नेपाल संकट में भारत की मदद: संसद में गूंजा धन्यवाद, फिर क्यों चर्चा में आया चीन?
हिंदुस्तान ने पिछले एक हफ्ते में नेपाल के लिए जो कुछ भी किया है, उसकी गूंज अब नेपाल की संसद तक सुनाई दे रही है। वजह सिर्फ यह नहीं है कि भारत युद्ध स्तर पर नेपाल की मदद कर रहा है, बल्कि इसलिए भी है क्योंकि पिछले 168 घंटों में भारत ने नेपाल के लिए जो किया, उसने एक बार फिर भारत-नेपाल रिश्ते की उस तस्वीर को सामने ला दिया है, जो सिर्फ कूटनीति और समझौतों से नहीं बनी, बल्कि सदियों पुराने रिश्तों से बनी है।
पिछले सात दिनों में नेपाल में मौतों का आंकड़ा 1,127 तक पहुंच चुका है और करीब 4,858 लोग अभी भी लापता बताए जा रहे हैं। लेकिन इस भीषण संकट के बीच नेपाल के प्रधानमंत्री बालेन्द्र शाह ने जिस तरह संसद में भारत की मदद का जिक्र करते हुए धन्यवाद दिया, उसने एक बार फिर भारत और नेपाल के रिश्तों को चर्चा के केंद्र में ला दिया है।
मुश्किल वक्त में नेपाल के साथ खड़ा भारत
जब पूरी दुनिया का ध्यान नेपाल की इस त्रासदी पर है, भारत सिर्फ तमाशबीन बनकर नहीं बैठा। भारत की NDRF, भारतीय सेना और भारतीय वायुसेना राहत और बचाव अभियानों में जुटी हुई हैं। राहत सामग्री, मेडिकल सप्लाई, तकनीकी सहायता और रेस्क्यू सपोर्ट के जरिए भारत ने नेपाल तक मदद पहुंचाई है।
शायद यही वजह है कि नेपाल के प्रधानमंत्री बालेन्द्र शाह ने संसद में खड़े होकर भारत की मदद के लिए धन्यवाद दिया। हालांकि भारत का जिक्र इस कहानी को सिर्फ आज की मदद तक सीमित नहीं करता। भारत मुश्किल वक्त में नेपाल के साथ पहले भी खड़ा रहा है। चाहे 2015 का विनाशकारी भूकंप हो, बाढ़ जैसी प्राकृतिक आपदाएं हों या 2026 की यह तबाही, भारत ने नेपाल के लिए राहत और बचाव अभियान में सक्रिय भूमिका निभाई है।
भारत और नेपाल का रिश्ता सिर्फ दो सरकारों के बीच का संबंध नहीं है। यह धर्म, संस्कृति, आस्था, परंपराओं और लोगों के बीच के रिश्तों से बना है। यही वह कनेक्शन है जिसकी वजह से जब नेपाल संकट में आता है, भारत उसे किसी दूसरे देश की परेशानी की तरह नहीं देखता, बल्कि एक ऐसे पड़ोसी की परेशानी के रूप में देखता है जिसके साथ उसका रिश्ता सदियों पुराना है।
लेकिन नेपाल में चीन की बढ़ती मौजूदगी ने कहानी बदल दी
इसके बावजूद पिछले कुछ वर्षों में नेपाल के अंदर चीन अपनी मौजूदगी लगातार बढ़ाता रहा है। भारत-नेपाल रिश्तों के बीच कई बार दूरी और तनाव दिखाई दिया है और इसी दौरान चीन ने नेपाल में अपने लिए रणनीतिक जगह बनाने की कोशिश तेज की है।
चीन ने नेपाल को सिर्फ एक पड़ोसी देश के रूप में नहीं देखा, बल्कि हिमालयी क्षेत्र में अपनी रणनीतिक मौजूदगी बढ़ाने के लिए नेपाल को महत्वपूर्ण माना। 2017 में नेपाल ने चीन के Belt and Road Initiative यानी BRI framework पर हस्ताक्षर किए। इसके बाद नेपाल में चीन की मौजूदगी सड़क, बिजली, कनेक्टिविटी और इंफ्रास्ट्रक्चर से जुड़े प्रोजेक्ट्स तक फैलती गई।
