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क्या कल्याण सिंह की तरह योगी आदित्यनाथ को भी भाजपा पार्टी से बाहर का रास्ता दिखाएगी

Saturday, June 12, 2021 | Saturday, June 12, 2021 WIB

कहा जा रहा है उत्तर प्रदेश में योगी और भाजपा आलाकमान के बीच सब कुछ ठीक नहीं है. जबकि योगी भाजपा के इतने बड़े नेता है फिर अपनी ही पार्टी की आंखों में इतनी बड़ी किरकिरी क्यों बनने लगे हैं, यह एक गंभीर सवाल ह ...आज हम इतिहास के कुछ पन्नों को पलटने की कोशिश करते हैं और जानते हैं कि क्या ये सब योगी मोदी के दौर में ही हो रहा है या भाजपा का इतिहास ही ऐसा रहा है, भाजपा का इतिहास बताता है कि बड़े नेताओं का आलाकमान से टकराने का परिणाम अच्छा नहीं होता है. 



आज उत्तर प्रदेश में जैसे हालत पैदा हुए हैं वैसे प्रदेश में हालत कई बार पैदा हो चुके हैं. आज जो योगी और भाजपा आलाकमान के बीच चल रहा है उसे समझना है तो आपको अटल बिहार वाजपेई और कल्याण सिंह की कहानी और उनकी प्रतिस्पर्धा को समझना होगा. 1991 में भाजपा 221 सीटे जीतकर उत्तर प्रदेश विधानसभा में आई थी. इसमें कल्याण सिंह का योगदान सबसे ज्यादा था. लेकिन अयोध्या मामले को लेकर कल्याण सिंह की सरकार को बर्खास्त कर दिया गया. 1993 में फिर चुनाव हुए इस बार भाजपा के वोट तो बढ़े लेकिन सीटें घट गई. 


लेकिन कुछ सालों बाद ही हालत कुछ ऐसे पैदा हुए कि कल्याण सिंह को पार्टी से बाहर का रास्ता दिखा दिया गया. इसके पिछे बहुत सारी वजहें बताई जाती हैं. जैसे आज योगी सरकार और संगठन में तकरार है वैसा ही कुछ उस वक्त भी हुआ था. कल्याण सिंह का कद आज के योगी आदित्यनाथ से बिलकुल भी कम नहीं था. कल्याण सिंह ने मंडल-कमंडल और राम मंदिर मुद्दें को लेकर भाजपा को बहुत फायदा पहुंचाया था. लेकिन कल्याण सिंह जब ज्यादा अपने मन की करने लगे तो उन्हें पार्टी से बाहर का रास्ता दिखा दिया.



अटल बिहारी वाजपेयी और कल्याण सिंह के बीच तनातनी हो गई थी. यहां तक की जब अटल बिहार वाजपाई के प्रधानमंत्री बनने की बात आई तो कल्याण सिंह ने ये तक कह दिया था कि पहले सांसद तो बनकर दिखाएं. कुसुम रॉय और कल्याण सिंह की दोस्ती की वजह से संगठन में दरार पड़ गई थी. कुसुम रॉय लखनउ के राजाजीपुराम से 1997 में सभासद का चुनाव जीता था लेकिन कल्याण सरकारी के बड़े बड़े फैसलों पर कुसुम रॉय का दखल था. इसके लेकर भाजपा के बड़े नेता नाराज थे लेकिन कल्याण सिंह को किसी की परवाह नहीं थी. 



अटल बिहार बाजपेई से रिश्ते खराब कर लिए तो उन्हें मुख्यमंत्री पद से हटाकर केंद्र में मंत्री बनाने का प्रस्ताव दिया गया तो आडवाणी से रिश्ते खराब हो गए. इसके बाद 1999 में कल्याण सिंह को भाजपा से निकाल दिया गया. कल्याण सिंह ने राष्ट्रीय क्रांति दल नाम से अपनी खुद की पार्टी बना ली. अपने पूरे प्रभाव का इस्तेमान भाजपा के खिलाफ किया लेकिन असफल रहे. 


इसलिए, ये कहानी आज के हालत पर बिलकुल फिट है...की भाजपा में कोई भी नेता बड़ा नहीं होता. जो आलाकमान की हां में हां मिलाकर मिलकर काम करेगा वो नेता नेता माना जाएगा जो नहीं करेगा वो पार्टी से बाहर जाएगा. लेकिन योगी आदित्यानाथ आज के हिसाब से कल्याण सिंह नहीं है..क्योंकि आदित्यनाथ ने अभी तक एक भी वो भूल नहीं की जो कभी कल्याण सिंह हर रोज करते थे. खबर ये भी है कि योगी के तेवर देखते हुए भाजपा आलाकमान उत्तर प्रदेश में 2022 में मुख्यमंत्री पद का चेहरा योगी की बजाय किसी और को बना सकता है..लेकिन इसके लिए फिलहाल इंतजार करना होगा......

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