भारत में अब न्याय अदालतों की फाइलों में नहीं, बल्कि सड़क पर पुलिस की बंदूकों से तय होने लगा है। जो सत्ता 'सुशासन' का दावा करती है, वह अब सीधे 'एनकाउंटर और बुलडोजर' मॉडल पर उतर आई है। भरत भूषण तिवारी का मामला इसी कल्चर का सबसे ताज़ा और खौफनाक उदाहरण है। बुलडोजर और एनकाउंटर का जो खेल यूपी से शुरू हुआ था, वह अब बिहार में अपनी जड़ें जमा चुका है। बिहार में पिछले 7 महीनों के भीतर ही पुलिस ने 22 एनकाउंटर (फुल और हाफ) किए हैं। और अब भारत भूषण तिवारी . भी उन्ही में से एक है ........
सत्ता और राजनीति का सबसे खौफनाक सच यह है कि 'सत्ता की बंदूक का कोई धर्म नहीं होता।' जो जनता 'हिंदुत्व' और 'धर्म खतरे में है' के नारों में अंधी हो चुकी है, उसे भरत भूषण तिवारी का एनकाउंटर एक भयानक चेतावनी दे रहा है। जो हिंदुत्व का चोला ओढ़कर खुद अपने ही लोगों का शिकार कर रहा है। भरत भूषण तिवारी कोई वामपंथी या सत्ता-विरोधी एजेंडे वाला व्यक्ति नहीं था। जो लोग उसे करीब से जानते थे और उसके सोशल मीडिया को फॉलो करते थे, वे जानते हैं कि वह मुखर रूप से 'हिंदुत्व' और सनातन धर्म की बात करता था। भारत तिवारी वही व्यक्ति था जिसने हिन्दू राष्ट्र के लिए बागेश्वर की पैदल यात्रा की थी .. भारत तिवारी वही था .. गरीबो के हक़ के लिए बेईमानों नेताओं से लड़ रहा था ....उसका गुस्सा तब फूटा जब उसने देखा कि जो नेता 'हिंदुत्व' के नाम पर वोट मांगकर सत्ता में बैठे हैं, वे संकट के समय उन्हीं हिंदुओं को मरने के लिए छोड़ देते हैं। ......
देश और राज्यों में वह सत्ता बैठी है जो खुद को 'हिंदुओं की रक्षक' बताती है। लेकिन जब एक हिंदू युवा उसी सिस्टम से सवाल करता है, तो क्या होता है? जो सिस्टम कल तक उसे अपना वोटर मानता था, सवाल पूछते ही उसने उसे 'पागल' और 'खतरा' घोषित कर दिया। और हिंदुत्व की रक्षा का दम भरने वाली सरकार की पुलिस ने एक निहत्थे 'हिंदू' युवा के सीने और जांघ में गोलियां उतार दीं।"
क्या हिंदुत्व सिर्फ वोट बैंक का टूल है? जब वोट लेना होता है, तो हर युवा 'हिंदू शेर' और 'धर्म रक्षक' होता है। लेकिन जब वही युवा रोजगार, बाढ़ में डूबते अपने घर या नेताओं के झूठे वादों पर सवाल उठाता है, तो उसे 'मानसिक विक्षिप्त' बताकर एसटीएफ से उसका एनकाउंटर क्यों करवा दिया जाता है? अब कहाँ हैं धर्म के ठेकेदार? अगर भरत तिवारी किसी दूसरे समुदाय का होता या किसी राजनीतिक विरोधी द्वारा मारा जाता, तो अब तक पूरे देश में बवाल मच चुका होता। लेकिन क्योंकि उसे 'अपने ही सिस्टम' की पुलिस ने मारा है, तो हिंदुत्व के तथाकथित बड़े ठेकेदार और नेता एकदम चुप हैं? तो क्या यह मान लिया जाए कि जो सरकारें हिंदुत्व का नारा देती हैं, उनके लिए आम हिंदू की जान की कीमत सिर्फ एक पुलिस एफआईआर जितनी रह गई है?
जनता ताली बजाती है जब किसी और का घर गिरता है या एनकाउंटर होता है। लेकिन भरत का मामला बताता है कि जब आप अन्याय के खिलाफ बोलेंगे, तो वह बुलडोजर और बंदूक आपकी जाति या आपका धर्म नहीं देखेगी। वह आपको भी कुचल देगी। भरत ने आखिरी समय में भगत सिंह का नाम क्यों लिया? क्योंकि वह समझ गया था कि यह सिस्टम अंग्रेजों से भी ज्यादा क्रूर है। यह 'धर्म' के नशे में जनता को सुलाकर, जागने वालों को सीधा मौत की नींद सुला देता है।....
