-->

Notification

×

Iklan

Iklan

Most Popular

11 साल में आधे शरीर को लकवा मार गया, स्वर्ण पदक जीतने वाली जयपुर की अवनि लेखरा की कहानी

Tuesday, August 31, 2021 | Tuesday, August 31, 2021 WIB

फरवरी 2012 में एक सड़क दुर्घटना के बाद अवनि के कमर के नीचे के शरीर को लकवा मार गया था. उसके बाद से टोक्यो पैरालंपिक में स्वर्ण पदक जीतने तक का उनका सफर अवसाद से निकलकर संघर्ष करने और दृढ़ संकल्प से आगे बढ़ने की सफल कहानी बन गया है. यह सफलता की ऐसी कहानी है जिसमें उनके पिता के पास अपनी खुशी बयान करने के लिए शब्द कम पड़ गए हैं. और देश को गर्व है.... 




अवनि ने सोमवार को टोक्यो पैरालंपिक में महिलाओं की आर-2 10 मीटर एयर राइफल स्टैंडिंग एसएच1 में पहला स्थान हासिल करके स्वर्ण पदक जीता. जयपुर की यह 19 वर्षीय निशानेबाज पैरालंपिक में स्वर्ण पदक जीतने वाली पहली भारतीय महिला खिलाड़ी बन गई हैं.


20 फरवरी 2012 को एक कार दुर्घटना का जब बेटी शिकार हुई उस वक्त वो सिर्फ 11 साल की थीं. इस दुर्घटना में रीढ़ की हड्डी को गहरी चोट लगी और उनके कमर के नीचे के शरीर को लकवा मार गया. 


उसके बाद से वह व्हीलचेयर के सहारे हैं.  'दुर्घटना से पहले वह बहुत सक्रिय थी और हर गतिविधि में भाग लेती थी लेकिन दुर्घटना ने उसकी जिंदगी बदल दी. वह अपनी हालत पर गुस्से में थी...किसी से भी बात नहीं करती थी.




अवनि के पिता ने बताया कि दुर्घटना के बाद जब यह परेशान रहने लगी थी तब मन बहलाने के लिए इसे शूटिंग रेंज लेकर गए थे. अवनि ने शूटिंग को अपनी जिंदगी बना ली. वह इसके लिए तबतक मेहनत करती रहती थीं जब तक कि थक कर चूर न हो जाए. 


अवनि लेखरा को उनके पिता प्रवीण लेखरा ने शूटर अभिनव बिंद्रा की जीवनी पढ़ने के लिए दी...पढ़ने के बाद अवनि के मन में ख्याल आया कि वह शूटिंग भी कर सकती और अप्रैल 2015 से वह लगभग नियमित रूप से शूटिंग रेंज में जाने लगीं....हालांकि शुरुआत में उसे व्हीलचेयर चलाने में दिक्कतों का सामना करना पड़ता था....बंदूक और शूटिंग किट भी उपलब्ध नहीं थी.


लेकिन धीरे धीरे  अपने दृढ़ संकल्प के साथ, उसने खेल में उत्कृष्ट प्रदर्शन अवनी करने लगीं. राज्य स्तर पर स्वर्ण पदक और 2015 में राष्ट्रीय स्तर पर कांस्य पदक जीता. यह सिर्फ शुरुआत थी और आज उसने पैरालंपिक में स्वर्ण पदक जीता है, जिसकी बहुत उम्मीद थी.’ 


अवनि के पिता का कहना है कि कोरोना के चलते अवनि को पिछले दो सालों से काफी कठिनाइयों का सामना करना पड़ा था....इस दौरान उनकी प्रैक्टिस पर भी काफी असर पड़ा था.....लेकिन उनके पिता ने घर में टारगेट सेट कर अवनी की प्रैक्टिस में कोई कसर नहीं छोड़ी. 


पैरालंपिक की तैयारी कर रही अवनि घर पर ही टारगेट पर प्रैक्टिस कर रही थीं साथ ही उस समय उनका गोल्ड पर निशाना साधना ही लक्ष्य था. इसके लिए वो नियमित रूप से जिम और योगा पर ध्यान दे रही थीं. उन्होंने फिट रखने के लिए खान-पान का विशेष रूप से ध्यान रखा था. अवनि लेखरा की ये कहानी बताती है हर नहीं मानने वालों की हमेशा जीत होती हैं.

×
Latest Updates Update