जिस ‘सिंघम’ IPS ऑफिसर ने… कानून की वर्दी छोड़कर बीजेपी ज्वाइन की ......जिसने बीजेपी की जीत के लिए अपना सब कुछ दांव पर लगा दिया... आज बीजेपी ने उसे ही साइड लाइन कर दिया है .. पहले टी राजा सिंह, फिर नूपुर शर्मा और अब... के. अन्नामलाई! ये वो नाम हैं…जो या तो पार्टी से दूर हो गए…या फिर पार्टी ने ही उन्हें हाशिए पर धकेल दिया…”“तो क्या बीजेपी… वही गलती दोहरा रही है…जो आज से कई दशक पहले कांग्रेस ने की थी?” क्यों बीजेपी अपने ही वफादार सिपाहियों को मुश्किल वक्त में अकेला छोड़ देती है .... और क्या अब टी राजा सिंह, की तरह . के. अन्नामलाई भी बीजेपी छोड़ देंगे ! चलिए समझते है इस एक विडियो में ..
ये कहानी है उस ‘सिंघम’ IPS ऑफिसर के. अन्नामलाई की, जिन्होंने सियासत के लिए कानून की वर्दी छोड़कर 2019 में बीजेपी ज्वाइन की। और 2021 में तमिलनाडु बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष बने । वो लगभग 4 साल तक यानी (2021 से 2025 तक.तमिलनाडु BJP का मुख्य चेहरा रहे. 2011 बैच के इस जांबाज अफसर ने जब बेंगलुरु के DCP (South) का पद छोड़ा, तो उसने सिर्फ नौकरी नहीं छोड़ी थी, उसने अपना पूरा कैरियर दाव पर लगा दिया...के. अन्नामलाई ने बीजेपी के वोट शेयर को शून्य से उठाकर दहाई के आंकड़े (11%) तक पहुँचाया, लेकिन आज उसी सुपर 'कॉप' को बीजेपी ने साइड लाइन कर दिया है . जिसके लिए उसने IPS की नौकरी छोड़ी थी,.......
ये कहानी सिर्फ के.अन्नामलाई की नहीं है। जिन्हें ऐसे पार्टी ने अकेला छोड़ दिया है.. इसके पहले टी रजा सिंह .. नुपुर शर्मा जैसे कार्यकर्ताओं को भी बीजेपी उनके मुश्किल वक्त में उन्हें अकेल छोड़ चुकी है ...नूपुर शर्मा को याद कीजिए? पार्टी की सबसे प्रखर प्रवक्ता, जिसने पार्टी की ढाल बनकर पूरी दुनिया से लोहा लिया। लेकिन जब कट्टरपंथियों ने उन्हें घेरा , तो पार्टी ने 'फ्रिंज एलिमेंट' कहकर.. निलंबित कर दिया . कुछ ऐसा ही टी राजा सिंह, के साथ भी हुआ जिसने अपने दम पर तेलंगाना में केसरिया लहरया.. उसे भी 'अनुशासन' की बेड़ियों में ऐसे जकड़ा गया .की उसने बीजेपी ही छोड़ दी..... ये लिस्ट सिर्फ दो या तीन नामो की नहीं है ... इसमें ऐसे सैकड़ो नाम है . जिनका आज बीजेपी में दम घुट रहा है ..
क्योकि सत्ता के समीकरणों और गठबंधन की मजबूरी के लिए बीजेपी अपने ही लोगों की 'कुर्बानी' दे रही है ..जो खुद को 'कार्यकर्ता आधारित' पार्टी कहती है? आज वो सिर्फ चंद लोगो के फैसलो से चलती है नूपुर हो, राजा सिंह हो या अन्नामलाई... पैटर्न बिल्कुल साफ है: जब तक बीजेपी को भीड़ चाहिए, तब तक आप 'हीरो' हैं, और जैसे ही काम निकल गया, आप 'जीरो' हो जायेंगे ..
के. अन्नामलाई ने IPS की वर्दी, रुतबा, पावर.. इसलिए छोड़ा था . ताकि तमिलनाडु की उस जमीन पर भगवा लहरा सके जहाँ 'हिंदी' और 'हिंदुत्व' को गाली देना सबसे बड़ी राजनीति है। अन्नामलाई ने वो किया जो दिल्ली में बैठे सूट-बूट वाले रणनीतिकार सोच भी नहीं सकते थे। उन्होंने भीड़ जुटाई, उन्होंने डीएमके (DMK) के भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज उठई ..लेकिन जैसे ही अन्नामलाई का कद बढ़ा...तो दिल्ली बैठे हाई कमान ने उनका कद छोटा कर दिया .
BJP ने अन्नामलाई की जगह पर AIADMK के पूर्व मंत्री नैनार नागेंद्रन जैसे नए चेहरे को आगे बढ़ाया – और के. अन्नामलाई को अध्यक्ष पद से हटाकर नयनार नागेंद्रन को कमान सौंप दी।और ऐसा इसलिए किया गया .. क्योकि के. अन्नामलाई' पार्टी के नए 'कॉर्पोरेट' ढांचे में फिट नहीं बैठ रहे थे ? .. .वो उस AIADMK के नेताओं के खिलाफ खुलकर बोल रहे थे .. जिससे बीजेपी का हाई कमान गठबंधन कर चूका था ...
अन्नामलाई ने कोयंबटूर में साढ़े चार लाख लोगों का दिल तो जीत लिया , लेकिन वो दिल्ली में बैठे अपने ही आकाओं का भरोसा हार गए। क्यों? क्योंकि उन्होंने उस AIADMK के खिलाफ सियासी लडाई लदी , जिसके कदमों में बीजेपी ने आज अपनी पूरी विचारधारा गिरवी रख दी है। बीजेपी आज वही ऐतिहासिक गलती कर रही है जो कभी कांग्रेस ने की थी— और उसका नतीजा ये हुआ की आज कांग्रेस वेंटिलेटर पर है .. और पार्टी के अस्तित्व के लिए अंतिम लडई लड़ रही है अगर अन्नामलाई, नूपुर और राजा सिंह जैसे सिपाही किनारे लगाए गए... तो याद रखना, सत्ता तो बच जाएगी, लेकिन वो 'विचारधारा' मर जाएगी जिसके लिए कार्यकर्ता अपनी जान देता है। क्या आपको लगता है कि बीजेपी अपने ही शेरों का शिकार कर रही है? क्या नूपुर और राजा सिंह के बाद अब अन्नामलाई की बारी है? अपनी राय कमेंट में बेबाकी से लिखें।"

