जिस इंदिरा गांधी सरकार के दौर में... साधु-संतों पर गोलियाँ चलाई गई थीं... जिस राहुल गांधी के 'हिंदू और हिंसा' वाले बयान ने पूरे देश में सियासी तूफ़ान खड़ा कर दिया था... जिस कांग्रेस ने राम मंदिर की प्राण-प्रतिष्ठा से दूरी बनाई थी... आज वही कांग्रेस... राम मंदिर और हिंदुत्व के मुद्दे पर यू-टर्न ले रही है!"
सवाल यह नहीं है कि कांग्रेस राम मंदिर का मुद्दा क्यों उठा रही है... सवाल तो यह है कि आखिर यह बदलाव आया कैसे?... क्या कांग्रेस फिर से 80 के दशक वाले राजीव गांधी के दौर की राजनीति में लौट रही है?... या फिर आने वाले चुनावों की लड़ाई ने उसकी पूरी रणनीति बदल दी है?"
"क्या यह आस्था की राजनीति है... या फिर उसी हथियार से बीजेपी को घेरने की कोशिश, जिसने भारतीय जनता पार्टी को दशकों तक देश की राजनीति के केंद्र में बनाए रखा?... क्या कांग्रेस अब उसी राजनीतिक एजेंडे से बीजेपी को चुनौती देना चाहती है, जिसने कभी बीजेपी को 2 सीटों से उठाकर देश की सबसे बड़ी पार्टी बना दिया था?... चलिए... नियो टाइम्स की इस खास रिपोर्ट में इस पूरे चक्रव्यूह को समझते हैं।.......
देश में जब से बीजेपी की सरकार आई है और पीएम नरेद्र मोदी बने है उसके बाद से भारतीय राजनीति का व्याकरण पूरी तरह बदल गया। नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में बीजेपी ने जिस आक्रामक राष्ट्रवाद और सांस्कृतिक हिंदुत्व के नैरेटिव को खड़ा किया, कांग्रेस के पास उसकी कोई ठोस काट नहीं थी। 2014 की करारी हार... फिर 2019 का झटका... और 2024 तक आते-आते यह साफ़ हो गया कि कांग्रेस की पारंपरिक 'सेक्युलर' ब्रांड वाली राजनीति अब जनता के बीच बेअसर हो चुकी है। कांग्रेस लगातार चुनाव हारती रही, उसका पारंपरिक वोट बैंक खिसकता रहा, और पार्टी पर एक ऐसा ठप्पा लग गया जिसे मिटाना लगभग नामुमकिन लगने लगा।"
मोदी लहर से निपटने के लिए राहुल गांधी ने कई प्रयोग किए। गुजरात चुनाव के समय राहुल गांधी को 'जनेऊधारी ब्राह्मण' के रूप में प्रोजेक्ट किया गया। उन्होंने केदारनाथ से लेकर उज्जैन के महाकाल और सोमनाथ मंदिर तक 'टेम्पल रन' किया। 'भारत जोड़ो यात्रा' में भी खुद को शिवभक्त के रूप में पेश किया। लेकिन उन्हें सफलता नहीं मिली... क्यों? क्योंकि एक तरफ राहुल गांधी मंदिर-मंदिर घूम रहे थे, तो दूसरी तरफ उनकी ही पार्टी के रणनीतिकार राम मंदिर आंदोलन को बीजेपी का 'राजनीतिक स्टंट' बताते रहे।. लेकिन जब जनवरी 2024 में कांग्रेस ने राम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा का न्योता ठुकरा दिया। तो बीजेपी ने तुरंत इसे 'राम विरोधी' स्टैंड करार दिया और जनता के बीच यह नैरेटिव सेट कर दिया कि राहुल गांधी का हिंदुत्व सिर्फ चुनावी है।"
लेकिन जिस कांग्रेस पर आज राम-विरोधी होने के आरोप लगते हैं... और जिस राम मंदिर मुद्दे पर आज बीजेपी का एकछत्र राज माना जाता है... उसके शुरुआती और सबसे बड़े अध्याय पर कांग्रेस के ही दस्तखत थे! यही इस कहनी का सबसे बड़ा ट्वीस्ट है ... "तारीख थी 1 फरवरी 1986। अयोध्या के विवादित ढांचे का ताला अचानक अदालत के आदेश से खोल दिया गया। उस समय केंद्र और उत्तर प्रदेश दोनों जगह राजीव गांधी के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार थी। यह कोई इत्तेफाक नहीं, बल्कि एक सोची-समझी राजनीतिक रणनीति थी। इसके दो साल बाद आया 1989 का लोकसभा चुनाव। 9 नवंबर 1989 को राजीव गांधी सरकार ने विवादित स्थल के पास राम मंदिर के शिलान्यास (Foundation Stone) की आधिकारिक इजाजत दी। इतना ही नहीं, राजीव गांधी ने 1989 में अपने चुनाव प्रचार का आगाज़ अयोध्या की धरती से ही किया और नारा दिया— 'रामराज्य' का! यानी ताले खुलवाने से लेकर शिलान्यास कराने तक... राम जन्मभूमि आंदोलन की शुरुआती पटकथा में कांग्रेस का अपना बड़ा हाथ था।....