यूपी में एनकाउंटर को जब राज्य की पॉलिसी बना दिया गया, तो वहां सवर्णों और खास तौर पर ब्राह्मणों को टारगेट करने के गंभीर आरोप लगे ..विवाद बढ़ने पर यूपी सरकार ने खुद आंकड़े जारी कर सफाई दी थी: सरकार के 3 साल के आधिकारिक डेटा के अनुसार 124 मारे गए लोगों की सूची में 11 ब्राह्मण थे। इसके अतिरिक्त ठाकुर, वैश्य और अन्य कैटेगरी के लोगों की संख्या भी इस लिस्ट में थी। आज की स्थिति में यूपी में पुलिस एनकाउंटर का आंकड़ा 10,000 के पार जा चुका है, जिसमें सैकड़ों लोग मारे जा चुके हैं। और यूपी वाला एनकाउंटर कल्चर बिहार तक पहुच चूका है ...
सजा तय करने का अधिकार न्यायपालिका का है। अगर सड़क पर पुलिस ही फैसला करने लगेगी और गोलियां चलाकर न्याय करेगी, तो देश में अदालतों और संविधान का क्या काम रह जाएगा ... भरत भूषण तिवारी के एनकाउंटर का यह मामला सिर्फ एक गांव का नहीं रह गया है, बल्कि यह पूरे बिहार पुलिस महकमे के गले की हड्डी बन चुका है। ....जिसका जवाब सरकार और पुलिस दोनों को देना पड़ेगा? भात सिर्फ भरत की नहीं है .. ऐसो दर्जनों केस है जहाँ पुलिस के फेक एनकाउंटर का बेगुन्हा लोग शिकार हुए ...
भारत तिवारी की कहानी भी कुछ ऐसी ही है ...भरत तिवारी की कहानी और पुलिस की थ्योरी और जमीनी सच्चाई के बीच इतने बड़े झोल हैं, जिन्हें देखकर कोई भी समझ जाएगा कि यह 'मुठभेड़' नहीं, बल्कि सत्ता के आदेश पर हुआ एक 'कोल्ड-ब्लडेड मर्डर' था। सबसे बड़ा सवाल घटना की टाइमिंग और पुलिस के एक्शन पर है। जिस भरत तिवारी को मंगलवार की रात पुलिस "मानसिक रूप से विक्षिप्त" बता रही थी, जिसे पकड़कर पागलखाने भेजने का दावा किया जा रहा था, उसी को पकड़ने के लिए अगले ही दिन बुलेटप्रूफ जैकेट पहने STF के कमांडो क्यों उतार दिए गए? क्याएक 'बीमार' व्यक्ति के लिए, जो बाढ़ पीड़ितों के लिए मिट्टी भराव की बात कर रहा है, आतंकियों वाला भारी-भरकम ऑपरेशन चलाया जाता है?.....
भरत तिवारी अपने आखिरी फेसबुक लाइव। में कैमरे के सामने, दिन के उजाले में साफ शब्दों में कहता है- "मेरी मांगें मान ली गई हैं, मैं हथियार डाल रहा हूँ।" जब एक व्यक्ति सबके सामने, दिनदहाड़े सरेंडर कर देता है और अपने हथियार फेंक देता है... तो फिर एक निहत्थे आदमी ने पुलिस पर गोली कैसे चला दी? पुलिस का वही पुराना और घिसा-पिटा डायलॉग सामने आता है— "अपराधी ने भागने की कोशिश की... पुलिस पर हमला किया... और आत्मरक्षा में हमें गोली चलानी पड़ी।" ये स्क्रिप्ट अब इतनी पुरानी और झूठी हो चुकी है कि इस पर भरोसा करना खुद के जमीर को धोखा देने जैसा है। जो आदमी सरेंडर कर रहा था, वो अचानक निहत्था होकर हथियारों से लैस STF के लिए खतरा कैसे बन गया?
