हिंदुस्तान के इतिहास में पहली बार...किसी मुख्यमंत्री ने वो कर दिखाया जिसे छूने की हिम्मत दिल्ली के गलियारों में भी नहीं होती है । 10 मार्च 2026 को असम कैबिनेट ने एक ऐसे फैसले पर मुहर लगाई… जिसने गुवाहाटी से लेकर दिल्ली तक सियासी तापमान बढ़ा दिया। लेकिन ऐसा पहली बार नहीं है जब सीएम शर्मा ने ऐसा कोई आदेश दिया हो। इसके पहले भी हिमंता सरकार ‘Shoot-at-sight’, Eviction Drives, और Polygamy एक्ट जैसे ऐसे कड़े फैसले ले चुकी है जिसने 'लिबरल गैंग' की नींद उड़ा दी थी। लेकिन इस बार. हिमंता सरकार ने बरपेटा मेडिकल कॉलेज से उस 'फखरुद्दीन अली अहमद' का नाम हटा दिया है, जो देश के 5वें राष्ट्रपति और इंदिरा गाँधी के बेहद ख़ास थे ? लेकिन सवाल सिर्फ एक नाम का नहीं है…सवाल उस राजनीति का है, जिसने दशकों तक तुष्टिकरण को ही सत्ता का रास्ता बना लिया। ऐसे में चलिए समझते है की की कौन थे .'फखरुद्दीन अली अहमद और क्यों? हिमंता सरकार को देश के एक पूर्व राष्ट्रपति का नाम हटाना पडा ...
असम सरकार ने जिस फखरुद्दीन अली अहमद का नाम बारपेटा मेडिकल कालेज से हटाया है , उनकी कहानी शुरू होती है 25 जून 1975 से जब भारत के लोकतंत्र पर 'इमरजेंसी' की कालिख पोती गई.जिसमे ..25 जून की आधी रात को, तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की सिफारिश पर राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद ने आपातकाल के घोषणापत्र पर हस्ताक्षर कर । बिना कैबिनेट की सलाह, बिना किसी चर्चा के.. भारत के लोकतंत्र पर इमरजेंसी की कालिख पोत दी गई। इतिहास फखरुद्दीन अली अहमद को एक 'रबर स्टैंप' राष्ट्रपति के तौर पर याद करता है। एक ऐसा राष्ट्रपति जिसने संविधान की रक्षा करने के बजाय, एक परिवार की सत्ता को बचाने के लिए घुटने टेक दिए। जयप्रकाश नारायण, अटल बिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी... जैसे दिग्गजों को सलाखों के पीछे डालने का रास्ता इसी नाम ने साफ किया था। लेकिन आज, 50 साल बाद... असम की मिट्टी से उस नाम को मिटाया जा रहा है। जिसने देश को आपत्काल की आग में झोका था
भले ही हेमन्नाता सरकार ने नाम फखरुद्दीन अली अहमद का हाताया गया है लेकिन असली मिर्ची तो उन नेताओं को लगी है जो असम में 'वोट बैंक' की राजनीती करते हैं। आज असम से लेकर बंगाल और बिहार से लेकर यूपी तक... हर कोई तुष्टीकरण की रोटियां सेक रहा है। कुछ तो अंतरराष्ट्रीय घटनाओं पर बयान देकर भी अल्पसंख्यक राजनीति चमकाने में लगे हैं। लेकिन हिमंता बिस्वा सरमा ने असाम से उस नाम को ह हटा दिया जिसने देश को इमरजेंसी जैसे डांस दिया था ....
आज भारत की राजनीति में अगर मोदी योगी के बाद किसी नेता के 'तेवर' और 'फैसलों' की गूंज सबसे ज्यादा सुनाई देती है, तो वो नाम है—हिमंता बिस्वा सरमा! दिल्ली के गलियारों में चर्चा आम है कि बीजेपी के पास अब एक ऐसा 'फायरब्रांड' चेहरा है, जो न झुकता है, न रुकता है और न ही 'पॉलिटिकल करेक्टनेस' की परवाह करता है। बरपेटा मेडिकल कॉलेज से फखरुद्दीन अली अहमद का नाम हटाना तो बस एक ताज़ा उदाहरण है... हिमंता के ऐसे फैसलों की लिस्ट बहुत लंबी है!
सवाल बड़ा है... क्या असम की ये 'नाम बदलने' वाली राजनीति सिर्फ एक प्रतीक है? या फिर उस राजनीतिक विरासत को चुनौती, जो दशकों से दिल्ली से असम तक फैली रही? और सबसे बड़ा सवाल —क्या Assam में शुरू हुई यह सियासी लड़ाई… अब पूरे देश की राजनीति को नई दिशा देने वाली है क्या आपको लगता है कि इमरजेंसी के गुनहगारों के नाम हमारे गौरवशाली संस्थानों से हटने चाहिए? क्या देश के अन्य राज्यों को भी इसी 'हिमंता मॉडल' की जरूरत है? अपनी राय कमेंट में 'बेबाकी' से लिखें! और अगर आप भी मानते हैं कि ये फैसला 'असमिया अस्मिता' की जीत है, तो इस वीडियो को हर सनातनी और देशभक्त तक पहुँचा दें!

