एक नई स्टडी में खुलासा हुआ है कि अब पुरुषों के लिंग छोटे हो रहे हैं..सिकुड़ रहे हैं...और लड़के धीरे धीरे नपुशक्तता की ओर बढ़ रहे हैं...इस समस्या की वजह से महिलाओं को इन पुरुषों के साथ संबंध बनाने के दौरान संतुष्ट भी नहीं मिल पाती है..बहुत सारे ऐसे भी केस सामने आए है जहाँ अगर ऐसे पुरुषों से बच्चे पैदा भी होते है तो वो विकृत जननांगों के साथ पैदा हो रहे हैं.... आइए जानते हैं इस हैरान कर देने वाली स्टडी में और क्या खुलासा किया गया है?
प्रदूषण की वजह से साल 2019 में भारत में 17 लाख लोगों की मौत हुई थी. जबकि, हर साल दुनिया में करीब 42 लाख लोगों की मौत होती है.... माउंट सिनाई हॉस्पिटल में एनवॉयरॉनमेंटल मेडिसिन और पब्लिक हेल्थ की प्रोफेसर डॉ. शान्ना स्वान के मुताबिक सिर्फ लिंग का आकार ही छोटा नहीं हो रहा है. बल्कि इंसान की प्रजनन क्षमता पर भी असर पड़ रहा है.
डॉ. स्वान ने कहा कि ये इंसानों के लिए अस्तित्व संबंधी संकट है. उन्होंने बताया कि स्टडी में एक ऐसे खतरनाक रसायन की पहचान हुई है जो इंसानों की प्रजनन क्षमता को कम कर रहा है. इसके साथ ही इसकी वजह से लिंग छोटे और सिकुड़ रहे हैं. बच्चे विकृत जननांगों के साथ पैदा हो रहे हैं. प्रदूषण को लेकर डॉ. स्वान ने पर्यावरण कार्यकर्ता ग्रेटा थनबर्ग को भी ट्वीट किया है. इसमें उन्होंने कहा है कि प्रदूषण के मामले में मैं ग्रेटा के साथ हूं.
डॉ स्वान ने जिस रसायन को खतरनाक बताया है उसका नाम है फैथेलेट्स इस केमिकल का उपयोग प्लास्टिक बनाने के लिए होता है. इसकी वजह से इंसान के एंडोक्राइन सिस्टम पर पड़ता है. इंसानों में हॉर्मोंस एंडोक्राइन सिस्टम के जरिए ही निकलता है.. प्रजनन संबंधी हॉर्मोंस का स्राव भी इसी सिस्टम से होता है. इसके साथ ही जननांगों को विकसित करने वाले हॉर्मोंस भी इसी सिस्टम के निर्देश पर निकलते हैं.....
एक रिपोर्ट के मुताबिक डॉ. स्वान ने बताया कि प्रदूषण की वजह से पिछले कुछ सालों में जो बच्चे पैदा हो रहे हैं, उनके लिंग का आकार छोटा हो रहा है. उन्होंने इस मुद्दे पर एक किताब भी लिखी है. जिसका नाम है काउंट डाउन... किताब में आधुनिक दुनिया में पुरुषों के घटते स्पर्म, महिलाओं और पुरुषों के जननांगों में आ रहे विकास संबंधी बदलाव और इंसानी नस्ल के खत्म होने की बात कही गई है.
रिपोर्ट के मुताबिक,,डॉ. स्वान ने फैथेलेट्स सिंड्रोम की जांच सबसे पहले तब शुरू की जब उन्हें पुरुष चूहों के लिंग में अंतर दिखाई दिया. उन्हें दिखाई दिया सिर्फ लिंग ही नहीं मादा चूहों के भ्रूण पर भी असर पड़ रहा है. उनके प्रजनन अंग छोटे होते जा रहे हैं. तब उन्होंने फैसला किया कि वो इंसानों पर अध्ययन करेंगी....और फिर उन्होंने चौकाने वाला खुलासा किया....फैथेलेट्स रसायन का उपयोग प्लास्टिक बनाने के काम आता है. ये रसायन इसके बाद खिलौनों और खाने के जरिए इंसानों के शरीर में पहुंच रहा है.
इससे पहले साल 2017 में एक स्टडी आई थी, जिसमें दावा किया गया था कि पश्चिमी देशों में पुरुषों के स्पर्म काउंट में 50 फीसदी की गिरावट दर्ज की गई है. पिछले चार दशकों में इस तरह की 185 स्टडीज हुई हैं. जिनमें 45,000 स्वस्थ पुरुषों को शामिल किया गया था. उनके स्पर्म काउंट में हर दशक के बाद कमी दर्ज की गई.
डॉ. स्वान कहती हैं कि अगर इसी तरह प्रजनन दर कम होता रहा तो दुनिया में मौजूद ज्यादा पुरुष साल 2045 तक पर्याप्त स्पर्म काउंट पैदा करने की क्षमता खो देंगे. यानी नंपुसकता की ओर बढ़ जाएंगे...डॉ स्वान की बातों से आप कितना सहमत है....क्या आप भी ऐसी समस्या से गुजर रहे है जिसका इस स्टडी में खुलासा किया गया है...
