बिहार की सियासत में आज़ादी के 79 साल बाद पहली बार BJP अपना मुख्यमंत्री बना चुकी है! लेकिन... ये कुर्सी किसी RSS या जनसंघ वाले 'पुराने कैडर' को नहीं—बल्कि उस सम्राट चौधरी को मिली है। जो 2000 में RJD के टिकट पर विधायक बने, राबड़ी सरकार में मंत्री रहे, नीतीश के JDU में गए .. और 2018 में BJP में शामिल हो गए। जो कभी बिहार में BJP को जड़ से उखाड़ने की कसमें खाते थे, आज उसी BJP ने उन्हें बिहार के मुख्यमंत्री बाना दिया है ! तो क्या बीजेपी ने सम्राट चौधरी को सीएम बनाकर गलती कर दी है आखिर ऐसी क्या मजबूरी थी कि 89 विधायकों वाली सबसे बड़ी पार्टी को एक 'Outsider' (आउट-साइडर) के सामने 'Surrender' (सरेंडर) करना पड़ा? चलिए, समझते हैं।
बिहार के सियासी इतिहास में ऐसा पहली बार है जब बीजेपी के पास अपने दम पर मुख्यमंत्री बनाने की असली 'पावर' है। 89 सीटों वाली बीजेपी आज उस मुकाम पर है जहाँ वो जिसे चाहे, उसे कुर्सी पर बिठा सकती है। लेकिन राजनीति सिर्फ आंकड़ों का खेल नहीं होती। 2025 के चुनाव में NDA को 202+ बहुमत मिला, और नीतीश कुमार 10वीं बार बिहार के CM बने। लेकिन सत्ता के इतने करीब आकर भी बीजेपी तब अपना सीएम नहीं बना पाई। और जब मौका मिला... तो उसने उस नाम को चुना जिसकी राजनीति ही कभी बीजेपी विरोध से शुरू हुई थी।
इतिहास गवाह है कि सम्राट चौधरी की राजनीति बीजेपी की विचारधारा से नहीं, बल्कि बीजेपी के विरोध से शुरू हुई थी । लालू की RJD से लेकर नीतीश की JDU तक, सम्राट हमेशा बीजेपी की नीतियों को कोसते रहे। लेकिन आज वही शख्स बीजेपी के 'कोर कैडर' को साइडलाइन कर मुख्यमंत्री की कुर्सी पर काबिज हो है। क्यों? क्योंकि बीजेपी अब विचारधारा से ज्यादा उस 'जातीय चक्रव्यूह' में फंस चुकी है जहाँ उसे अपनी पहचान से ज्यादा वोट की चिंता है . सम्राट चौधरी को चुनना बीजेपी का विजन नहीं, बल्कि नीतीश के वोट बैंक में सेंध लगाने की एक छटपटाहट है।
बिहार में चुनाव विचारधारा से नहीं… जातीय गणित से जीते जाते हैं! सम्राट चौधरी OBC वर्ग से… आते हैं जो बिहार की राजनीति में एक बड़ा और निर्णायक वोट बैंक है अगर पूरे बिहार को देखें… तो OBC + EBC मिलाकर 50% से ज्यादा आबादी बनती है! और यही वो समीकरण है…जिसके दम पर Nitish Kumar सालों से सत्ता में बने रहे यानी साफ है—BJP ने CM नहीं चुना… उसने जातीय समीकरण चुना है!”
सम्राट चौधरी को कुर्सी मिलना ये बताता है कि बीजेपी अब विचारधरा से ज्यादा सत्ता के पीछे भाग रही है। बीजेपी अब वो पार्टी नहीं रही जो सिद्धांतों के लिए दशकों तक विपक्ष में बैठी रहे। असम में हेमंत बिस्वा सरमा, एमपी में ज्योतिरादित्य सिंधिया और बंगाल में सुवेंदु अधिकारी... ये सब इसी राजनीतिक अवसरवाद के उदाहरण हैं। “अब बीजेपी ‘कैडर पार्टी’ से ‘कन्वर्ज़न मशीन’ बनती जा रही है! हैरानी उन समर्पित बीजेपी कार्यकर्ताओं के लिए है जिन्होंने अपनी पूरी जिंदगी पार्टी के लिए दांव पर लगा दी। और आज उन्हें ही बीजेपी ने किनारे कर दिया है। 89 विधायकों वाली सबसे बड़ी पार्टी का एक 'Outsider' के जातीय कद के सामने सरेंडर करना, पुराने समर्थकों के लिए किसी झटके से कम नहीं है।
सम्राट चौधरी—एक ऐसे नेता…जिन्होंने 25 साल में 3 पार्टियां बदली हैं । आज बीजेपी की लहर है तो वो बीजेपी के साथ है , कल अगर हवा बदली तो क्या गारंटी है कि वो 'कमल' का साथ नहीं छोड़ेंगे? क्या बीजेपी ने एक ऐसे 'Asset' (एसेट) पर दांव लगाया है जो भविष्य में उसकी सबसे बड़ी गलती साबित हो सकती है क्या बिहार में BJP ने सम्राट चौधरी CM बनाकर जीत हासिल की है…या अपनी विचारधारा से समझौता कर लिया है? आपको क्या लगता है? क्या एक 'आउट-साइडर' को सीएम बनाना बीजेपी के उन पुराने बीजेपी वर्कर के साथ इंसाफ है जिन्होंने बीजेपी के लिए सडको पर लाठियां खाईं? आप अपनी राय कमेन्ट बॉक्स में लिखर बता सकते है !

