर्ट के सामने पहुंचती है। सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम सिर्फ नीचे से आया नाम पढ़कर उस पर मुहर नहीं लगाता... वो उपलब्ध रिकॉर्ड, सरकार से आए इनपुट्स और संबंधित हाई कोर्ट के मामलों से परिचित सुप्रीम कोर्ट के जजों की राय जैसे पहलुओं पर विचार कर सकता है।
और अब आता है वो हिस्सा, जहां सीनियरिटी और सिलेक्शन अलग हो जाते हैं। मान लीजिए पांच ज्यूडिशियल ऑफिसर हैं। उनमें ए सबसे सीनियर है... बी उससे जूनियर है। लेकिन इसका मतलब ये नहीं कि ए का नाम पहले जाना ही चाहिए। उच्च न्यायपालिका में एलीवेशन यानी उच्च न्यायिक पद पर नियुक्ति को सामान्य डिपार्टमेंटल प्रमोशन की तरह नहीं माना जाता। उपलब्ध सामग्री के आधार पर कॉलेजियम किसी जूनियर उम्मीदवार को ज्यादा सूटेबल यानी उपयुक्त मान सकता है। और यही वजह है कि सिर्फ ये कहना—“मैं सीनियर था, इसलिए मुझे हाई कोर्ट जज बनाया जाना चाहिए था”—अपने आप में नियुक्ति का अधिकार पैदा नहीं करता। क्योंकि अगर सीनियरिटी ही अंतिम पैमाना नहीं है, तो फिर सवाल उठेगा—मेरिट नापी कैसे गई? सूटेबिलिटी तय कैसे हुई? और दो योग्य लोगों में एक आगे और दूसरा पीछे क्यों रह गया?
यही वो जगह है जहां बाहर खड़ा आदमी पूरी तस्वीर हमेशा नहीं देख पाता। हालांकि हाल के वर्षों में सुप्रीम कोर्ट ने कॉलेजियम के रेजोल्यूशन्स यानी फैसलों से जुड़ी जानकारियां और नियुक्ति प्रक्रिया की अधिक जानकारी सार्वजनिक करनी शुरू की है। लेकिन किसी एक उम्मीदवार के मूल्यांकन में कॉन्फिडेंशियल इनपुट्स (गोपनीय जानकारियां), कंसल्टेशन्स (सलाह-मशविरा) और सूटेबिलिटी असेसमेंट (उपयुक्तता का आकलन) जैसे हिस्से हो सकते हैं, जिन्हें सामान्य प्रमोशन की मार्कशीट की तरह पूरी तरह सार्वजनिक करना आसान नहीं है।
8. 2026 हिमाचल मामला और 50 साल पुराना अनसुलझा सवाल
और अब... वापस वहीं आइए, जहां से ये पूरी कहानी शुरू हुई थी। 2026... हिमाचल प्रदेश। एक सीनियर ज्यूडिशियल ऑफिसर अदालत के सामने सवाल लेकर आता है—मुझसे जूनियर नाम आगे कैसे निकल गए?
अब आपको समझ आ रहा होगा कि ये सवाल सिर्फ सीनियरिटी का नहीं था। अगर अदालत इस सवाल की तह तक जाती... तो उसे ये देखना पड़ता कि कॉलेजियम ने किस उम्मीदवार के बारे में क्या मटेरियल यानी सामग्री देखी, किससे क्या कंसल्टेशन यानी सलाह-मशविरा हुआ, किसकी सूटेबिलिटी यानी उपयुक्तता कैसे आंकी गई और आखिर एक नाम दूसरे से बेहतर क्यों माना गया। और आखिर में सवाल किसी एक कैंडिडेट यानी उम्मीदवार का नहीं रह जाता... पूरे कॉलेजियम सिस्टम का हो जाता है।
और शायद कॉलेजियम की पूरी कहानी का सबसे बड़ा विरोधाभास भी यही है। करीब पांच दशक पहले सवाल था—अगर जजों के भविष्य पर सरकार का प्रभाव रहेगा, तो जज सरकार के खिलाफ बेखौफ फैसला कैसे देगा? इसी संघर्ष से ज्यूडिशियल इंडिपेंडेंस मजबूत हुई... जजेज केसेज आए... कॉलेजियम विकसित हुआ... और जब एनजेएसी के जरिए इस ताकत को फिर बांटने की कोशिश हुई, तो सुप्रीम कोर्ट ने ज्यूडिशियल इंडिपेंडेंस के आधार पर उसे भी रद्द कर दिया।
लेकिन आज सवाल का दूसरा सिरा हमारे सामने है—न्यायपालिका को सरकार से स्वतंत्र रखना जरूरी है... लेकिन न्यायपालिका के भीतर होने वाली नियुक्तियों में ट्रांसपेरेंसी यानी पारदर्शिता कितनी होनी चाहिए?
सरकार को बहुत ज्यादा ताकत देंगे... तो सवाल उठेगा कि क्या जज सत्ता के दबाव से पूरी तरह स्वतंत्र रह पाएंगे। और सारी निर्णायक ताकत न्यायपालिका के भीतर रखेंगे... तो सवाल उठेगा कि नाम चुनने के पैमाने और फैसलों की अकाउंटेबिलिटी यानी जवाबदेही कितनी दिखाई देगी। यानी करीब पचास साल बाद भी भारत उसी मूल सवाल का सही जवाब खोज रहा है—जज ऐसा कौन चुने... जो सरकार से भी स्वतंत्र हो, लेकिन जिस व्यवस्था से वो चुना जाए, वो खुद सवालों से ऊपर भी न हो?
तो ज्यूडिशियल इंडिपेंडेंस, कॉन्फिडेंशियलिटी और इंस्टीट्यूशनल फंक्शनिंग के नए सवाल निकलेंगे। कॉलेजियम की कहानी इसलिए सिर्फ इस बात की कहानी नहीं है कि भारत में जज कौन चुनता है... असली सवाल ये है—जज चुनने वालों की ताकत की सीमा आखिर तय कौन करेगा?
