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प्रेग्नेंसी के दौरान सेक्स करने से क्या बच्चे को चोट लगती है? इस दौरान सेक्स करें या नहीं

Tuesday, August 3, 2021 | Tuesday, August 03, 2021 WIB

प्रेग्नेंसी के दौरान अक्सर महिलाओं को कई तरह की नसीहतें दी जाती हैं. इंसान के शरीर में सबसे छोटा सेल स्पर्म होता है और सबसे बड़ा ओवम या एग होता है. भले ही स्पर्म साइज में छोटे होते हैं लेकिन इनके चलने की गति बहुत तेज होती है.




इजेकुलेशन के दौरान एक अरब से भी ज्यादा स्पर्म निकलते हैं, लेकिन इनमें से सबसे पहले जो एग तक पहुंचने में सफल होता है, वही उसे फर्टिलाइज कर पाता है.


महिला के शरीर में 9 महीनों में जो कुछ होता है वो किसी करिश्मे से कम नहीं है. कोख में जैसे-जैसे बच्चा बड़ा होता है, वैसे-वैसे यूट्रस का आकार भी बढ़ता चला जाता है. प्रेग्नेंसी से पहले यूट्रस का आकार एक सेब से भी छोटा होता है.


इसका वजन लगभग 60 ग्राम होता है. यूट्रस का निचला हिस्सा यानी सर्विक्स फर्टिलाइजेशन में अहम भूमिका निभाता है. ये सर्वाइकल म्यूकस रिलीज करता है जो स्पर्म को एग तक हिफाजत से पहुंचाता है.


इसी दौरान शरीर में प्रोजेस्टेरोन और एस्ट्रोजन हार्मोन निकलते हैं जो यूट्रस की लाइन को मोटा करने में मदद करते हैं, जिससे कि फर्टिलाइज्ड एग यहां आराम से टिक सके. 


अगले 12 हफ्तों में प्लेसेंटा बनती हैं, जो कोख के अंदर बच्चे की जरूरतों को पूरा करती है. प्लेसेंटा के द्वारा गर्भनाल के जरिए बच्चे को जरूरी पोषण मिलता है. बच्चे के जन्म के समय प्लेसेंटा का वजन करीब 700 ग्राम तक होता है.


फर्टिलाइज्ड एग जैसे ही यूट्रस की लाइन से जुड़ता है, वैसे ही यूट्रस का आकार बढ़ने लगता है. एस्ट्रोजन हार्मोन इस बात को सुनिश्चित करता है कि यूट्रस बढ़ता रहे ताकि बच्चे को जगह की कोई कमी ना हो. 


वही यूट्रस जो पहले महज एक सेब के आकार का था, 9 महीने बाद उसका आकार 2 फुटबॉल के बराबर हो जाता है यानी पहले 20 गुना ज्यादा बड़ा हो जाता है. यूट्रस की मांसपेशियां जब सिकुड़ने लगती हैं, तब लेबर पेन शुरू होता हैं. इस प्रकिया को कॉन्ट्रैक्शन कहते हैं. इस कॉन्ट्रैक्शन के कारण ही बच्चा आराम से बाहर आ पाता है.


जन्म के बाद यूट्रस को अपने आकार में वापस लौटने में लगभग 6 हफ्ते का समय लगता है. ये हर दिन एक सेंटीमीटर तक सिकुड़ता है. इन 6 हफ्तों के दौरान लगातार ब्लीडिंग होती रहती है.


इसलिए कहा जाता है कि प्रेग्नेंसी के दौरान और डिलेवरी के बाद भी अपना पूरा ध्यान रखा जाए. लेकिन ध्यान रखने का मतलब ये नहीं होता है कि आप चलना फिरना बंद कर दें.


प्रेग्नेंसी के पहले 12 हफ्ते सबसे अहम होते हैं. इस दौरान सेल मल्टीप्लाई कर रहे होते हैं. अभी ये सेल बच्चे में परिवर्तित नहीं हुए होते हैं. 80 फीसदी मिसकैरेज इन पहले 3 महीनों में होते हैं. इसलिए कहा जाता है कि इस दौरान संभलकर चलना चाहिए. ज्यादा दौड़-भाग नहीं करनी चाहिए.


पहले प्राइमिस्टर में हार्मोन्स के ऊपर-नीचे होने के कारण कई महिलाओं को थकान महसूस होती है और नींद भी बहुत आती है. ऐसे में खूब आराम करें. लेकिन अगर आप फिट महसूस कर रही हैं तो दूसरों के कहे अनुसार चलना-फिरना बिल्कुल बंद ना करें.


दूसरा ट्राइमिस्टर यानी चौथे महीने से लेकर छठवें महीने का वक्त सबसे आसान माना जाता हैं. इस दौरान आप एक्सरसाइज, योग या स्विमिंग शुरू कर सकते हैं. अगर आपको इन सब चीजों की पहले से आदत है तो करें. कुछ नया ट्राई ना करें. 


कुछ महिलाएं प्रेग्नेंसी के दौरान वॉक करती हैं, तो कुछ ऐसी भी होती हैं जो इस दौरान बड़ी आसानी से जॉगिंग करती हैं. हालांकि, प्रेग्नेंसी के दौरान स्विमिंग करने की सलाह काफी दी जाती है. क्योंकि पानी के अंदर शरीर पर ग्रेविटी का असर बहुत कम होता है. इससे थकान कम होती है. प्रेग्नेंसी में स्विमिंग 40वें हफ्ते तक भी जारी रख सकते हैं.


प्रेग्नेंसी के दौरान खान-पान पर विशेष ध्यान देने की सलाह दी जाती है. लेकिन कुछ लोगों का मानना है कि प्रेग्नेंसी में दो लोगों का भोजन करना चाहिए. लेकिन एक्सपर्ट के अनुसार, ऐसा कहना गलत है. क्योंकि जब बच्चा पैदा होता है तो उसका पेट मटर के दाने जितना होता है. 


प्रेग्नेंसी के दौरान सेक्स ना करने की सलाह दी जाती है. माना जाता है कि इस दौरान सेक्स करने से बच्चे को चोट लग सकती है. एक्सपर्ट के अनुसार, ऐसा बिल्कुल नहीं है, पेनिट्रेशन वजाइना में होती है और बच्चा यूट्रस में होता है. 


दोनों के बीच में सर्विक्स की लेयर होती है. हालांकि, अगर आपकी प्रेग्नेंसी में कॉम्प्लिकेशन हैं और डॉक्टर ने आपको ऐसा करने से मना किया है तो डॉक्टर का सलाह जरूर मानें.


तो जरा सोचिए कि प्रेग्नेंसी के दौरान बच्चे का पेट कितना छोटा होता होगा. इसलिए पौष्टिक आहार लें और जरूरत के हिसाब से ही खाएं.


दूध को संपूर्ण आहार माना जाता है. इस दौरान दूध पीना अच्छा होता है. यदि आपको दूध से एसिडिटी की समस्या होती है तो इसे बिल्कुल ना लें.


एक्सपर्ट के अनुसार, केसर में एंटीऑक्सीडेंट्स होते हैं. इसलिए इसे दूध में केसर डालकर पीने की सलाह दी जाती है. लेकिन इसका बच्चे के रंग-रूप से कोई लेना देना नहीं है. प्रेग्नेंसी में नारियल पानी एसिडिटी से बचाता है. इसलिए इसे पीना फायदेमंद होता है.


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