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M+Y समीकरण: मुलायम से अखिलेश तक — क्या सपा की मुस्लिम-यादव सियासत अब खत्म हो रही है?

Wednesday, August 19, 2026 | Wednesday, August 19, 2026 WIB

यूपी की सियासत…हिन्दुस्तान की सबसे बड़ी राजनीतिक प्रयोगशाला रही है ।जहाँ सत्ता सिर्फ़ योजनाओं से नहीं, बल्कि समीकरणों से तय होती है। यहाँ सत्ता का रास्ता सड़कों से नहीं, मुस्लिम गलियों से होकर गुजरता है।.हर चुनाव से पहले नेताओं के कदम इन्हीं गलियों की तरफ़ मुड़ते हैं,जहाँ सियासत में एक फॉर्मूला बार-बार दोहराया जता है —M +Y समीकरण ? यानी Muslim + Yadav गठजोड़ का .. लेकिन सवाल ये है… क्या आज ये समीकरण उतना ही मज़बूत है? या फिर सियासत ने रिश्तों को बदल दिया है?” 

                                    


23 सितंबर 2025 को जब आज़म ख़ान 23 माहिने जेल में रहने के बाद ..जेल से बहार आये …तो सबसे पहले उनके दरवाज़े पर अखिलेश यादव पहुचते है वही अखिलेश, जिनके लिए आज़म सिर्फ एक नेता नहीं, बल्कि सपा की मुस्लिम पोल्टिक्स का सबसे तेज़ हथियार थे ? लेकिन जब आजम पर मुसीबत आई  तो यही  अखिलेश यादव ने उनका साथ छोड़ गए  ?   लेकिन अब वही अखिलेश यादव ,फिर से उसी दरवाजे पर खड़े है जिसका रास्ता पिछले कुछ सालो से वो  भूल गए थे ? लेकिन क्यों ये सबसे बड़ा सवाल है ..आख़िर क्यों  अखिलेश यादव उस नेता से मिलने जाते है, जो जेल से जमनात पर बहार है. जिस पर सौ से ज़्यादा मुकदमे दर्ज हैं, और जिसे अदालत ने दस साल की सज़ा दी है?” चलिए इस विडियो में समझते है ..


इस कहानी की शुरुवात रामपुर की मुलाक़ात से नहीं, बल्कि 6 दिसंबर 1992 के अयोध्या में हुए बाबरी विध्वंश से शुरू होती है ..ये वही तारीख थी जो यूपी की सियासत नया इतिहास लिख रही है ...उस दिन सिर्फ़ एक ढांचा नहीं टूटा  —टूटी थी भारत की राजनीति की रीढ़। और उसी मलबे से निकले थे दो नाम —जिन्होंने आने वाले तीस सालों तक उत्तर प्रदेश की सियासत की दिशा तय की। एक —था   यादव, जिसने कहा ‘मैंने मस्जिद बचाई’।दूसरा — था  मुसलमान, जिसने कहा ‘मैं समाजवाद का सिपाही हूँ।’ये थे  मुलायम सिंह यादव और आज़म ख़ान। 


मुलायम ने उस दौर में कह था “अगर मस्जिद बचाने के लिए गोली चलवानी पड़ी,तो मैंने गोली चलवाई — और अगर ज़रूरत पड़ी तो दोबारा चलवाऊँगा।” 

यही वो बयान —  था  जिसने ‘मुलायम सिंह यादव’ को मौलानाओं का मसीहा। बन दिया .और यही से जन्म हुआ समाजवादी पार्टी की मुस्लिम राजनीति 

का ...मुलायम सिंह यादव,  को इसके बाद  “मौलाना मुलायम”  या मुल्ला मुलायम भी कहा जाने लगा . और मुलायम सिंह यादव। ने इसका फायदा भी  उठाया .. और मुस्लिम तुष्टीकरण को अपनी सियासी रणनीति का हथियार बना लिया ।  


जिस वक्त  मुलायम सिंह यादव  ‘मौलाना मुलायम’ बन रहे थे… उस वक़्त बीजेपी भी एक नई पहचान गढ़ रही थी।”90 के दशक की शुरुआत में भाजपा सिर्फ़ एक पार्टी नहीं थी — वो आंदोलन बन चुकी थी। लालकृष्ण आडवाणी की राम रथ यात्रा, और “राम लला हम आएंगे, मंदिर वहीं बनाएंगे” जैसे नारों ने उसे गांव-गांव तक पहुँचा दिया..यही वो एक वजह थी जिसने 1991 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी ने पहली बार उत्तर प्रदेश की सत्ता हासिल की। और मुख्यमंत्री कल्याण सिंह बने .. यही सरकार थी, जिसके कार्यकाल में 6 दिसंबर 1992 को बाबरी विध्वंस हुआ।


