क्या हिंदुस्तान की ज़मीन पर नेपाल ने कब्ज़ा कर लिया है? क्या लिंपियाधुरा, कालापानी भारत के नहीं, नेपाल का हिस्सा हैं? पिछले दिनों नेपाल के प्रधानमंत्री बालेन शाह ने भारत को लेकर जो बयान दिया ... उसने न सिर्फ नेपाल, बल्कि भारत की सियासत और सुरक्षा एजेंसियों में भी हलचल बढ़ा दी है! तो क्या नेपाल भी उसी लाइन में खड़ा होने की कोशिश में है .. जिस लाइन में पाकिस्तान ,और बनागाल्देश , पहले से खड़े है ? .. आखिर क्यों पिछले कई सालो से नेपाल .. भारत के लिए चुनौतियाँ खड़ी कर रहा है .. और वो भारत के कौन से हिस्स्से है .. जहाँ नेपाल कब्जे का दवा कर रहा रहा है... चलिएय समझते है .... इस एक विडियो में ........
इतिहास गवाह है कि जिस नेपाल की हर मुश्किल वक्त में भारत ने सबसे आगे बढ़कर मदद की, आज वही नेपाल चीन के इशारे पर भारत को आँख दिखा रहा है। लेकिन शायद नेपाल की बालेंन सरकार ये भूल गई है ..कि यह वही भारत है, जिसने हमेशा एक सच्चे पड़ोसी का धर्म निभाया है। साल 2015 में जब नेपाल में विनाशकारी भूकंप आया तब भारत ने बिना एक पल गंवाए 'ऑपरेशन मैत्री'के जरिये । सबसे पहले राहत सामग्री, मेडिकल टीमें और मलबे से ज़िंदगियां निकालने के लिए भारतीय वायुसेना के हेलीकॉप्टर नेपाल की धरती पर उतरे थे। नेपाल में जब भी ईंधन, रसोई गैस या आवश्यक खाद्यान्न का संकट गहराया, भारत ने अपनी सीमाएं खुली रखीं ताकि नेपाल की जनता को तकलीफ न हो। लेकिन आज वही नेपाल, चाइना के इशारे पर भारत की ज़मीन को अपानी बता रहा है!
भारत इस वक्त एक बेहद संवेदनशील दौर से गुज़र रहा है। एक तरफ पाकिस्तान है, जो दशकों से सीमा पर आतंकवाद और कूटनीतिक दुश्मनी की लाइन में खड़ा है। दूसरी तरफ बांग्लादेश है, जहाँ हालिया राजनीतिक उथल-पुथल और आंतरिक अस्थिरता के बाद भारत के लिए सुरक्षा चुनौतियाँ अचानक बढ़ गई हैं।
और अब, इसी कतार में नेपाल को भी खड़ा करने की साज़िश रची जा रही है। चीन की 'स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स' (String of Pearls) और 'डेट-ट्रैप' (कर्ज जाल) नीति का असर साफ दिख रहा है।
बीजिंग का सीधा एजेंडा है कि भारत को उसके पड़ोसियों के ज़रिए ही सीमाओं पर इस कदर उलझा दिया जाए कि भारत एक वैश्विक महाशक्ति बनने के अपने मार्ग से भटक जाए। और काठमांडू के कुछ नेता इसी चीनी स्क्रिप्ट की भाषा बोल रहे हैं। अब सवाल है कि क्या सच में नेपाल ने भारत की ज़मीन पर कब्ज़ा कर लिया है... या यह सिर्फ राजनीतिक बयानबाज़ी है, जो सिर्फ अखबारों की हेडलाइंस के लिए दी गई है?
इस पूरे विवाद की ज़मीनी हकीकत और कानूनी सच को समझने से पहले... आपको साल 1816 में हुए भारत-नेपाल के उस ऐतिहासिक 'सुगौली समझौते' को समझना होगा... जिसने इस विवाद को जन्म दिया। साल 1816 में ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी और नेपाल के गोरखा राजा के बीच एंग्लो-नेपाल युद्ध के बाद सुगौली की संधि पर हस्ताक्षर हुए थे। इस संधि के तहत तय हुआ कि 'काली नदी' दोनों देशों के बीच की पश्चिमी सीमा होगी। दस्तावेज़ों में सब कुछ तय था, लेकिन ब्रिटिश काल के नक्शों में नदी के 'उद्गम स्थल' (Origin Point) को लेकर एक कूटनीतिक अस्पष्टता छोड़ दी गई। और यही विवाद की वजह बन गयी .
