जिस पश्चिम बंगाल में आज तक BJP अपना मुख्यमंत्री नहीं बना सकी… जहां 2011 से २०२६ तक ममता बनर्जी की हुकूमत कायम रही ..आज उस पश्चिम बंगाल में BJP ‘पूर्ण बहुमत’ की सरकार बनाने का दावा कर रही है! तो क्या अजादी 79 साल बाद 2026 में बंगाल के चुनावी इतिहास में एक नया अध्याय लिखा जाएगा? क्या 20 साल कांग्रेस, 34 साल के वामपंथ और 15 साल ममता की हुकूमत के बाद . बंगाल में 'कमल' का नंबर लगने वाला है? आखिर क्यों... 70% हिंदू आबादी वाले राज्य में हिंदुत्व का एजेंडा सत्ता की दहलीज पर आकर दम तोड़ देता है? चलिए इस रिपोर्ट
पश्चिम बंगाल... एक ऐसा राज्य जहाँ भाजपा आज तक अपना मुख्यमंत्री नहीं बना सकी। 1947 के बाद… पश्चिम बंगाल में सबसे पहले कांग्रेस का दबदबा रहा.लगभग 20 साल तक… कांग्रेस ने इस राज्य की सत्ता संभाली…1977 से 2011 तक 34 साल…लेफ्ट फ्रंट का शाशन रहा ..जबकि प्रधानमंत्री से लेकर गृहमंत्री तक सभी ने पश्चिम बंगाल की गलियों में बीजेपी की जीत के लिए पसीना बहाया। लेकिन जीत हासिल नहीं हुई ..जबकि 2011, 2016 और फिर 2021 में ममता बनर्जी की जीत का ग्राफ गिरना तो दूर, बढ़ता ही गया। ..हालकी 2021 के चुनाव में बीजेपी ने एक बड़ी लकीर खींच दी।
बीजेपी जो कभी 3 सीटों पर सिमटी थी, 77 सीटे जीतकर इतिहास रच दिया ये महज इत्तेफाक नहीं था, ये बंगाल की बदलती राजनीति का पहला ट्रेलर था। लेकिन ७० % हिन्दू आब्दी वाले पश्चिम बंगाल में हिन्दुतुव के एजंडे पर चुनव लड़ने वाली बीजेपी सात के सिंहासन तक.. फिर भी नहीं पहुँच पाई। टीएमसी ने 213 सीटें जीतकर प्रचंड वापसी की।
लेकिन असली सवाल यहीं से शुरू होता है…आख़िर क्यों… इतनी तेज़ी से बढ़ने के बावजूद… बीजेपी सत्ता के दरवाज़े तक आकर रुक जाती है? इसका जवाब छुपा है… बंगाल के उस चुनावी गणित में.. जिसे समझे बिना कोई भी पार्टी यहाँ जीत नहीं सकती… है 10 करोड़ आबादी वाले पश्चिम बंगाल की 294 में से
करीब 90 से 100 ऐसी विधानसभा सीटें हैं… जहाँ मुस्लिम वोटर सीधे तौर पर नतीजे तय करने की क्षमता रखते हैं 2021 के चुनाव में 75% से ज्यादा मुस्लिम वोट अकेले टीएमसी को मिले थे। जिससे इन 100 सीटों पर भाजपा की रेस शुरू होने से पहले ही खत्म हो गई।
दूसरी तरफ… हिंदू वोट…जो संख्या में ज्यादा है…वो कभी एकजुट नहीं दिखता…भाजपा जब हिंदुत्व की बात करती है, तो 70% हिंदू वोट जातियों में बंट जाता है। जबकि 30% मुस्लिम वोटर एकजुट होकर ममता को वोट करता है. क्योंकि उन्हें लगा कि बीजेपी को रोकने का यही एकमात्र जरिया हैं। लेकिन हार की सिर्फ यही एक वजह नहीं है . बंगाल में बीजेपी की हार की एक और बड़ी वजह चुनावी हिंसा का खौफ' भी है .. कार्यकर्ता को लगता है कि मुसीबत आने पर दिल्ली का नेतृत्व उसे अकेला छोड़ देता है।
आंकड़े गवाह हैं कि 2021 के चुनाव के बाद करीब 1,900 से ज्यादा हिंसा की शिकायतें NHRC (मानवाधिकार आयोग) तक पहुँचीं। बीजेपी का दावा है कि उसके 30 से ज्यादा कार्यकर्ताओं की हत्या हुई और लगभग 30,000 कार्यकर्ताओं को अपनी जान बचाने के लिए घर छोड़कर असम और ओडिशा जैसे राज्यों में शरण लेनी पड़ी। बीजेपी ने दावे तो किये लेकिन उनके लिए .. कभी सडक पर नहीं उतरी ...... आज हालत ये है .. खुलकर लोगो बीजेपी के साथ आने में कतराते है .......