अगर भोजपुर पुलिस और STF की कार्रवाई 100% सही थी, अगर उन्होंने सिर्फ 'नियमों के तहत' और अपनी 'आत्मरक्षा' में गोली चलाई थी... तो एनकाउंटर के कुछ ही घंटों बाद भोजपुर एसपी ने शाहपुर के एसएचओ (SHO) सहित 4 पुलिसवालों को रातों-रात सस्पेंड क्यों कर दिया? जवाब बहुत साफ है। एनकाउंटर के बाद जब आरा-बक्सर नेशनल हाईवे पर हजारों की भीड़ उतरी, सड़क जाम हुआ और जनता का गुस्सा उबला, एक तरफ भारत तिवारी की लाश थी और दूसरी तरफ .. उसके लिए जस्तिश मांग रहे लोगो पर लाठियां चल रही थी .. उनके असलहे ताने जा रहे थे .... लेकिन फिर भी लोग सडको पर डटे रहे तब सिस्टम की सांसें अटकी और । अपनी और बड़े अधिकारियों की गर्दन बचाने के लिए तुरंत इन छोटे पुलिसकर्मियों की बलि चढ़ा दी गई। असली मुठभेड़ करने वालों को तो मेडल और प्रमोशन मिलते हैं, यहाँ सस्पेंशन देकर पुलिस आलाकमान ने खुद साबित कर दिया कि दिनदहाड़े एक निहत्थे को मारा गया है और अब लीपापोती की जा रही है।
यह सिर्फ एक भरत तिवारी की मौत का मामला नहीं है। यह सीधे तौर पर देश के संविधान की हत्या है। देश में अदालतों की एक पूरी व्यवस्था है, न्याय की एक तय प्रक्रिया है। लेकिन जब सड़क पर खड़ी पुलिस खुद ही जज, जूरी और जल्लाद बन जाए, तो फिर संविधान का क्या काम रह जाता है? अगर एक नागरिक की जान की कीमत सिर्फ एक थानेदार या ऊपर बैठे किसी राजनेता के मूड पर निर्भर करने लगे, तो देश की तमाम अदालतों पर ताले जड़ देने चाहिए।
आज भरत तिवारी है, कल ये आग आपके घर तक भी पहुंचेगी। जो लोग आज धर्म और जाति के नशे में अंधी तालियां पीट रहे हैं, उन्हें समझना होगा कि जब आप अन्याय के खिलाफ बोलेंगे, तो सत्ता का यह बुलडोजर और पुलिस की यह बंदूक आपकी जाति या आपका 'हिंदुत्व' नहीं देखेगी। यह वक्त है सवाल पूछने का। अगर आज 'सुशासन' के इस खूनी खेल पर सवाल नहीं उठाया गया, तो याद रखिए... कल आपके साथ भी यही होगा, और अगली सुबह अखबार के किसी पन्ने पर आपकी भी सिर्फ एक एफआईआर (FIR) लिखी जाएगी, जिसमें आपको एक "खूंखार अपराधी" बता दिया जाएगा। .......
भारत के संविधान और कानूनी किताबों में "एनकाउंटर" (Encounter) जैसा कोई शब्द ही नहीं है। कानूनी भाषा में इसे 'एक्स्ट्रा-ज्यूडिशियल किलिंग' (Extra-Judicial Killing) यानी गैर-न्यायिक हत्या कहा जाता है। पुलिस के पास किसी भी व्यक्ति को सड़क पर सजा देने का कोई अधिकार नहीं है—यह काम केवल न्यायपालिका का है। भारतीय कानून पुलिस को केवल एक स्थिति में गोली चलाने की इजाजत देता है: 'आत्मरक्षा का अधिकार' (Right to Private Defense)। अगर पुलिस की जान पर बन आए और बचने का कोई दूसरा रास्ता न हो, केवल तभी वे जवाबी फायरिंग कर सकते हैं। सुप्रीम कोर्ट ने फर्जी एनकाउंटर्स (Fake Encounters) को रोकने और पुलिस की जवाबदेही तय करने के लिए (2014)' में 'PUCL बनाम महाराष्ट्र राज्य मामले में 16 Guidelines) जारी किए थे। जिसमे एनकाउंटर में अगर किसी की मौत होती है, तो उस घटना की तुरंत FIR दर्ज होनी चाहिए और गोली चलाने वाली पुलिस टीम के खिलाफ आपराधिक जांच शुरू होनी चाहिए।
