हिंदुस्तान के वो पड़ोसी मुल्क जो कल तक 'भारत के खिलाफ कैंपेन' चला रहे थे... जो भारत के सैनिकों को देश से निकालने की धमकियां दे रहे थे... आज वही पड़ोसी देश भारत से मदद मांग रहे हैं! वो भी ऐसे वक्त में, जब मिडिल-ईस्ट की जंग ने दुनिया के दर्जनों देशों को 'Survival Mode' पर लाकर खड़ा कर दिया है। .
लेकिन सवाल ये नहीं की ये मदद मांग रहे है... सवाल तो ये है की क्या ईरान युद्ध ने भारत के दुश्मनों को उसका दोस्त बनने पर मजबूर कर दिया है? या फिर ये किसी बहुत बड़े 'International Agenda' का हिस्सा हैं? चलिए, इस दो मिनट की रिपोर्ट में समझते हैं!...
Middle East में जारी जंग ने दुनिया की लाइफलाइन—Strait of Hormuz—पर संकट खड़ा कर दिया है। दुनिया का 20% और एशिया का 90% कच्चा तेल इसी पतले से समुद्री रास्ते, 'स्ट्रेट ऑफ होर्मुज' से होकर गुजरता है। लेकिन ईरान युद्ध की वजह से ये रूट अब एक 'वॉर ज़ोन' बन चुका है। । बांग्लादेश, श्रीलंका और मालदीव जैसे देश, जो पहले से ही आर्थिक चुनौतियों से जूझ रहे थे, इस क्राइसिस ने इन देशों की हालत और खराब कर दी है। . वैसे तो Strait of Hormuz' पश्चिमो देशो के लिए पूरी तरह से बंद है .लेकिन भारत के लिए इरान 'स्ट्रेट ऑफ होर्मुज' के दरवाजे खोल दिए हैं। ईरान ने आधिकारिक तौर पर भारत को उन 5 'मित्र देशों' में शामिल किया है जिन्हें युद्ध के बीच भी 'Strait of Hormuz' से सुरक्षित निकलने के लिए 'Safe Passage' दिया जाएगा।
ये भारत की कूटनीति का ही नतीजा है कि जहाँ दुनिया इस वक्त इतिहास के उस खतरनाक मोड़ पर है। जहाँ 20 से ज्यादा मुल्क 'Survival Mode' पर हैं ऐसे वक्त में भारत के 'जग वसंत' और 'शिवालिक' जैसे टैंकर ईरान की सुरक्षा गारंटी के बीच सीना तानकर निकल रहे हैं। जबकि भारत पडोसी मुल्क आयल क्राईसिस से गुजर रहे है.. नाइजीरिया से लेकर अर्जेंटीना और पाकिस्तान और श्रीलंका तक, 'डिफ़ॉल्ट' होने का डर हर दरवाजे पर दस्तक दे रहा है।
बांग्लादेश जो अपनी 95% तेल जरूरतों के लिए इम्पोर्ट पर निर्भर यह देश आज पावर कट्स और इंडस्ट्रियल शटडाउन से जूझ रहा है। तारिक रहमान की नई सरकार, जिसने शुरुआत में भारत से दूरियां बनाई थीं, अब Survival के लिए दिल्ली से मदद मांग रही है। भारत ने भी पुरानी कड़वाहट को भुलाकर 'Friendship Pipeline' के जरिए हाई-स्पीड डीजल की सप्लाई बढ़ा दी है। मालदीव के राष्ट्रपति मोहम्मद मुइज्जू, जिनका पूरा इलेक्शन कैंपेन ही 'India Out' कैम्पेन पर टिका था, जो आज से ढाई साल पहले मालदीव से भारतीय सैनिकों को बाहर निकालने का अल्टीमेटम डे रहे थे , आज भारत को अपना 'Trusted Partner' बता रहे हैं। ये वही देश है जो कल तक चीन के इशरे पर .. भारत के खिलाफ खड़े थे ...
लेकिन आज मुश्किल की इस घड़ी में, वही चीन इन्हें अकेला छोड़ चुका है। अब बांग्लादेश, नेपाल और मालदीव जैसे मुल्कों को ये कड़वा सच समझ आ चुका है कि बीजिंग सिर्फ 'Debt Trap' बिछा सकता है, 'Emergency Support' नहीं! और यही हाल श्रीलंका का भी है—जहाँ 2022 जैसा Economic Collapse फिर से दस्तक दे रहा था, वहाँ भारत ने 'First Responder' की भूमिका निभाते हुए सिर्फ 24 घंटों के अंदर 38,000 मीट्रिक टन फ्यूल कोलंबो डिलीवर कर दिया। और पूरी दुनिया को दिखा दिया कि Crisis के वक्त असली भाई बनकर कौन खड़ा होता है!
भारत सिर्फ बंगलदेश .मालदीव या श्रीलंका की मादद ही नहीं कर रहा है . भारत ,नेपाल (Nepal) और भूटान (Bhutan) जैसे लैंडलॉक्ड देशों के लिए भी एक लाइफलाइन बना हुआ है। युद्ध के इस दौर में भी भारत ने इनकी सप्लाई को Uninterrupted (बिना किसी रुकावट के) जारी रखा है। ये फर्क है भारत और चीन में—चीन कर्ज के जाल में फंसाता है, और भारत संकट में भाई बनकर साथ निभाता है।
भारत के पास फिलहाल 2 महीने का Fuel Reserve है, जो हमें एक मजबूत स्थिति में रखता है। MEA का मैसेज क्लियर है—अपनी घरेलू जरूरतों का आकलन करने के बाद हम पड़ोसियों की हर संभव मदद करेंगे। इस पूरे घटनाक्रम का मैसेज लाउड एंड क्लियर है—साउथ एशिया की Energy Security का सेंटर सिर्फ और सिर्फ भारत है। नफरत के कैंपेन्स के बीच भारत ने अपनी Soft Power और Hard Infrastructure से साबित कर दिया है कि वह इस क्षेत्र का असली लीडर है।
इतिहास गवाह है कि जब-जब इन देशों पर संकट आया, भारत 'फर्स्ट रिस्पॉन्डर' बना। लेकिन जैसे ही हालात सुधरे, इन देशों ने फिर से चीन का 'हैंडलूम' ओढ़ लिया। क्या मालदीव, नेपाल या बांग्लादेश का भारत की ओर मुड़ना एक ईमानदार दोस्ती की शुरुआत है, या फिर यह सिर्फ तब तक का नाटक है जब तक मिडिल-ईस्ट की जंग शांत नहीं हो जाती और चीन फिर से इन्हें कर्ज देने की स्थिति में नहीं आ जाता? डिप्लोमेसी इमोशन्स से नहीं, बल्कि Solid Action से चलती है। और भारत ने इसे बखूबी कर दिखाया है। इस पूरे मुद्दे पर आपका क्या सोचना है? कमेंट्स में जरूर बताएं।"

