क्या भारत और रूस की दोस्ती अब खत्म होने वाली है? क्या भारत ने अपने उस दोस्त का हाथ छोड़ दिया है .जिसने 1971 की जंग में भारत के लिए अमेरिका के सामने दिवार बनकर खडा हो गया था .? आज वही रूस भारत से दोस्ती की कीमत मांग रहा है। सवाल ये नहीं कि भारत और रूस की दोस्ती टूटी है या नहीं... सवाल ये है जिसने आधी सदी तक हमारा साथ दिया? सवाल ये है कि क्या हम इतने कमजोर हो चुके हैं कि हमारी विदेश नीति अमेरिका के 'मूड' पर चलेगी? 1971 में रूस बिना किसी छूट या शर्त के खड़ा था। आज अमेरिका अपनी शर्तों पर हमें 'परमिशन' दे रहा है। क्या यही है 'विश्वगुरु' की स्वतंत्र नीति? या फिर हम अनजाने में अमेरिका के उस जाल में फंस चुके हैं जहाँ से निकलना नामुमकिन है?" क्या हमें रूस के साथ खड़े रहना चैये या फिर अमेरिका के साथ ....
आखिर ऐसा क्या हुआ जिसने भारत और रूस की दोस्ती को इस मोड पर ला कर खडा कर दिया है चलिए कुछ आकड़ो से समझते है ...
रूस भारत को वो दोस्त है ..जो हर मुश्किल वक्त में भारत के साथ खडा रहा है ... लेकिन हाल में हुई कुछ घटनों ने इस दोस्ती को कमजोर किया है .. खाकर वो फैसले जो . भारत और रूस की दोस्ती तोड़ने के लिए अमेरिका से आते है ... फिर चाहे अमेरिका का भारत के रूसी तेल खरीदने पर पाबंदी लगाना हो .. या भारत को अमेरिका से हथियार और तेल खरदने के लिए .. मजबूर करना हो ? इसे ऐसे समझिये की 2000 से 2010 के बीच भारत के लगभग 70% हथियार रूस से आते थे। लेकिन 2020 के बाद यह हिस्सेदारी घटकर लगभग 40% के आसपास रह गई है।
भारत अब फ्रांस से राफेल, अमेरिका से प्रीडेटर ड्रोन और इजरायल से मिसाइल डिफेंस ले रहा है। पिछले 24 महीनों में भारत ने अमेरिका के साथ $3.9 बिलियन के 'MQ-9B प्रीडेटर ड्रोन' और GE-F414 जेट इंजन की डील फाइनल की है।... ये सिर्फ बिजनेस नहीं है, ये रूस के साथ उस रणनीतिक दूरी का संकेत है... जो आज भारत और रूस की दोस्ती को कमजोर कर रहे है.....
आज पूरा मिडिल ईस्ट बारूद के ढेर पर बैठा है। तेल की कीमतें आसमान छू रही हैं। पाकिस्तान जैसे मुल्क कंगाली की कगार पर हैं, जहाँ दफ्तर और स्कूल तक बंद करने पड़ रहे हैं। ऐसे वैश्विक हाहाकार के बीच भारत के पास एक ढाल थी—रूस का सस्ता तेल! यूक्रेन युद्ध के बाद रूस ने भारत को सस्ता तेल दिया। 2023 में रूस भारत का सबसे बड़ा तेल सप्लायर भी बना । लेकिन पिछले कुछ महीनों में रूसी तेल आयात में गिरावट देखी गई। हमने कहा था हम सस्ता तेल खरीदेंगे। लेकिन हकीकत? तो ये है की अमेरिकी पाबंदियों और कई तरह कई तरह के 'प्राइस कैप' और (प्रतिबंधों) ने भारतीय बैंकों को इतना डरा दिया है कि फरवरी 2026 तक रूसी तेल का आयात 22% गिर चुका था .... भारतीय बैंकों को इतना डरा दिया कि अब भारतीय रिफाइनरीज रूसी तेल के लिए भुगतान करने से कतरा रही हैं। आज रूस के पास भारत के 40 बिलियन डॉलर के करीब रुपये हैं। जिन्हें रूस कही उपयोग नहीं कर पा रहा है ....
लेकिन जिस अमेरिका के दर से भारत की की कम्पनियों ने रूस से तेल लेना कम किया .. आज वही अमेरिका भारत को रूस से तेल खरीदने की स्पेशल छूट' (Exemption) दे रहा है। लेकिन अब रूस ने साफ़ कर दिया की तेल तो मिलेगा लेकिन .. किसी छूट पर नहीं .. बल्कि उसके तय किये गए दामो पर ..... और जो तेल रूस से हमें सस्ते दामो पर मिल रहा था आज वो महगे दामो पर मिलेगा ..सरकार का तर्क है कि चीन को रोकने के लिए अमेरिका जरूरी है। लेकिन हकीकत ये है की अमेरिका भारत को 'क्वॉड' (QUAD) जैसे समूहों में फंसाकर रूस से पूरी तरह काट देना चाहता है।" आज रूस और चीन का 'नो-लिमिट्स' गठबंधन मजबूत हो रहा है। अगर कल को चीन के साथ युद्ध हुआ, तो क्या अमेरिका वाकई जमीन पर हमारे लिए लड़ेगा? या फिर हमने अपने उस पुराने दोस्त को खो दिया है जो 1971 में हमारे लिए खुलकर खडा था !
मोदी की विदेश नीति ने भारत को 'विश्वगुरु' बनाने का सपना तो दिखाया, लेकिन क्या इस प्रक्रिया में हमने अपनी 'स्वतंत्रता' खो दी है? क्या हम अब अमेरिका के जूनियर पार्टनर बन चुके हैं? आंकड़े तो यही गवाही दे रहे हैं कि वफादारी अब व्यापार बन चुकी है।" क्या भारत अपनी इस कूटनीति की भारी कीमत चुकाएगा? आपकी क्या राय है? कमेंट में जरूर बताएं।

