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असम चुनाव: CM सरमा का वो 'मास्टरस्ट्रोक' जिसने वोटिंग से पहले ही बदल दी असम की सियासत!

Friday, March 20, 2026 | Friday, March 20, 2026 WIB

असम विधानसभा चुनाव की आहट के साथ ही राज्य का सियासी पारा सातवें आसमान पर है। वोटिंग की तारीखें नज़दीक हैं, लेकिन उससे ठीक पहले मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा ने एक ऐसी चाल चली है, जिसने विपक्ष के सारे समीकरण बिगाड़ दिए हैं।

आज हर तरफ एक ही सवाल है—क्या ये सिर्फ एक चुनावी दांव है या फिर असम के भविष्य को बदलने वाला 'मास्टरस्ट्रोक'?

सियासत का 360 डिग्री टर्न

सीएम सरमा ने पिछले कुछ दिनों में एक के बाद एक ऐसे कई बड़े फैसले लिए हैं, जिन्होंने असम की सियासत को 360 डिग्री घुमा दिया है। चाहे वो बाल विवाह पर कड़ी कार्रवाई हो, मुस्लिम मैरिज एक्ट को खत्म करना हो, या फिर डेमोग्राफिक बदलाव पर उनके कड़े एक्शन। सीएम सरमा के इन फैसलों ने वोटिंग से पहले ही जैसे नतीजा तय कर दिया है। आखिर वो कौन सा फैसला है जिसने वोटिंग से ठीक पहले असम में 'सियासी भूचाल' ला दिया है? चलिए इस रिपोर्ट में विस्तार से समझते हैं।


असम की डेमोग्राफी: आंकड़ों का खेल या भविष्य का डर?

असम की राजनीति को समझने के लिए आपको यहाँ की 'डेमोग्राफी' यानी जनसांख्यिकी को समझना होगा। 1951 से लेकर अब तक असम के कई जिलों में जनसंख्या का संतुलन पूरी तरह बदल चुका है।

  • 1951 में मुस्लिम आबादी: लगभग 24.68% के आसपास थी।

  • 2011 में मुस्लिम आबादी: यह बढ़कर करीब 34.22% तक पहुंच गई।

  • वर्तमान स्थिति: 6 दशकों में लगभग 10% की वृद्धि हुई है—और ये तब है जब ये आंकड़े एक दशक पुराने हैं।

दावा तो यह भी है कि 2026 तक यह आंकड़ा 35-36% को भी पार कर सकता है, जिसने असमिया समाज के भीतर अपनी पहचान खोने का डर पैदा कर दिया है। आज असम के 34 में से 9 से 11 जिले मुस्लिम बहुल हो चुके हैं। यह सिर्फ एक आंकड़ा नहीं, बल्कि असम का सबसे बड़ा राजनीतिक फैक्टर बन चुका है।


तुष्टिकरण का अंत: जमीन पर कड़े एक्शन

एक समय था जब असम की राजनीति में तुष्टिकरण हावी था। वोट बैंक के नाम पर फैसले लिए जाते थे और बयान भी उसी हिसाब से दिए जाते थे। लेकिन आज तस्वीर बदल चुकी है। पिछले कुछ महीनों में असम की राजनीति में जो कुछ भी हुआ है, वैसा इतिहास में शायद ही पहले कभी हुआ हो।

सीएम हिमंता बिस्वा सरमा का खुलकर मिया मुस्लिमों के खिलाफ बोलना, अपराधियों और घुसपैठियों के खिलाफ 'जीरो टॉलरेंस और सख्त एनकाउंटर पॉलिसी' और 'मुस्लिम मैरिज एंड डाइवोर्स रजिस्ट्रेशन एक्ट' को खत्म करना—यह सब असम की सियासत में एक नया अध्याय लिख रहा है। वे सिर्फ इशारों में नहीं, बल्कि जमीन पर एक्शन ले रहे हैं। सरकारी बुलडोजर आज उन इलाकों में गरज रहे हैं जहाँ सत्रों और जंगलों की भूमि पर अवैध कब्जे थे।


परिसीमन (Delimitation): सरमा का 'ब्रह्मास्त्र'

राजनीति भावनाओं से शुरू होती है, लेकिन जीती गणित से जाती है। और सरमा सियासी गणित के उस्ताद हैं। चुनाव आयोग द्वारा किया गया 'परिसीमन' सरमा की रणनीति का वो ब्रह्मास्त्र है जिसने विपक्ष के सुरक्षित किलों को कागजों पर ही ढहा दिया है।

आंकड़े गवाही दे रहे हैं कि इस नई व्यवस्था के बाद असम की 126 में से करीब 90 से 100 सीटें ऐसी हो गई हैं, जो इस चुनाव में जीत और हार तय करेंगी। इसके पहले ऐसी कई सीटें थीं जहाँ कांग्रेस और एआईयूडीएफ (AIUDF) का एकतरफा राज था, लेकिन सरमा की एक चाल ने विपक्ष को चुनाव लड़ने से पहले ही मानसिक रूप से हरा दिया है। कांग्रेस अब असम में अपनी ज़मीन तलाश रही है, जबकि बदरुद्दीन अजमल का 'किंगमेकर' बनने का सपना धुंधला पड़ता दिख रहा है।


विपक्ष का 'धर्मसंकट'

सरमा की रणनीति ने विपक्ष को दो गुटों में बाँट दिया है:

  1. वो जो खुलकर मिया मुस्लिमों का विरोध नहीं कर पा रहे।

  2. वो जो विरोध करके हिंदू वोटों को और ज़्यादा एकजुट कर रहे हैं।

विपक्ष इस वक्त एक ऐसे 'धर्मसंकट' में फंसा है जहाँ से निकलना नामुमकिन लग रहा है। अगर कांग्रेस अजमल के साथ हाथ मिलाती है, तो असम का हिंदू वोटर छिटक जाता है, और अगर अकेले लड़ती है, तो मिया वोटों का बंटवारा उसे सत्ता की रेस से बाहर कर देता है। जहाँ पहले नेता इफ्तार पार्टियों में टोपी पहनकर हर समुदाय को खुश करने की कोशिश करते थे, वहीं अब सरमा ने खुलकर कह दिया है कि उन्हें 'मिया वोटों की कोई जरूरत नहीं'


निष्कर्ष: क्या होगा 2026 का अंजाम?

असम का यह चुनाव सिर्फ एक मुख्यमंत्री का भविष्य तय नहीं करेगा, बल्कि यह भारत की नई पॉलिटिक्स और असम का भविष्य तय करेगा। मुख्यमंत्री का स्पष्ट संदेश है—उनकी सरकार असम के लोगों के हितों से कोई समझौता नहीं करेगी।

तो क्या हिमंता बिस्वा सरमा की ये 'जादुई चाल' उन्हें दोबारा सत्ता के सिंहासन तक ले जाएगी? या फिर जनता इस बार कुछ और ही सोच रही है? ये तो आने वाला वक्त ही बताएगा।


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