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नरोत्तम मिश्रा का 'राजनीतिक वनवास': क्या मोहन यादव ने काटा टिकट या BJP की 'सोशल इंजीनियरिंग' का शिकार हुए ब्राह्मण?

Tuesday, July 14, 2026 | Tuesday, July 14, 2026 WIB

मध्य प्रदेश की राजनीति का वो 'चाणक्य', जिसके एक इशारे पर कभी सूबे की सरकारें बनती और बिगड़ती थीं... आज बीजेपी हाईकमान और उसकी नई 'सोशल इंजीनियरिंग' ने उन्हें पूरी तरह साइडलाइन कर दिया है।सवाल यह नहीं है कि बीजेपी ने उनका टिकट क्यों काटा; असली सवाल तो यह है कि क्या यह सब मुख्यमंत्री मोहन यादव के इशारे पर हुआ है?


एक ऐसा नेता, जो कभी मध्य प्रदेश की बीजेपी में मुख्यमंत्री के बाद सबसे ताकतवर चेहरा माना जाता था, आज न मंत्री है, न सांसद और न ही संगठन में कोई बड़ी जिम्मेदारी। क्या यह सिर्फ 2023 का विधानसभा चुनाव हारने की सज़ा है? या फिर इसके पीछे बीजेपी की कोई बहुत बड़ी और गहरी रणनीति काम कर रही है? चलिए, niotimes.com की इस विशेष रिपोर्ट में इस पूरे सियासी चक्रव्यूह को विस्तार से समझते हैं।





चुनावी हार या सोची-समझी स्क्रिप्ट?


मध्य प्रदेश के पूर्व गृहमंत्री और सूबे के नंबर-2 के सबसे ताकतवर नेता रहे नरोत्तम मिश्रा 2023 में चुनाव क्या हारे, पार्टी ने उन्हें जैसे राजनीतिक वनवास पर ही भेज दिया।

  • लोकसभा चुनाव में टिकट काटा गया।

  • राज्यसभा की रेस से दूर रखा गया।

  • संगठन में भी कोई बड़ी या प्रभावी जिम्मेदारी नहीं दी गई।

अब गलियारों में चर्चा है कि क्या मुख्यमंत्री मोहन यादव ने दिल्ली दरबार के साथ मिलकर नरोत्तम मिश्रा का पत्ता साफ कर दिया? या फिर कहानी इससे कहीं ज्यादा पेचीदा है? क्या भारतीय जनता पार्टी—जिसे कभी 'ब्राह्मण-बनिया' पार्टी कहा जाता था—अब एक सोची-समझी रणनीति के तहत अपने ही कद्दावर ब्राह्मण नेताओं को धीरे-धीरे किनारे कर रही है?


90 का दशक और बीजेपी का बदलता DNA


अगर इतिहास में झांकें, तो बीजेपी की स्थापना 1980 में हुई थी, जिसकी जड़ें 1951 के भारतीय जनसंघ में थीं। ब्राह्मणों ने बीजेपी को केवल वोट नहीं दिए, बल्कि संगठन, वैचारिक नेतृत्व, स्थानीय नेटवर्क और राम मंदिर आंदोलन में अपनी पूरी ताकत झोंक दी। अटल बिहारी वाजपेयी, मुरली मनोहर जोशी, कलराज मिश्र और केशरीनाथ त्रिपाठी जैसे चेहरे बीजेपी की मूल पहचान का हिस्सा रहे।

 

टर्निंग पॉइंट: 90 के दशक में के. गोविंदाचार्य ने 'सोशल इंजीनियरिंग' का जो फॉर्मूला दिया, उसने बीजेपी का पूरा सामाजिक ढांचा बदलना शुरू किया। 2014 के बाद बीजेपी ने अपना सामाजिक आधार तो बहुत बड़ा कर लिया, लेकिन डिसीजन मेकिंग (फैसला लेने वाले) पदों से ब्राह्मण चेहरों की हिस्सेदारी कम होती गई।


जब भी बीजेपी को अपना जनाधार बढ़ाना होता है, तब-तब पुराने कद्दावर नेताओं की बलि चढ़ने के उदाहरण सामने आते हैं:


नेता का नामभूमिका / प्रभाववर्तमान स्थिति
मुरली मनोहर जोशी & कलराज मिश्राराष्ट्रीय स्तर के दिग्गज नेताउम्र का हवाला देकर 'मार्गदर्शक मंडल' या राज्यपाल बनाकर सक्रिय राजनीति से बाहर किया गया।
अनूप मिश्राग्वालियर-चंबल के कद्दावर ब्राह्मण चेहरे (अटल जी के भांजे)धीरे-धीरे हाशिये पर धकेल दिए गए।
लक्ष्मीकांत शर्मामध्य प्रदेश में कभी मुख्यमंत्री पद के दावेदारपार्टी ने ऐसा किनारा किया कि अब इतिहास का हिस्सा बन गए।


आंकड़े क्या कहते हैं? 80% वोट, फिर भी 'मार्गदर्शक मंडल'


'CSDS-Lokniti' के आंकड़े बताते हैं कि 2014 में 72%, 2019 में 82% और हालिया चुनावों में भी लगभग 80% से ज्यादा ब्राह्मणों ने एकमुश्त भारतीय जनता पार्टी को वोट दिया। लेकिन जब इस पारंपरिक और वफादार वोट बैंक को सत्ता और संगठन में हिस्सेदारी देने की बारी आई, तो समीकरण बदल गए:


