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Tuesday, August 24, 2021 | Tuesday, August 24, 2021 WIB

सोनिया गांधी या फिर एन्टोनिया माईनो, आप किस नाम से जानते है कांग्रेस प्रेसिडेंट को ? कभी एक रेस्‍टोरेंट में काम करने वाली, एन्टोनिया माईनो  कैसे बन गई देश के सबसे बड़े  परिवार की बहू,यह सब कैसे हुआ, कैसे  इटली के छोटे से गाँव की लड़की एन्टोनिया माईनो, सोनिया गाँधी बन गई .इसकी कहानी भी, बड़ी दिलचस्प है।  


किसी साधारण सी जीवन शैली वाले एक लड़के और एक लड़की के प्यार की छोटी सी ये कहानी किसी रोमांच से कम नहीं है. बात उन दिनों की है जब राजीव कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी में पढाई कर रहे थे और वही एक इटैलियन लड़की पढाई कर रही थी. क्योकि सोनिया एक साधारण परिवार से थीं। ऐसे में  पढ़ाई के साथ-साथ यूनिवर्सीटी के एक रेस्‍टोरेंट में पार्टटाइम काम भी कर लेती।  'एक दिन अपनें दोस्तों के साथ राजिव उसी रेस्टोरेंट में पहुँच गए जहाँ  एन्टोनिया माईनो   यानी की सोनिया काम करती थी.


दोस्तों से मस्ती मजक के बीच उनकी नज़र अचानक, रेस्टोरेंट में काम करने वाली एक अकेली लड़की पर पड़ी, दोनों की आँखे चार हुई और प्यार हो गया। ये लड़की कोई और नहीं,आज की सोनिया गाँधी और तब की एन्टोनिया माईनो थी। 


यही वो पहली मुलाकात थी, जिसनें दोनों तरफ प्यार की आग लगा दी. लेकिन अभी ये प्यार, सिर्फ नजरो तक ही था, अभी प्यार का  इजहार बाकी था। लेकिन प्यार  के लिए दिल दोनों तरफ बारबार धड़क रहा था. राजीव ने पहली बार एक रुमाल में सोनिया के लिए कविता लिखी,और एक वेटर के ज़रिए सोनियातक  भिजवाया . यही से राजिव और सोनिया के प्यार का पहिया घूमने लगा। 


सोनिया को राजीव के प्यार ने इतना दीवाना बना दिया था कि उन्होंने लेटर लिखकर राजीव के बारे में अपने घरवालों को बताते हुए कहा था कि ''मुझे एक नीली आंखों वाले इंडियन राजकुमार से प्यार हो गया है, जिसके मैं हमेशा ही सपने देखा करती थी जुलाई 1966 में सोनिया इटली लौट गई.अब सोनिया और राजीव दोनों रोज एक दूसरे को खत लिखते थे. हालांकि राजीव अब इंजीनियरिंग की पढ़ाई छोड़कर पायलट का लाइसेंस लेने की ट्रेनिंग लेने लगे थे.


1968  तक ये प्रेम कहानी यू ही चलती रही, 13 जनवरी 1968 को सोनिया दिल्ली आई.  और बारह दिन बाद सोनिया और राजीव ने सगाई और 25 फरवरी 1968 को सफदरगंज में दोनों की शादी करली .


अब एन्टोनिया माईनो सोनिया बन चुकी थी, और गांधी परिवार का हिस्सा भी । राजीव और सोनिया दोनों को सत्ता में कोई ख़ास दिलचस्पी नहीं थी, इसलिए शादी के बाद राजीव पायलट बन गए। लेकिन 1980 में संजय गांधी की मौत और 1984 में इंदिरा गांधी की हत्या के बाद मां की मौत से आहत राजीव ने मां की गद्दी सँभालने का फैसला किया पर ये राजनीति उन्हें रास नहीं आई।  और साल 1991 में श्रीपेरुंबदूर की एक सभा में उन्हें बम से उड़ा दिया गया।  





 



 

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