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1976 में इंदिरा गांधी और फिर 2001 में अटल बिहारी वाजपेयी ने जिस 'सीट फ्रीजिंग' की मियाद तय की थी, आज २०२६ में वही बीजेपी सरकार के लिए सबसे बड़ी मुसीबत खडी कर चुकी है

Sunday, April 26, 2026 | Sunday, April 26, 2026 WIB

दोस्तों 1976 में इंदिरा गांधी और फिर 2001 में अटल बिहारी वाजपेयी ने जिस 'सीट फ्रीजिंग' की मियाद तय की थी, आज २०२६ में वही बीजेपी सरकार के लिए सबसे बड़ी मुसीबत खडी कर चुकी है  12 साल का शासन और प्रचंड बहुमत... फिर भी सरकार एक ऐसा बिल पास नहीं करा पाई जिसे वो 'अमृत काल' का भविष्य कह रही थी। आज हम समझेंगे कि Article 368 और 54 वोटों के इस मामूली दिखने वाले अंतर ने भारत के अगले 25 साल के नक्शे को कैसे फ्रीज (Freeze) कर दिया।


सबसे पहले समझिए कि मामला क्या है। 2023 में 106वां संवैधानिक संशोधन पास हुआ था, जिसे 'नारी शक्ति वंदन अधिनियम' कहा गया। लक्ष्य था लोकसभा और विधानसभाओं में 33% सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित करना। सुनने में यह एक ऐतिहासिक सोशल रिफॉर्म लगता है, लेकिन इसकी असली कहानी इसकी शर्तों में छिपी थी। यह कानून 'Active' तो है, लेकिन 'Operational' नहीं। क्यों? क्योंकि सरकार ने इसमें दो शर्तें जोड़ीं:थी पहली .जनगणना (Census) और दूसरी परिसीमन (Delimitation)। ..  


यानी सरकार ने महिलाओं को 33% आरक्षण तो दे दिया, लेकिन उस पर तारीख 2026 के बाद की डाल दी। पेच यह है कि यह 33% आरक्षण तभी लागू होगा  जब सीटों की संख्या बढ़ाई जाएगी। अगर सीटें 543 ही रहती हैं, तो 181 पुरुष सांसदों का Displacement) होगा। इसी Political Conflict से बचने के लिए सरकार  इन सीटो को 543  से बढ़कर 850'  करना चाहती थी। लेकिन ये तभी पोसिबल है जब .Census और Delimitation) के आकडे आएंगे ...


लेकिन इसमें भी एक ट्विस्ट है .अभी तक भारत में नई जनगणना आकडे नहीं आये है .और delimitation प्रक्रिया भी शुरू नहीं हुई। इसलिए तकनीकी रूप से यह कानून “active” तो है, लेकिन “operational” नहीं है। दूसरी वजह ये है की 1976 में, तत्कालीन प्रधानमंत्री Indira Gandhi की सरकार ने 42वें संविधान संशोधन के जरिए Delimitation पर रोक लग दी  थी इसका मकसद था:  जो राज्य population control कर रहे हैं, उन्हें नुकसान न हो। लेकिन यह रोक स्थायी नहीं थी। 2001 में Atal Bihari Vajpayee की सरकार ने  इसे बढ़ाकर 2026 तक कर दिया। मतलब यह है कि 2026 के बाद पहली बार सरकार के पास यह विकल्प होगा कि वह population के आधार पर सीटों को फिर से निर्धारित कर सके।  लेकिन ये इतना आसान भी नहीं  है 

  

अब आते हैं सबसे critical issue पर। अगर सीटें population के आधार पर बढ़ती हैं—तो उत्तर भारत को ज्यादा सीटें मिलेंगी क्योंकि वहाँ population growth ज्यादा रही है। लेकिन दक्षिण भारत के राज्यों का तर्क अलग है— उन्होंने population control बेहतर किया तो उन्हें कम representation क्यों मिले? यही कारण है कि: दक्षिण भारत के कई राज्य delimitation को लेकर विरोध में हैं विपक्ष का विरोध महिला आरक्षण या महिलाओं के अधिकार के खिलाफ नहीं था, बल्कि इसके implementation मॉडल को लेकर था।  और यही वजह थी की .सरकार का संविधान संसोधन बिल पास नहीं हो सका .. 

 

सरकार भी जानती है कि अगर वो सिर्फ सीटें बढ़ाने (Delimitation) का बिल लाती, तो दक्षिण भारत के राज्य इसे 'अपनी राजनीतिक ताकत पर हमला' मानकर विरोध करते। इसलिए सरकार ने इसे 'महिला आरक्षण' के भावनात्मक कवर में लपेटकर पेश किया। यह एक ऐसा दांव था जहाँ सरकार चाहती थी कि विरोध करने वाले को 'महिला विरोधी' दिखाया जा सके। और वैसा ही हुआ ... और ये अब चुनवी रैलियों में दिखने भी लगा है .. 


महिला आरक्षण का कानून सिर्फ एक social justice policy नहीं है, बल्कि political power redistribution का मामला भी है। एक तरफ महिलाओं को 33% प्रतिनिधित्व देने की बात है, दूसरी तरफ राज्यों और नेताओं के बीच सत्ता संतुलन का सवाल है। जब तक Census और delimitation नहीं होते, यह कानून लागू नहीं होगा—और delimitation खुद एक राजनीतिक रूप से संवेदनशील प्रक्रिया है। इसलिए आज की स्थिति में यह कहना ज्यादा सही होगा कि महिला आरक्षण “रुका हुआ” नहीं है, बल्कि “pending implementation” में है। और इसका भविष्य 2026 के बाद होने वाले राजनीतिक फैसलों पर निर्भर करेगा।क्या आपको लगता है कि महिला आरक्षण को परिसीमन से जोड़ना एक रणनीतिक भूल थी? या फिर यह लंबी अवधि के लिए सही कदम है? अपने विचार कमेंट्स में साझा करें।  

 


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