इस क्षेत्र का strategic महत्व 1962 के भारत–चीन युद्ध के बाद कई गुना बढ़ गया। भारत ने कालापानी सेक्टर में अपनी सुरक्षा उपस्थिति मजबूत की। वर्तमान में disputed क्षेत्र का वास्तविक सैन्य और प्रशासनिक नियंत्रण भारत के पास है। भारत के लिए सिर्फ एक जमीन का टुकड़ा नहीं है। यह कैलाश–मानसरोवर यात्रा, भारत-तिब्बत व्यापार और India–China–Nepal ट्राईजंक्शन के पास होने के कारण स्ट्रेटेजिकली बेहद महत्वपूर्ण है।
नेपाल में दावा किया जाता है कि भारतीय सुरक्षा उपस्थिति शुरुआत में temporary थी और बाद में स्थायी हो गई। भारत इससे सहमत नहीं है और अपने पुराने administrative records तथा continuous control का हवाला देता है। भारत का रुख पूरी तरह ऐतिहासिक साक्ष्यों और प्रशासनिक रिकॉर्ड्स पर आधारित है। काली नदी कालापानी के पास के जलस्रोतों से निकलती है, इसलिए लिपुलेख, कालापानी और लिंपियाधुरा हमेशा से भारत के उत्तराखंड का अभिन्न हिस्सा रहे हैं और वर्तमान में भी यहाँ पूरी तरह से भारत का सैन्य और प्रशासनिक नियंत्रण है। जबकि नेपाल कूटनीतिक ज़िद पर अड़ा है कि नदी का मुख्य स्रोत लिंपियाधुरा की पहाड़ियों से आता है। इसी आधार पर साल 2020 में नेपाल ने भारत के करीब 335 वर्ग किलोमीटर के क्षेत्र को अपने नए नक्शे में शामिल कर लिया।
भारत और नेपाल के बीच लगभग 1,751 किलोमीटर लंबा open border है। लाखों लोगों के रोजगार, व्यापार, विवाह और पारिवारिक संबंध सीमा के दोनों तरफ फैले हैं। नेपाली नागरिक भारतीय सेना में गोरखा सैनिकों के रूप में सेवा देते रहे हैं। जिसकी नींव 1950 की Peace and Friendship Treaty में रखी गई थी। लेकिन नेपाल के कई राजनीतिक दल इसे unequal treaty बताते हुए संशोधन की मांग करते हैं। भारत का कहना है कि इसी व्यवस्था ने दोनों देशों के नागरिकों को असाधारण सुविधाएं दी हैं। यानी विवाद केवल जमीन का नहीं—दोनों देशों के पूरे special relationship की परिभाषा का है।
तो सच क्या है? सच यह है कि नेपाल का यह दावा सिर्फ कागज़ी नक्शों और चुनावी रैलियों के बयानों तक सीमित है। ज़मीनी हकीकत में नेपाल भारत की एक इंच ज़मीन पर भी कब्ज़ा नहीं कर पाया है और न ही भारतीय सेना की मुस्तैदी के आगे ऐसा कभी संभव है। यह सिर्फ अखबारों की सुर्खियां बटोरने और नेपाल की आंतरिक राजनीतिक अस्थिरता से जनता का ध्यान भटकाने का एक जरिया है।
लेकिन नेपाल के नेतृत्व को यह समझना होगा कि नक्शे बदल देने से न तो भौगोलिक हकीकत बदलती है और न ही इतिहास। चीन के बहकावे में आकर सदियों पुराने और भरोसेमंद दोस्त भारत के साथ कूटनीतिक दुश्मनी मोल लेना, खुद नेपाल के भविष्य के लिए आत्मघाती साबित हो सकता है। भारत ने हमेशा मर्यादा रखी है, लेकिन राष्ट्रीय सुरक्षा और संप्रभुता के मामले में हिंदुस्तान कोई समझौता नहीं करेगा।
इस पूरे विवाद पर, पड़ोसी देशों के इस रवैये पर और बालेन शाह के इस बयान पर आपकी क्या निष्पक्ष राय है? क्या भारत को नेपाल के प्रति अपनी कूटनीति को और कड़ा करना चाहिए? नीचे कमेंट सेक्शन में अपनी राय ज़रूर दर्ज़ करें।