एनकाउंटर की जांच उसी थाने की पुलिस नहीं कर सकती जिसने एनकाउंटर किया हो। इसकी जांच CID, स्टेट पुलिस की कोई स्वतंत्र टीम या किसी दूसरे जिले के सीनियर पुलिस अधिकारी (जो उस एनकाउंटर टीम से कम से कम एक रैंक ऊपर हो) से कराई जानी चाहिए। हर पुलिस एनकाउंटर में हुई मौत की एक न्यायिक मजिस्ट्रेट (Judicial Magistrate) से जांच करानी अनिवार्य है (CrPC 176 / नई BNS संहिता के तहत)। पुलिस की इंटरनल जांच काफी नहीं है।
घटना की सूचना बिना किसी देरी के राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) या राज्य मानवाधिकार आयोग को दी जानी चाहिए। :एनकाउंटर करने वाली टीम को तुरंत अपने हथियार फोरेंसिक और बैलिस्टिक जांच (Forensic & Ballistic test) के लिए जमा करने होते हैं, ताकि यह साबित हो सके कि किसने कितनी गोलियां चलाईं। जब तक जांच में यह पूरी तरह साबित न हो जाए कि एनकाउंटर एकदम असली था और नियमों के तहत किया गया था, तब तक एनकाउंटर करने वाले पुलिसकर्मियों को कोई 'आउट ऑफ टर्न' प्रमोशन या गैलेंट्री अवार्ड नहीं दिया जा सकता।
अगर मजिस्ट्रियल या स्वतंत्र जांच में यह साबित हो जाता है कि पुलिस ने 'आत्मरक्षा' का झूठा दावा किया था (यानी अपराधी ने सरेंडर कर दिया था या वह निहत्था था) और पुलिस ने जानबूझकर हत्या की है, तो शामिल पुलिसकर्मियों पर बेहद सख्त कार्रवाई होती है: यानि हत्या का मुकदमा (Cold-Blooded Murder): पुलिसकर्मियों के खिलाफ 'आत्मरक्षा' का कानूनी बचाव खत्म हो जाता है। उन पर भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 103 (पहले IPC की धारा 302) के तहत हत्या (Murder) का सीधा मुकदमा चलता है। हत्या का जुर्म साबित होने पर पुलिसकर्मियों को भी अदालतों से वही सजा मिलती है जो किसी खूंखार अपराधी को मिलती है—यानी फांसी या आजीवन कारावास।
इसे ऐसे समझिये की .वर्ष 1991 में यूपी पुलिस ने तीर्थयात्रा से लौट रहे 11 सिख श्रद्धालुओं को बस से उतारकर तीन अलग-अलग जगहों पर ले जाकर गोलियों से भून दिया था और मीडिया में इसे आतंकवादियों के खिलाफ 'सफल मुठभेड़' बताया था। 25 साल लंबी कानूनी लड़ाई के बाद, अप्रैल 2016 में एक स्पेशल CBI अदालत ने इस जघन्य हत्याकांड के लिए यूपी पुलिस के 47 पुलिसकर्मियों को उम्रकैद की सजा सुनाई।
कुछ ऐसे ही वर्ष 1996 गाजियाबाद के भोजपुर इलाके में पुलिस ने 4 निर्दोष मजदूरों (जसबीर, जलालुद्दीन, अशोक और प्रवेश) को गोली मार दी और दावा किया कि उन्होंने पुलिस पार्टी पर फायरिंग की थी। CBI जांच में सामने आया कि मारे गए चारों लोग पूरी तरह निर्दोष थे। साल 2017 में CBI कोर्ट ने तत्कालीन स्टेशन ऑफिसर (SO) सहित 4 पुलिसकर्मियों को हत्या और सबूत मिटाने के लिए आजीवन कारावास की सजा दी। ....