बाबरी ढांचा गिरने के बाद केंद्र सरकार ने कल्याण सिंह की भाजपा सरकार को बर्ख़ास्त कर दिया। राज्य में राष्ट्रपति शासन  लगा दिया गया ..  उस दिन सिर्फ़ एक मस्जिद नहीं गिरी  —भाजपा की पहली यूपी सरकार भी गिर गई । लेकिन..यह पतन अस्थायी था। क्योंकि बाबरी विध्वंस ने बीजेपी के लिए वही किया — जो किसी क्रांति ने अपने नायक के लिए किया हो। उसे “हिंदू अस्मिता” का प्रतीक बना दिया। वहीं दूसरी तरफ़,मुसलमानों में डर गहराया, और उसी डर से निकली मुलायम–आज़म की  मुस्लिम राजनीति।  मुलायम सिंह यादव ने इस डर को राजनीति में बदलने का काम किया। उन्होंने कहा —“मैं वो हूँ जिसने मस्जिद बचाने के लिए गोली चलवाई थी।” और उनका यह बयान मुसलमानों के दिल में उतर गया। और यहीं से “मंडल बनाम कमंडल” की लड़ाई शुरू हुई....... 


1993  मुलायम ने बहुजन समाज पार्टी से हाथ मिलाया। और नारा दिया गया “मिले मुलायम-कांशीराम, हवा में उड़ गए जय श्रीराम!” यह नारा सिर्फ़ एक राजनीतिक गठबंधन नहीं था, यह उस दौर की वैचारिक जंग की घोषणा थी — जहाँ हिंदू राष्ट्रवाद और मुस्लिम तुस्टीकरण आमने-सामने थे।..1993 का चुनाव बीजेपी हार गई। और सत्ता में लौटे मुलायम सिंह यादव,लेकिन इस बार अकेले नहीं। उनके साथ था — रामपुर का एक नेता,जो अब सिर्फ़ विधायक नहीं, बल्कि मुस्लिम राजनीति का चेहरा बन चुका था — आज़म ने मुलायम को “मुस्लिम वोट बैंक” से जोड़ने का पुल बनाया। और मुलयम ने आंजाम को मुस्लिम  सियासत का लीडर बना दिया ? 


राजनीति सिर्फ़ विचारों से नहीं चलती —वो चलती है गणित से, भावनाओं से, और कभी-कभी डर से।  यूपी में करीब 19.3% आबादी  मुसलमानों की  है। यानी — हर पाँच में से एक वोटर मुसलमान है। सत्ता का समीकरण हमेशा इस समुदाय से होकर गुजरता रहा है । 1970 और 80 के दशक तक, मुसलमान कांग्रेस के साथ थे।पर 1989 के बाद माहौल बदला — दंगे बढ़े, और कांग्रेस का भरोसा घटा। और मुसलान  समाजवादी हो गए ?


राजनीति के लिए यह सिर्फ़ एक संख्या नहीं… बल्कि सत्ता तक पहुँचने की ‘चाबी ’ है। जब यही मुस्लिम वोट किसी एक पार्टी के पक्ष में एकजुट होता है, तो यह कई सीटों के परिणाम बदल देता है, खासकर उत्तर और पूर्वी यूपी में।...यूपी  की राजनीति में एक फॉर्मूला बार-बार दोहराया गया — M + Y समीकरण: का.... इसी  समीकरण के दम पर, मुलायम सिंह यादव तीन बार उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बने —और अब उसी रहा पर अखिलेश यादव भी चल पड़े है  इसी  वोट बैंक की चाहत ने अखिलेश यदाव को अजाम खान तक खींचकर ले गयी ... 


यपी में 19 % मुस्लिम है और 8 से 10% यादव है  जो मिलकर लगभग 30% हो जता है .मुलायम सिंह ने इसे अपने राजनीतिक हथियार के रूप में इस्तेमाल किया: और अब अखिलेश यादव  भी उसी फॉर्मूले  पर आगे बढ़ रहे है ... लेकिन हालात  पहले जैसे नहीं है  M+Y समीकरण अब उतना असरदार नहीं रहा: है ...जितना मुलायाम यादव के समय में था ... इसे ऐसे समझिये की 2012 के विधानसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी ने 403 में से 224 सीटें जीत लीं.. और पहली बार यादव परिवार का सबसे युवा चेहरा मुख्यमंत्री बना नाम था अखिलेश यादव... उस समय अखिलेश यादव. 38 साल के थे —और उत्तर प्रदेश के इतिहास में सबसे युवा मुख्यमंत्री थे । यह खुद में एक रिकॉर्ड था —एक ऐसी पार्टी के लिए जो दशकों तक सिर्फ़ “मुलायम सिंह यादव” के नाम पर चलती थी, अब एक नई पीढ़ी को देख रही थी।


