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Monday, July 20, 2026 | Monday, July 20, 2026 WIB

मोदी सरकार... आखिर ऐसा कौन-सा कानून बदलने जा रही है... जिसके नाम ने संसद से लेकर सोशल मीडिया तक सियासी हलचल बढ़ गयी है क्या यह सिर्फ़ एक कानूनी संशोधन है...? या फिर... 54 साल पहले बने उस कानून को बदलने की तैयारी है... जिसे 23 दिसंबर 1971 को तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने लागू किया गया था?....आख़िर प्रिवेंशन ऑफ़ इंसल्ट्स टू नेशनल ऑनर एक्ट में ऐसा क्या बदलने वाला है...जिसने मुस्लिम संगठनों के बीच नई बहस छेड़ दी है.....चलिए इस विडियो में समझते है ....


ये पहली बार नहीं जब मोदी सरकार कोई कानून बदले या उसमे संधोधन करने जा रही .. पिछले कुछ सालों  ऐसे दर्जनों कानून है  जिन्हें मोदी सरकर ने या तो बदल दिया या फिर उनमे सनोस्धन कर दिया है .11 अगस्त 2023 को...सबसे पहले... 160 साल पुराने इंडियन पीनल कोड (IPC) की जगह भारतीय न्याय संहिता (Bharatiya Nyaya Sanhita) लागू  कर दी ! फिर.. 1 जुलाई 2024 को.. 1973 की क्रिमिनल प्रोसीजर कोड यानी CrPC की जगह भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) लाई गई। इसके बाद... 1872 के इंडियन एविडेंस एक्ट को बदलकर भारतीय साक्ष्य अधिनियम लागू किया गया।  यानी... अब तक मोदी सरकार का संदेश साफ़ रहा है... की अंग्रेज़ों के दौर से चले आ रहे हों या दशकों पुराने भारतीय कानून... अगर सरकार को ज़रूरत महसूस होती है... तो उन्हें बदलने से वो  पीछे नहीं हटेगी। 


लेकिन... इस बार मामला अलग है। क्योंकि इस बार सरकार किसी आपराधिक कानून... किसी आर्थिक कानून... या किसी प्रशासनिक कानून को नहीं... बल्कि उस कानून में संशोधन करने जा रही है... जो पिछले 54 साल से देश के राष्ट्रीय सम्मान की रक्षा का आधार माना जाता है।  नाम है. प्रिवेंशन ऑफ़ इंसल्ट्स टू नेशनल ऑनर एक्ट 1971... सवाल ये नहीं की ..  सरकार इसमें संसोधन  करने जा रही है .. सवाल तो ये है ..इसका असर उन लोगो पर क्या होगा .. जिस संसोधन का विरोध कर रहे है .और  संसद से लेकर सड़क तक... और राजनीतिक दलों से लेकर कुछ मुस्लिम संगठनों तक... इसका विरोध हो रहा है ....

 

आगे की कहानी समझेंगे लेकिन उससे पहले हमें ये समझना होगा  की आखिर प्रिवेंशन ऑफ़ इंसल्ट्स टू नेशनल ऑनर एक्ट, 1971 है क्या?  और मोदी सरकार इसमें बदलना क्या चाहती है। और क्यों बदलना चाहती है ? वर्ष 1947 में देश की आज़ादी के बाद...भारत को अपना संविधान मिला...अपना राष्ट्रीय ध्वज मिला...अपना राष्ट्रगान मिला...लेकिन...इन राष्ट्रीय प्रतीकों का जानबूझकर अपमान करने वालों के खिलाफ़ कोई अलग और व्यापक केंद्रीय कानून नहीं था। यही वजह थी की 23 दिसंबर 1971 को संसद ने प्रिवेंशन ऑफ़ इंसल्ट्स टू नेशनल ऑनर एक्ट पास किया  .... इस कानून का मकसद था — राष्ट्रध्वज, राष्ट्रगान "जन गण मन" और संविधान का अपमान करने वालों को सज़ा देना। इसमें तीन साल तक की कैद, या जुर्माना, दोनों था 


लेकिन इस कानून में एक नाम शामिल नहीं किया गया... जिसने स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान लाखों भारतीयों को एकजुट किया ..— वो नाम था ..वंदे मातरम का । वो गीत, जिसे 1875 में बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय ने लिखा,  1882 में उनके उपन्यास "आनंदमठ" में छपा, और जिसे 24 जनवरी 1950 को संविधान सभा ने राष्ट्रगीत का दर्जा दिया — उसे कभी वो कानूनी सुरक्षा नहीं मिली थी, जो राष्ट्रगान को मिलती है। .... 


