लखनऊ. उत्तर प्रदेश में कल्याण सिंह और मायावती के बीच की कड़वाहट जगजाहिर है. इसके लिए कुछ हद तक मायावती खुद जिम्मेदार भी हैं. भाजपा के समर्थन से मायावती उत्तर प्रदेश में तीन बार मुख्यमंत्री बनी. लेकिन जब भाजपा के कल्याण सिंह की बारी आई तो मायावती ने पीछे से मुख्यमंत्री की कुर्सी खींच ली.
1995 और 1997 में मायावती ने ऐसा ही कुछ किया था. लेकिन 2003 में जब कल्याण सिंह को मौका मिला तो अपने सबसे बड़े विरोधी मुलायम सिंह यादव को मुख्यमंत्री बना दिया. मायावती के लिए ये बहुत बड़ा झटका था. मायावती ने विधानसभा में भी हंगामा किया लेकिन विधानसभा अध्यक्ष केशरी नाथ त्रिपाठी भी भाजपा के थे.
आज की कहानी 2003 के उस राजनैतिक किस्से की है जिसे मायावती कभी भी भूल नहीं पाएंगी. 1992 बवरी विध्वंस के बाद मुलायम सिंह और कल्याण सिंह एक दूसरे के धूर विरोधी हो गए थे. लेकिन करीब 10 साल बाद कल्याण सिंह के लिए मुलायम सिंह यादव मायावती से ज्यादा करीबी हो गए थे.
इतिहास में ऐसा पहली बार हो रहा था जब भाजपा और मायावती की टकरार का फायदा मुलायम सिंह यादव को मिला. इस कहानी में एक किरदार और भी शामिल है सोनिया गांधी. 1999 में मुलायम सिंह यादव ने सोनिया गांधी को प्रधानमंत्री बनने से रोक दिया था. लेकिन विडबना देखिए..सोनिया गांधी ने भी मायावती की बजाय मुलायम सिंह यादव को समर्थन दे दिया और मुलायम सिंह यादव 2003 में मुख्यमंत्री बन गए.
2002 में भी मायावती भाजपा के समर्थन से ही मुख्यमंत्री बनी थी. लेकिन एक साल के अंदर ही कुछ ऐसा हुआ की मायावती ने मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया था. मायावती ने मुख्यमंत्री की कुर्सी क्यों छोड़ दी थी इसके पीछे की मायावती वजह भी बताती है.
मायावती ने कहा था कि भाजपा बसपा के उपर दबाव बना रही थी की 2004 चार में होने वाले लोकसभा चुनाव में बीएसपी भाजपा के साथ गठबंधन में ही चुनाव लड़े. मायावती को ये मंजूर नहीं था लिहाजा मायावती ने मुख्यमंत्री की कुर्सी छोड़ने का फैसला कर लिया.
मुलायम सिंह के पास 143 विधायक थे लेकिन बहुमत नहीं था. ऐसे में कुछ घंटों के अंदर ही सालों तक एक दूसरे के धूर विरोधी रहे मुलायम सिंह यादव और भाजपा के कल्याण सिंह एक ही लकीर में आ गए. कल्याण सिंह ने मुलायम सिंह यादव को 88 विधायकों के साथ समर्थन दे दिया. सिर्फ यही नहीं बल्की 25 सीटों वाली कांग्रेस ने भी मुलायम सिंह को अपना समर्थन दे दिया. मायावती को जब ये खबर लगी तो वो बेचैन हो उठी.
मायावती ने विधानसभा स्पीकर केसरी नाथ त्रिपाठी से दल-बदल कानून के तहत बागी विधायकों की सदस्यता भंग करने की मांग की. लेकिन स्पीकर ने मायावती इस याचिका को खारिज कर दिया. कहते हैं इसके पीछे कल्याण सिंह का ही हाथ था और वो हर हाल में चाहते थे की मायावती को शिक्स्त मिले.
इतिहास के पन्नों में ये कहानी हमेशा याद रहेगी. इसके बाद से भाजपा और बीएसपी का कभी गठबंधन नहीं हुआ. लेकिन क्या आपको लगता है कि भाजाप ने मायावती के साथ गलत किया था. क्या मुलायम सिंह यादव को मुख्यमंत्री बनाना भाजपा का सही फैसला था. या फिर मायावती को इस्तीफा नहीं देना चाहिए था और भाजपा के साथ ही समझौता कर लेती...आप अपनी राय कामेंट बॉक्स में जरूर दें.