नूपुर शर्मा का उदाहरण सबके सामने है—विवाद होते ही पार्टी ने उन्हें 'किनारे' कर दिया। टी. राजा सिंह के साथ भी यही हुआ, उन्हें सस्पेंड कर दिया गया। जब देश के बड़े चेहरों के साथ ऐसा सलूक होता है, तो बंगाल के एक आम बूथ कार्यकर्ता को लगता है कि उसकी क्या कीमत है? यही डर बंगाल की जमीन पर भी दिखता है। आज हालत ये है कि कार्यकर्ता बीजेपी का झंडा उठाने से पहले दस बार सोचता है, क्योंकि उसे पता है कि चुनाव खत्म होते ही दिल्ली के बड़े नेता और केंद्रीय बल चले जाएंगे, और उसे उसी मोहल्ले में टीएमसी के बाहुबलियों के बीच अकेले रहना है।
लेकिन 2026 की लड़ाई इस बार सिर्फ इस 'डर' के भरोसे नहीं लड़ी जा रही। इस बार भाजपा के पास सत्ता के गलियारे तक पहुँचने का एक 'गोल्डन चांस' है। और यह मौका किसी लहर से नहीं, बल्कि बंगाल के सबसे मजबूत वोट बैंक में पड़ने वाली 'ऐतिहासिक दरार' से पैदा हुआ है। अब तक ममता बनर्जी की सबसे बड़ी ताकत थी—30% मुस्लिम वोटों का एकतरफा समर्थन। लेकिन 2026 में पहली बार यह 'दीवार' ढहती नजर आ रही है।
टीएमसी से निष्कासित नेता हुमायूं कबीर ने अपनी नई पार्टी (AJUP) बनाकर सीधे ममता के 'गढ़' में सेंध लगा दी है। हुमायूं कबीर ने न सिर्फ 182 सीटों पर चुनाव लड़ने का ऐलान किया है, बल्कि असदुद्दीन ओवैसी (AIMIM) के साथ हाथ मिलाकर मुस्लिम वोटों के बंटवारे का पूरा खाका तैयार कर लिया है। अगर मुस्लिम वोटों का 10 से 15% हिस्सा भी इस नए गठबंधन की तरफ मुड़ गया, तो ममता बनर्जी का वो 'सुरक्षा कवच' पूरी तरह खत्म हो जाएगा।
बीजेपी को 2026 में अगर ममता बनर्जी का किला ढहाना है, तो यही सबसे बड़ा मौक़ा है ..लेकिन उसे सिर्फ 'हिंदुत्व' के नारे नहीं देने होंगे, बल्कि अपने कार्यकर्ताओं को ये भरोसा भी दिलाना होगा कि पार्टी उनके साथ खड़ी है। बीजेपी के लिए बंगाल में 148 का आंकड़ा पार करना तभी मुमकिन है, जब वो अपने कैडर को ये यकीन दिला पाए कि "मुसीबत में हम तुम्हें अकेला नहीं छोड़ेंगे।" वरना, 38% वोट शेयर तो मिल जाएगा, लेकिन सत्ता का सिंहासन फिर हाथ से निकल सकता है।
तो अब सवाल सिर्फ इतना नहीं है…कि 2026 में कौन जीतेगा…सवाल ये है की क्या बंगाल…ममता की पहचान वाली राजनीति को चुनेगा…या फिर…राष्ट्रवाद और बदलाव के नैरेटिव को…या फिर…79 साल का इंतजार…2026 में खत्म होगा…और पहली बार…बंगाल की सत्ता पर ‘कमल’ खिलेगा…
बीजेपी को 2026 में अगर ममता बनर्जी का किला ढहाना है, तो उसे सिर्फ 'हिंदुत्व' के नारे नहीं देने होंगे, बल्कि अपने कार्यकर्ताओं को ये भरोसा दिलाना होगा कि पार्टी उनके साथ खड़ी है। बीजेपी के लिए बंगाल में 148 का आंकड़ा पार करना तभी मुमकिन है, जब वो अपने कैडर को ये यकीन दिला पाए कि "मुसीबत में हम तुम्हें अकेला नहीं छोड़ेंगे।" वरना, 38% वोट शेयर तो मिल जाएगा, लेकिन सत्ता का सिंहासन फिर हाथ से निकल सकता है।
तो अब सवाल सिर्फ इतना नहीं है…कि 2026 में कौन जीतेगा…सवाल ये है की क्या बंगाल…ममता की पहचान वाली राजनीति को चुनेगा…या फिर…राष्ट्रवाद और बदलाव के नैरेटिव को…या फिर…79 साल का इंतजार…2026 में खत्म होगा…और पहली बार…बंगाल की सत्ता पर ‘कमल’ खिलेगा…