यहीं से भारत के लिए कहानी थोड़ी मुश्किल होने लगी। जिस नेपाल के साथ भारत के सदियों पुराने रिश्ते थे, उसी नेपाल में चीन अपने लिए एक नया strategic space तैयार कर रहा था। दूसरी तरफ नेपाल की राजनीति में भारत को लेकर नाराजगी का एक narrative भी लगातार मजबूत होता गया। कभी सीमा विवाद को लेकर, कभी भारत की नीतियों को लेकर और कभी इस आरोप को लेकर कि भारत नेपाल के आंतरिक मामलों में जरूरत से ज्यादा दखल देता है।
2020 का सीमा विवाद और भारत-नेपाल रिश्तों में तल्खी
फिर आया 2020 का वह दौर, जब Kalapani, Lipulekh और Limpiyadhura को लेकर भारत और नेपाल के बीच जबरदस्त तनाव पैदा हुआ। नेपाल ने अपना नया राजनीतिक नक्शा जारी किया, जिसमें इन क्षेत्रों को अपने हिस्से में दिखाया गया। भारत ने नेपाल के दावे को स्वीकार नहीं किया और दोनों देशों के रिश्तों में तल्खी खुलकर सामने आ गई।
यानी एक तरफ चीन नेपाल में अपनी पकड़ मजबूत कर रहा था, तो दूसरी तरफ भारत और नेपाल, जो सदियों से एक-दूसरे के सबसे करीब रहे हैं, उनके बीच सीमा विवाद बढ़ रहा था। इसी बीच नेपाल की राजनीति में भारत-विरोधी आवाजें भी तेज होती गईं। हालात यहां तक पहुंचे कि भारत के खिलाफ सड़क पर प्रदर्शन हुए और दोनों देशों के बीच वह रिश्ता, जिसे अक्सर 'रोटी-बेटी का रिश्ता' कहा जाता है, उसमें राजनीति की कड़वाहट घुलती चली गई।
जब संकट आया तो पुराने विवाद पीछे छूट गए
लेकिन इस पूरी कहानी का सबसे बड़ा ट्विस्ट शायद यही है। जिस भारत के खिलाफ नेपाल की राजनीति में सवाल उठ रहे थे, जिस भारत के साथ सीमा को लेकर विवाद चल रहा था और जिस भारत से दूरी बनाने की कोशिशों के बीच चीन नेपाल में अपनी मौजूदगी बढ़ा रहा था, उसी भारत ने जब नेपाल पर बड़ी आफत आई तो पुराने विवादों का हिसाब नहीं लगाया।
भारत ने यह नहीं पूछा कि नेपाल की सरकार ने उसके बारे में क्या कहा। भारत ने सिर्फ इतना देखा कि सामने एक पड़ोसी है और वह मुसीबत में है।
26 अगस्त को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नेपाल के प्रधानमंत्री बालेन्द्र शाह से बात की, नेपाल की त्रासदी पर दुख जताया और भारत की तरफ से हर संभव मानवीय सहायता का भरोसा दिया। इसके बाद भारत की तरफ से राहत सामग्री, मेडिकल सप्लाई, तकनीकी सहायता और रेस्क्यू सपोर्ट पहुंचाया गया।
यानी जिस रिश्ते में पिछले कुछ वर्षों में राजनीति और सीमा विवाद की वजह से तनाव आया था, उसी रिश्ते में संकट की घड़ी आते ही भारत ने फिर वही पुराना रास्ता चुना—मदद का रास्ता।
भारत-नेपाल रिश्ते की असली ताकत क्या है?
शायद यही भारत-नेपाल रिश्ते की सबसे बड़ी ताकत है। राजनीति बदल सकती है, सरकारें बदल सकती हैं और प्रधानमंत्री बदल सकते हैं, लेकिन दोनों देशों के लोगों के बीच बना सदियों पुराना सामाजिक और सांस्कृतिक रिश्ता इतनी आसानी से खत्म नहीं होता।
नेपाल में आई इस आपदा ने एक बार फिर यही सवाल सामने रखा है कि भारत और नेपाल के रिश्ते को सिर्फ कूटनीतिक समीकरणों और राजनीतिक बयानबाजी से समझा जा सकता है या फिर इसके पीछे मौजूद उस गहरे मानवीय और सांस्कृतिक रिश्ते को भी देखना होगा, जो संकट की घड़ी में सबसे ज्यादा दिखाई देता है।
और शायद नेपाल की संसद में भारत के लिए गूंजा धन्यवाद इसी कहानी का सबसे बड़ा संकेत है।