तो फिर ऐसा क्या हुआ कि वही कांग्रेस, जिसने राम मंदिर के ताले खुलवाए .... शिलान्यास कराया... वही इस मुद्दे से इतनी दूर हो गई कि उस पर मंदिर-विरोधी होने का ठप्पा लग गया? दरसल इसकी शुरुवात राजीव गाँधी के अयोध्य चुनाव प्रचार से नहीं हुई.. असल में कहानी बदली 1990 में, जब लालकृष्ण आडवाणी ने 'सोमनाथ से अयोध्या' तक ऐतिहासिक राम रथयात्रा निकाली। बीजेपी ने इस मुद्दे को अपने कोर वैचारिक एजेंडे से जोड़ दिया। ... और यही से पूरी कहानी बदल गयी ..... जिस कांग्रेस सरकार में मंदिर के ताले खोले गए .. जिसने अपने चुनव का आगाज़ ही अयोध्या की धरती से किया ..अब वही कांग्रेस धर्मसंकट में फंस गई। कांग्रेस न तो खुलकर बीजेपी के इस आंदोलन का समर्थन कर सकती थी, और न ही इसे पूरी तरह रोक पा रही थी। 80 के दशक में शाह बानो केस के बाद संतुलन बनाने के चक्कर में कांग्रेस दोनों तरफ से घिर चुकी थी।......
नतीजा यह हुआ कि 90 के दशक से 2024 तक... कांग्रेस ने खुद को 'न्यूट्रल' और 'सेक्युलर' दिखाने की कोशिश की, और बीजेपी ने इसे 'तुष्टिकरण' (Appeasement) साबित कर दिया। 2024 में प्राण-प्रतिष्ठा का बहिष्कार बीजेपी के लिए सोने पर सुहागा साबित हुआ। बीजेपी ने राम मंदिर को अपनी सबसे बड़ी जीत बना लिया, और कांग्रेस इस पूरे नैरेटिव से पूरी तरह अलग-थलग पड़ गई।"
और अब लगातार चुनावी झटकों के बाद अब कांग्रेस को समझ आ चुका है कि देश की बहुसंख्यक भावनाओं और अपनी ही ऐतिहासिक जड़ों से दूरी बनाकर चुनाव नहीं जीता जा सकता। और अब वही कांग्रेस जो अभी तक खुद को सेकुलर साबित करने में जुटी थी .. खुलकर चन्दा चोरी का मुद्दा उठा रही है ..और दबी ज़बान में जनता को याद दिला रहे हैं कि अयोध्या में ताले उनके समय में ही खुले थे। लेकिन सबसे बड़ा सवाल आज भी वही है: क्या जनता 2026 में कांग्रेस के इस री-ब्रांडिंग और यू-टर्न पर भरोसा करेगी? या फिर बीजेपी का हिंदुत्व का किला इतना मजबूत हो चुका है कि कांग्रेस की इस कोशिश को 'बहुत देर से उठाया गया कदम' माना जाएगा?
इतिहास गवाह है—राजनीति में जो अपने अतीत को भूल जाता है, वर्तमान उसे पीछे छोड़ देता है। अब देखना यह होगा कि क्या कांग्रेस अपने ही बुने इस चक्रव्यूह को भेद पाएगी या नहीं।" "आपकी इस पूरे सियासी यू-टर्न पर क्या राय है? कमेंट्स में अपनी बात ज़रूर रखें।
ब्यूरो रिपोर्ट — नियो टाइम्स