  1. मार्गदर्शक मंडल का गठन: अगस्त 2014 में केंद्र में पूर्ण बहुमत की सरकार बनने के ठीक 3 महीने बाद बीजेपी ने 'मार्गदर्शक मंडल' बनाया और दिग्गज चेहरों को चुपचाप 'रिटायर' कर दिया।

  2. यूपी का लक्ष्मीकांत बाजपेयी मॉडल: 2012 से 2016 तक लक्ष्मीकांत बाजपेयी यूपी बीजेपी के अध्यक्ष थे। 2014 के लोकसभा चुनाव में यूपी में 71 सीटें जिताने के लिए उन्होंने सड़कों पर लाठियां खाईं। लेकिन जैसे ही 2017 का विधानसभा चुनाव करीब आया, उन्हें हटाकर कमान केशव प्रसाद मौर्य (OBC चेहरा) को सौंप दी गई।

यह साफ संदेश था कि संघर्ष के दिनों में पारंपरिक चेहरों का इस्तेमाल होगा, लेकिन सत्ता के बड़े समीकरणों में नए सामाजिक चेहरों को आगे किया जाएगा।


क्या वाकई मोहन यादव ने कटवाया नरोत्तम मिश्रा का टिकट?


सच तो यह है कि मोहन यादव इस बिसात पर सिर्फ एक चेहरा हैं; असली रणनीति दिल्ली में बैठी शीर्ष लीडरशिप की है। नरोत्तम मिश्रा का 'अपराध' सिर्फ चुनाव हारना नहीं था, बल्कि उनका बढ़ता हुआ सियासी कद था। वह उस पुरानी पीढ़ी के नेता हैं जिनका अपना एक अलग समर्थक वर्ग है, जो अपने रुतबे पर राजनीति करते हैं, न कि सिर्फ दिल्ली के एक इशारे पर।


2014 के बाद से बीजेपी का पूरा फोकस OBC, SC और ST वर्गों को अपने पाले में मजबूती से बनाए रखने पर है। पार्टी यह बखूबी समझती है कि सिर्फ सवर्ण वोटों के भरोसे चुनाव नहीं जीते जा सकते।

बड़ा वैचारिक बदलाव: जिस पार्टी पर कभी विपक्षी दल देश को बांटने के आरोप लगाते थे, आज उसी के भीतर से यह आवाजें उठ रही हैं कि पार्टी नए वोट बैंक बनाने के चक्कर में अपने ही कोर कैडर को टेकन-फॉर-ग्रांटेड (Taken for granted) ले रही है।


'जनरेशनल शिफ्ट' और 'यस मैन' का दौर


बीजेपी अब उस 'Generational Shift' (पीढ़ीगत बदलाव) के दौर से गुजर रही है, जहां पार्टी को अब क्षेत्रीय क्षत्रप या बड़े मास लीडर्स (Mass Leaders) नहीं चाहिए, बल्कि ऐसे चेहरे चाहिए जो सीधे हाईकमान के प्रति वफादार हों।

  • मध्य प्रदेश में शिवराज सिंह चौहान को हटाकर मोहन यादव (OBC) को लाना।

  • छत्तीसगढ़ में रमन सिंह को हटाकर विष्णु देव साय (ST) को कमान सौंपना।

यह जनरेशनल शिफ्ट भी है और कास्ट-इंजीनियरिंग भी। राजस्थान में जरूर भजन लाल शर्मा (ब्राह्मण) को सीएम बनाया गया, लेकिन वह भी इसी शिफ्ट का हिस्सा हैं क्योंकि उन्होंने वसुंधरा राजे जैसी कद्दावर नेता को रिप्लेस किया, जिनका अपना स्वतंत्र राजनीतिक वजूद था।


निष्कर्ष: क्या नरोत्तम मिश्रा का करियर खत्म है?


राजनीति में कोई भी कभी पूरी तरह खत्म नहीं होता, लेकिन बीजेपी जिस राह पर चल पड़ी है, उसके परिणाम बहुत स्पष्ट हैं। सवर्ण और खासकर ब्राह्मण वोटर भले ही आज वैचारिक रूप से बीजेपी के साथ खड़ा हो, लेकिन सत्ता और संगठन में अपनी कम होती हिस्सेदारी को लेकर एक आंतरिक असंतोष जरूर पनप रहा है।

पार्टी का संदेश अब बहुत साफ है— चुनाव किसी राज्य के क्षत्रप, नरोत्तम मिश्रा या शिवराज के चेहरे पर नहीं, बल्कि सिर्फ 'कमल के निशान' और 'मोदी के नाम' पर लड़ा जाएगा। नरोत्तम मिश्रा का इस तरह साइलेंट होना किसी एक नेता का अंत नहीं है, बल्कि यह भारतीय राजनीति में पारंपरिक 'सवर्ण वर्चस्व' के समीकरणों के बदलने का एक बड़ा संकेत है।


आपकी क्या राय है?

क्या आपको लगता है कि बीजेपी अपने पारंपरिक सवर्ण वोटर्स को 'टेकन-फॉर-ग्रांटेड' ले रही है? या फिर बदलते दौर में पार्टी का यह कदम राजनीतिक रूप से बिल्कुल सही है? अपनी राय नीचे कमेंट बॉक्स में जरूर लिखें। इस रिपोर्ट को शेयर करें और niotimes.com को फॉलो करना न भूलें!

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Narottam Mishra, Mohan Yadav, MP Politics, BJP Social Engineering, Brahmin Leaders in BJP, Generational Shift BJP, Madhya Pradesh News, Nimesh Tomar, Nio Times

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