हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड जैसे पहाड़ी इलाकों में अक्सर हमें फ्लैश फ्लड, भूस्खलन और पहाड़ों के गिरने की खबर मिलती है. पिछले कुछ सालों में ये घटनाएं बढ़ी हैं. हिमाचल और उत्तराखंड के पहाड़ उम्र के हिसाब से युवा है.
ये अभी मजबूत हो रहे हैं. ऐसे में इनपर हो रहे विकास कार्यों की वजह से दरारें पड़ती हैं. टूट-फूट होती है. जिससे पहाड़ों का भार संतुलन बिगड़ता है. बारिश के मौसम में या फिर बारिश के बाद इनकी नींव कमजोर हो जाती है और टूटकर गिरने लगते हैं.
हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट्स, सुरंगों और सड़कों के निर्माण के लिए तेज विस्फोट, ड्रिलिंग आदि से पैदा होने वाली कंपन इन पहाड़ों की ऊपरी सतह और पत्थरों को हिला देती हैं. 27 और 28 जुलाई को लाहौल-स्पीति में भारी बारिश के बाद सात लोगों की मौत हो गई.
केलॉन्ग और उदयपुर सबडिविजन के जिलों में बादल फटने के बाद फ्लैश फ्लड की 12 घटनाएं हुईं. लाहौल-स्पीति और किन्नौर जिले भूगर्भीय और पारिस्थितिकी के हिसाब से काफी ज्यादा संवेदनशील है. ये कमजोर हैं.
सड़कों के निर्माण के समय उच्च-गुणवत्ता की दीवारें नहीं बनाई जाती. न ही पत्थरों को रोकने के लिए मजबूत जाल बिछाए जाते हैं. कम से कम इनके सहारे हादसे की तीव्रता को तो कम किया जा सकता है.
19 मार्च 2021 को लोकसभा में एक सवाल के जवाब में बताया गया था कि भूस्खलन के सबसे ज्यादा मामले केरल में दर्ज किए गए हैं. साल 2014 से 2020 के बीच केरल में भूस्खलन के 2238 मामले सामने आए हैं. जबकि, इसके बाद 374 मामलों के साथ पश्चिम बंगाल दूसरे नंबर पर है. इन सवालों के जवाब तत्कालीन पृथ्वी विज्ञान मंत्री डॉ. हर्षवर्धन ने दिया था.
हिमालयी इलाकों में भूस्खलन और पहाड़ों के गिरने के सबसे ज्यादा 169 मामले जम्मू और कश्मीर में दर्ज किए गए हैं. 120 मामले असम में, हिमाचल प्रदेश में 97 मामले, नगालैंड में 34, अरुणाचल प्रदेश में 33, मेघालय में 32 और उत्तराखंड में 27 मामले दर्ज किए गए हैं.
दिक्कत ये है कि इनमें से ज्यादातर मामलों में आप प्रकृति को दोष नहीं दे सकते. बिना सही प्लानिंग और वैज्ञानिक तरीकों के विकास कार्य कराने का ऐसा नतीजा सामने आना लाजमी है. बारिश के समय में परिवर्तन और लगातार बढ़ रही गर्मी की वजह से भी पहाड़ों की सेहत पर असर पड़ता है.
बताया जाता है कि सतलज घाटी में 140 हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट्स लाने की तैयारी है. यानी यह इलाका भी उत्तराखंड के चमोली और केदारनाथ जैसे हादसों की चपेट में कभी भी आ सकता है. पर्यावरणविदों का कहना है कि हिमालय के इलाकों में खासतौर से सतलज और चेनाब घाटी में कोई भी प्रोजेक्ट शुरु करने से पहले इनसे पड़ने वाले दुष्प्रभावों पर अध्ययन किया जाना चाहिए.
