देश में पेट्रोल और डीजल की बढ़ती कीमतों ने जहाँ जनता को बेहाल और परेशान किया वही उन नेताओं को भी बेनाकाब किया जो सरकार बनते ही पेट्रोल के दाम करने का जनता से वाद तो किया लेकिन सरकार बनने के बाद उसी जनता को ठेंगा दिखा दिया. केंद्र सरकार ने साफ़ कर दिया है की पेट्रोल-डीजल की कीमतें कम करना उसके हाथ में नहीं है। ऐसे में सवाल उठता है की फिर कौन जनता को इन बढ़ती कीमतों से राहत दिलाएगा .
साल 20014 में जब मोदी सत्ता में आए, तब पेट्रोल पर 34% और डीजल पर 22% टैक्स लगता था, लेकिन आज पेट्रोल पर 64% और डीजल पर 58% तक टैक्स लग रहा है। यानी अब हम पहले की तुलना में पेट्रोल पर दोगुना और डीजल पर ढाई गुना टैक्स दे रहे हैं। 2014 में केंद्र सरकार एक लीटर पेट्रोल पर 10.38 रुपए और डीजल पर 4.52 रुपए टैक्स वसूलती थी।
मौजूदा समय में एक लीटर पेट्रोल पर 32.98 रुपए और डीजल पर 31.83 रुपएटैक्स वसूल रही है । मोदी सरकार के आने के बाद केंद्र सरकार पेट्रोल पर तीन गुना और डीजल पर 7 गुना टैक्स बढ़ा चुकी है।
पेट्रोलियम प्लानिंग एंड एनालिसिस सेल यानी PPAC के मुताबिक 2013-14 में सिर्फ एक्साइज ड्यूटी से सरकार ने 77,982 करोड़ रुपए कमाए थे। जबकि 2019-20 में 2.23 लाख करोड़ रुपए से ज्यादा की कमाई हुई। 2020-21 के पहली छमाही में यानी अप्रैल से सितंबर तक मोदी सरकार को 1.31 लाख करोड़ रुपए की कमाई हुई। अगर इसमें और दूसरे टैक्स भी जोड़ लें, तो ये कमाई 1.53 लाख करोड़ रुपए तक पहुंच जाती है।
राज्य सरकारे भी इसमें पीछे नहीं है जहाँ केंद्र सरकार मौजूदा समय में एक लीटर पेट्रोल पर 32.98 रुपए और डीजल पर 31.83 रुपए टैक्स वसूल रही है वही राज्य सरकारे पेट्रोल पर 38% और डीजल पर 28% टैक्स वसूल रही है। हालाकिं अलग अलग राज्यों में टैक्स की दर अलग अलग है यही वजह है की अलग राज्यों में पेट्रोल कीमते अलग है
2013-14 में राज्य सरकारों ने वैट और सेल्स टैक्स से 1.29 लाख करोड़ रुपए कमाए थे। 2019-20 में ये कमाई 55% बढ़कर 2 लाख करोड़ रुपए से ज्यादा हो गई। 2020-21 की पहली छमाही में ही राज्य सरकारों ने 78 हजार करोड़ रुपए से ज्यादा कमाए हैं।
मोदी सरकार आने के बाद दिल्ली में एक लीटर पेट्रोल की कीमत 15 रुपए और डीजल की कीमत 25 रुपए तक बढ़ गई है। अप्रैल 2014 में दिल्ली में एक लीटर पेट्रोल 72.26 रुपए और डीजल 55.49 रुपए में आता था। लेकिन आज पेट्रोल 90 रुपए और डीजल 80 रुपए से ज्यादा हो गया है।
सवाल ये है कि इसकी वजह क्या है ? सबसे बड़ी वजह, जो आजकल चर्चा में है, वह है केंद्रीय एक्साइज ड्यूटी, जो पेट्रोल पर 32.90 रूपए और डीजल पर 31.8 रूपए प्रति लीटर वसूली जा रही है, लेकिन क्या पेट्रोल-डीजल की बढ़ती कीमतों की यही एक वजह है? जवाब है, बिलकुल नहीं। इसकी दूसरी और सबसे बड़ी वजह है कच्चे तेल यानी क्रूड ऑयल के लिए इम्पोर्ट पर हमारी बढ़ती निर्भरता हम इम्पोर्ट पर निर्भरता जितनी ज्यादा बढ़ाते जाएंगे, तेल की कीमतें उतनी ही बढ़ती जाएंगी। मनमोहन सरकार के आखिरी साल यानी 2014 में डोमेस्टिक ऑयल प्रोडक्शन 37.78 मिलियन टन था, जो 2019-20 में 15% घटकर 32.17 मिलियन टन पर आ गया है। नतीजतन इम्पोर्ट पर हमारी निर्भरता बढ़कर 88% हो गई।
2014 में जब मोदी सत्ता में आए थे, तब डोमेस्टिक ऑयल प्रोडक्शन 37.78 मिलियन टन था जो 2019-20 में यह 32.17 मिलियन टन पर आ गया। हकीकत तो यह है कि 2019-20 में डोमेस्टिक ऑयल प्रोडक्शन, 2002 से भी लगभग 1 मिलियन टन कम हुआ है। डोमेस्टिक ऑयल प्रोडक्शन पिछले 18 साल, यानी लगभग 2 दशकों में सबसे निचले स्तर पर है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने तो इन बढ़ती कीमतों के लिए कांग्रेस को जिम्मेदार ठहराया है। जबकि कच्चे तेल की कीमत कांग्रेस सरकार की तुलना में लगभग आधी हो चुकी है। साल 2014 में जब मोदी पहली बार देश के प्रधानमंत्री बने, तब कच्चे तेल की कीमत 106.85 डॉलर प्रति बैरल थी। मोदी के प्रधानमंत्री बनने के तीन महीने बाद ही कच्चे तेल की कीमत 100 डॉलर के नीचे आ गई और तब लेकर लगातर कच्चे तेल की कीमते कम हो रही है कच्चे तेल की कीमतें कम होने के बाद भी पेट्रोल-डीजल की कीमतें कम नहीं हुईं। उल्टा हम पर टैक्स का बोझ बढ़ गया।
जनवरी 2021 में कच्चे तेल की कीमत 54.79 डॉलर प्रति बैरल थी। यानी, मनमोहन सरकार जाने के बाद से कच्चे तेल की कीमतें लगभग आधी हो गई हैं। लेकिन तेल कीमते लगतार बढ़ी है