संविधान का (Article 21) यही कहता है कि किसी भी व्यक्ति का जीवन बिना 'कानून की उचित प्रक्रिया' (Due Process of Law) के नहीं छीना जा सकता। जब पुलिस खुद जज और जल्लाद बन जाती है, तो वह सीधे तौर पर संवैधानिक अधिकारों की हत्या करती है। और खुद को कानून से ऊपर कैसे समझने लगती है भारत के संविधान में न्याय की जो प्रक्रिया तय की गई है, वह भले ही लंबी हो, लेकिन जब वह स्वतंत्र रूप से काम करती है तो बड़े-बड़े 'एनकाउंटर स्पेशलिस्ट' भी जेल की सलाखों के पीछे नजर आते हैं। जब अदालतों में पुलिस की 'आत्मरक्षा' (Self-defense) वाली थ्योरी झूठी साबित होती है, तो एनकाउंटर को 'कोल्ड-ब्लडेड मर्डर' (Cold-blooded murder) ही माना जाता है।
अगर भारत तिवारी के मामले में ये फर्जी एनकाउंटर साबित हुआ .. तो क्या उन पुलिस वालो का भी ऐसे ही एनकाउंटर होगा .. क्या उन्ही भी फंसी की सजा मिलेगी ..विपक्ष इसे सीधा मुद्दा बना रहा है कि सुशासन के नाम पर पुलिस निरंकुश हो चुकी है और एक ऐसे युवक को मार दिया गया जो बाढ़ प्रभावित गांवों में मिट्टी भराव और नेताओं के झूठे वादों के खिलाफ आवाज उठा रहा था। भरत के आखिरी फेसबुक लाइव में वह स्पष्ट कह रहा है कि उसकी मांगें मान ली गई हैं और वह हथियार फेंककर सरेंडर कर रहा है। हालकी उसके बाद करीब से 4 गोलियां मारी गईं। और उसकी मौत हो गयी
पुलिस की कहानी में कोई लॉजिक क्यों नहीं?: क्योकि हर एनकाउंटर की स्क्रिप्ट एक जैसी क्यों होती है? "अपराधी ने हथियार छीन लिया", "आत्मरक्षा में गोली चलानी पड़ी"। जो आदमी लाइव आकर सरेंडर कर रहा है, जिसे पुलिस खुद मेंटल बता रही है, उसे जिंदा पकड़ने के बजाय सीधे खत्म क्यों कर दिया गया? क्या सरकार उन युवाओं से डरने लगी है जो सरेआम नेताओं के 'झूठे वादों' पर सवाल उठाते हैं? क्या उन्हें 'मानसिक विक्षिप्त' घोषित कर रास्ते से हटा देना इस नए 'एनकाउंटर कल्चर' का असली चेहरा है?
भरत भूषण तिवारी का एनकाउंटर सिर्फ एक युवा की हत्या नहीं है; यह उस 'संविधान' की हत्या है, जो हर नागरिक को न्याय का अधिकार देता है। जो सत्ता खुद को 'धर्म' का ठेकेदार बताती है, उसने साबित कर दिया है कि 'सत्ता की बंदूक का कोई धर्म नहीं होता'। उसका एक ही लक्ष्य है— जो भी सवाल पूछे, उसे कुचल दो। भरत ने आखिरी समय में भगत सिंह का नाम यूँ ही नहीं लिया था। वह समझ गया था कि जो सिस्टम अपने ही युवाओं को—जो बाढ़ पीड़ितों के हक़ और मिट्टी भराव के लिए लड़ रहे हों—'पागल' करार देकर एसटीएफ (STF) की गोलियों से भून सकता है, वह किसी विदेशी हुकूमत से भी ज्यादा क्रूर हो चुका है।
अंत में बस इतना ही...आज अगर आप किसी और के घर पर चलते बुलडोजर और एनकाउंटर पर 'धर्म और जाति' के नशे में अंधी तालियां पीट रहे हैं, तो इस भ्रम से बाहर आ जाइये। सत्ता का यह 'राक्षस' एक दिन आपके दरवाजे पर भी दस्तक देगा। जिस दिन आपने नेताओं के झूठे वादों, रोजगार या अपने हक़ के लिए सवाल पूछा, उस दिन यह सिस्टम आपकी जाति या आपका हिंदुत्व नहीं देखेगा।
वह सीधे आपको 'मानसिक विक्षिप्त' या 'खतरा' घोषित करेगा, और अगली सुबह अखबार के किसी पन्ने पर आपकी भी मौत की खबर सिर्फ एक "सफल पुलिस मुठभेड़" के रूप में छपेगी।
भरत तिवारी की शांत हो चुकी आवाज़ और उसके शरीर में उतरीं 4 गोलियां आज पूरे देश और सिस्टम से चीखकर सिर्फ एक ही सवाल पूछ रही हैं— "क्या अब भी आप खामोश रहेंगे, या न्याय और संविधान को बचाने के लिए आवाज़ उठाएंगे?"