ऐसे में  सवाल उठा ..की अगर 'वंदे मातरम्' स्वतंत्रता आंदोलन का इतना बड़ा प्रतीक था... तो इसे 1971 के कानून में शामिल क्यों नहीं किया गया?  इसका जवाब हमें लगभग 90 साल पीछे ले जाता है.. वर्ष 1937 में, जब मुस्लिम लीग ने 'वन्दे मातरम्' के कुछ अंतरों पर धार्मिक आधार पर आपत्ति जताई । इसके बाद 28 अक्टूबर 1937 को कांग्रेस कार्यसमिति ने सिफारिश की कि राष्ट्रीय सभाओं में 'वन्दे मातरम्' के केवल पहले दो अंतरे ही गाए जाएँ।  और यही से पूरी कहानी बदल जाती है ... और यह  विवाद...आज़ादी के बाद संविधान सभा तक भी पहुँचा।  


जहाँ 24 जनवरी 1950 को संविधान सभा के अध्यक्ष डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने घोषणा की कि 'जन गण मन' भारत का राष्ट्रगान होगा, जबकि 'वन्दे मातरम्' को राष्ट्रीय गीत का दर्जा दिया जाएगा। यानी... संविधान सभा ने दोनों को सम्मान दिया... लेकिन दोनों की संवैधानिक भूमिका अलग-अलग तय की। अब सवाल था की जब 1950 में संविधान सभा ने 'वंदे मातरम्' को सम्मान देने का फैसला कर दिया था... तो फिर 1971 में जब  प्रिवेंशन ऑफ़ इंसल्ट्स टू नेशनल ऑनर एक्ट बनाया गया... तब उसमें राष्ट्रगान 'जन गण मन' को तो कानूनी संरक्षण मिला... लेकिन राष्ट्रीय गीत 'वन्दे मातरम्' को इस कानून के दायरे में क्यों नहीं रखा गया?" और  54 साल पुराने इस कानून मोदी सरकार इसे बदलना क्यों चाहती है? ..................


 

दरअसल..आज भी देश में एक वर्ग ऐसा है जो वन्देमातरम नहीं गाता है   और वो उसे फ्रीडम ऑफ स्पीच बताता है ...मोदी सरकार  प्रिवेंशन ऑफ़ इंसल्ट्स टू नेशनल ऑनर एक्ट  में संशोधन कर राष्ट्रीय गीत 'वन्दे मातरम्' को भी वही कानूनी संरक्षण  देना चाहती है। जो राष्ट्रगान को मिला हुआ है .. "अगर यह संशोधन कानून बन जाता है, तो 'वन्दे मातरम्' के अपमान पर भी इसी कानून के तहत कार्रवाई  की जाएगी ..


यहीं से... राजनीति दो हिस्सों में बंट जाती है। सरकार और उसके समर्थकों का कहना है...जब 'जन गण मन' राष्ट्रगान होने के कारण कानूनी संरक्षण पा सकता है... तो 'वन्दे मातरम्', क्यों नहीं  जिसने स्वतंत्रता आंदोलन में ऐतिहासिक भूमिका निभाई और जिसे राष्ट्रीय गीत का दर्जा प्राप्त है,  जबकि ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड (AIMPLB) ने इस प्रस्ताव का विरोध किया है। बोर्ड का कहना है कि 'वन्दे मातरम्' के कुछ अंतरों में देवी-देवताओं का उल्लेख है, जिसे इस्लामी मान्यता के अनुसार स्वीकार नहीं किया जा सकता।........


 

अब तक 'वन्दे मातरम्' गाना या न गाना अभिव्यक्ति की आज़ादी और व्यक्तिगत पसंद का हिस्सा था। लेकिन यह नया कानून इसे 'राष्ट्रवाद की अनिवार्य कसौटी' बना देगा। स्कूलों, सरकारी दफ़्तरों, या किसी भी सार्वजनिक कार्यक्रम में अगर कोई व्यक्ति 'वन्दे मातरम्' गाते समय खड़ा नहीं होता, चुप रहता है, या इसका विरोध करता है, तो उस पर सीधे पुलिस केस दर्ज हो  सकता है .......


 कांग्रेस, समाजवादी पार्टी और अन्य विपक्षी दलों के लिए यह कानून 'गले की हड्डी' बन जाएगा। अगर वो संसद में इस बिल का विरोध करेंगे... तो सत्ता पक्ष उन्हें 'देशद्रोही' और 'वन्दे मातरम् का विरोधी' बताकर पूरे देश में उनके खिलाफ माहौल बना देगा।  अगर वो इस बिल का समर्थन करेंगे... तो उनका मुख्य मुस्लिम वोट बैंक उनसे छिटक जाएगा।   तो कुल मिलाकर... मोदी सरकार का यह कदम महज़ 54 साल पुराने एक कानून का संशोधन नहीं है। यह 1937 के उस ऐतिहासिक समझौते को 90 साल बाद पलटने... और आने वाले चुनावों के लिए एक नई सियासी पिच तैयार करने का मास्टरस्ट्रोक है। सवाल यह नहीं है कि 'वन्दे मातरम्' का सम्मान होना चाहिए या नहीं... क्योंकि वो तो हर भारतीय के दिल में है। बड़ा सवाल यह है कि क्या देशभक्ति और सम्मान को कानून के डंडे और जेल के डर से मनवाया जा सकता है? आपकी इस नए कानून पर क्या राय है? क्या 'वन्दे मातरम्' को न गाने पर जेल होनी चाहिए?  आप अपनी राय कमेन्ट बॉक्स में लिखकर बता सकते है ... 





 








 



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