“लेकिन सत्ता जितनी  तेजी से ऊपर ले जाती है…वह उतनी ही आसानी से गिरा भी देती है। 2017 — में सपा टूटी, परिवार बंटा, और आज़म ख़ान, जो कभी ‘अब्बा जान’ कहलाते थे, वो अचानक ‘राजनीतिक बोझ’ बना दिए गए। अखिलेश ने नए चेहरों की बात की… लेकिन पुराने चेहरों की तकदीरें अंधेरे में छोड़ दीं गयी  ।” .. यही पुराने चेहरे मुसलमान और यादव वोटरों के  भरोसे  के सूत्रधार थे ... जिन्हें अखिलेश  यादव ने धीरे धीरे  साईडलाइन कर दिया... जिसने न सिर्फ पार्टी को नुक्सान पहुचाया  बल्कि, M + Y समीकरण की नीव भी हिलाकर रख दी  .. भाजपा ने इस अवसर  का फ़ायदा  उठाया  और राम मंदिर मुद्दे और हिंदू वोट बैंक ने सपा के समीकरण को खतम कर दिया .. और उसके बाद से आज तक सपा की सरकार यूपी में नहीं बन पाई ... 

 


लेकिन कहानी का अंत यही नहीं हुआ ...2017 में जब योगी आदित्यनाथ ने यूपी की सत्ता संभाली..तो.. उत्तर प्रदेश की सियासत एक और नया इतिहास लिखा ...आज़म ख़ान  पर  81 से ज़्यादा मामले अकेले योगी राज में दर्ज हुए। सिर्फ 2019 में ही उन पर 70 से ज़्यादा मुकदमे ठोक दिए गए। यानी योगी सरकार ने जैसे कसम खा ली थी—की रामपुर का किला ढहाकर ही छोड़ेंगे।’” यही वजह है कि जिस आज़म ख़ान को कभी ‘सियासत का सुल्तान’ कहा जाता था…आज वो योगी के राज में कै़दी बनकर रह गए हैं। 


लेकिन जब अजाम जेल गए उनके घर की दीवारों पर  बुलडोज़र चले .. तो सिर्फ़ ईंटें नहीं टूटीं…एक  यक़ीन भी टूटा जो मुसलमानों कोअखिलेश यादव से था 

क्योकि अजाम के जेल जाने के बाद ..अखिलेश यादव उस ताकत के साथ अजाम के साथ नहीं खड़े हुए .. जिस ताकत के साथ खडा होना चाहिए था तब न सिर्फ आजाम ने बल्कि रामपुर के मुस्लिमो ने पुछा —की क्या समाजवाद सिर्फ़ तब तक था, जब तक वोट चाहिए थे?”और अब --जब आज़म जेल २३ महीनो के बाद से बाहर आए हैं - तो उनके गेट पर वही चेहरा खड़ा है, जो कभी मुंह मोड़ चुका था —अखिलेश यादव।   ये मुलाक़ात सिर्फ़ दो लोगों की नहीं है। ये एक संकेत है शायद, एक नई सियासी सौदेबाज़ी की शुरुआत का ।”क्या अखिलेश फिर उसी पुराने रास्ते पर लौट रहे हैं —जिस पर कभी मुलायम चले थे .. या फिर वो अपनी एक नयी कहानी लिख रहे है ... 


अखिलेश यादव की मुस्लिम तुस्टीकरण पोल्टिक्स ने   गैर-मुस्लिम समुदायों में यह धारणा गहराई है कि SP केवल “एक वर्ग की पार्टी” बनकर रह गई है।   और इस सोच ने SP को अपने ही दायरे में सीमित कर दिया। गैर मुस्लिम अब  समाजवादी पार्टी को वोट करने में १० बार सोचते है ... यही वजह है की जिस समीकरण के दम पर तीन बार  मुलायाम सिंह और एक बार अखिलेश यादव सीएम बने अब वह फेल हो गया है .. कभी- कभी  राजनीति में जो आधार मज़बूती देता है, वही बंदिश भी बन जाता है। मुस्लिम वोट बैंक ने SP को ताकत दी, पर यही ताकत अब उसके विस्तार की दीवार बन चूका है। अखिलेश यादव आज भी कहते हैं कि SP अल्पसंख्यकों के साथ है, पर विरोधियों का तर्क है — “यह सिर्फ़ चुनावी जुमला है।” जो सिर्फ बयानों और भाषणों में दीखता है ? “समाजवादी पार्टी की कहानी सिर्फ़ एक पार्टी की नहीं  है —यह उस सियासत की गवाही है जहाँ धर्म और सत्ता हमेशा साथ चलते हैं…पर कभी एक दिशा में नहीं।” seen by seen image ke liye promt do 

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