आजकल हर कोई पहाड़ों पर जाकर रहना चाहता है. वहां संपत्ति खरीदना चाहता है. पहाड़ों पर तेजी से शहर विकसित हो रहे हैं. ज्यादा शहरीकरण की फिराक में पहाड़ों की हालत खस्ता हो रही है
पहाड़ों पर ज्यादा शहर बनेंगे तो उसकी मिट्टी की फिल्टरेशन क्षमता कम हो जाएगी. ऐसे में तेज बारिश से फ्लैश फ्लड या भूस्खलन की आशंका बढ़ जाती है. पहले जो बारिश पूरे सीजन में होती थी, अब वो कुछ ही दिन में हो जाती है. इसकी वजह से भूस्खलन और पहाड़ों के गिरने की घटनाएं तेजी से बढ़ रही हैं.
एक वजह और है. ग्लेशियरों के पिघलने से जो बर्फ, मिट्टी, पत्थर और कीचड़ आता है, वो पहाड़ों और घाटियों की मिट्टी के ऊपरी सतह पर जमा हो जाता है. इनके दबाव से पहाड़ों की मिट्टी कमजोर होती है. फिर धीरे-धीरे ये ही दरक कर गिरने लगता है
हिमाचल प्रदेश के चंबा, किन्नौर, कुल्लू, मंडी, शिमला, सिरमौर और ऊना जिले फ्लैश फ्लड, भूस्खलन, बादलों के फटने जैसे प्राकृतिक आपदाओं के प्रति ज्यादा संवेदनशील हैं. एक रिपोर्ट के मुताबिक साल 2014 से 2020 के बीच पूरे देश में लैंडस्लाइड और पहाड़ों के गिरने की वजह से करीब 300 लोगों की मौत हुई है.
कइयों का तो पता भी नहीं चला. अगर लोकसभा में मौजूद सरकारी दस्तावेजों की बात माने तो केंद्र सरकार नेशनल लैंडस्लाइड सक्सेप्टिबिलिटी मैपिंग (NLSM) प्रोग्राम चला रही है.
NLSM प्रोग्राम को जियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया ने साल 2013 में उत्तराखंड हादसे के बाद शुरु किया था. इस प्रोग्राम के तहत देश के उन राज्यों के हिस्सों के नक्शे बनाए गए हैं, जहां भूस्खलन और पहाड़ों के दरकने की आशंका रहती है. इस प्रोग्राम के नक्शे में सबसे बड़ा इलाका हिमाचल प्रदेश का है.
हिमाचल का 42,100 वर्ग किलोमीटर का इलाका किसी भी समय ऐसी प्राकृतिक आपदाओं का शिकार हो सकता है. इसके अलावा लद्दाख का 40 हजार वर्ग किमी, उत्तराखंड का 39 हजार वर्ग किमी, जम्मू और कश्मीर का 28,700 वर्ग किमी और महाराष्ट्र का 28,190 वर्ग किमी इलाका शामिल है. इस सूची में कई और राज्य भी हैं, लेकिन हिमाचल समेत इन पांच राज्यों का इलाका सबसे ज्यादा है.
हिमालय की नदियों के एक्सपर्ट बताते हैं कि दशकों से इस तरह के खतरे को बुलावा दिया जा रहा है. हिमालयी इलाकों में चल रहे विकास कार्यों के एनवायरमेंटल इम्पैक्ट एसेसमेंट (EIA) या तो रोक कर रखी जाती हैं. या फिर उन्हें दबा दिया जाता है. ताकि प्रोजेक्ट्स को अनुमति मिल जाए.
अनुमति मिलने के बाद पहाड़ों के साथ जिस तरह की ज्यादती की जाती है, वो हर किसी को पता है. जगह-जगह विस्फोट किए जाते हैं. ड्रिलिंग की जाती है, वह भी बिना वैज्ञानिक तौर-तरीकों के. क्योंकि वैज्ञानिक तौर-तरीकों के साथ काम करने पर लागत बढ़ जाती है.

