बिहार की सियासत में जिस नितीश कुमार ने 20 साल तक राज किया ..आज बिहार में उसी 'नीतीश युग' का सूर्यास्त हो चुका है!...इसलिए नहीं की नितीश राजनीती छोड़ रहे बल्कि इसलिए.. क्योकि बीजेपी ऐसा चाहती है .5 मार्च 2026 की दोपहर, जब पूरा देश होली की खुमारी में था, नीतीश ने राज्यसभा जाने का एलान कर सबको चौंका दिया। 20 साल तक बिहार पर राज करने वाला 'सुल्तान' 10वीं बार सीएम की शपथ लेने के महज 100 दिन बाद... बिहार कुर्सी क्यों छोड़ रहा है ? क्या ये नीतीश का सरेंडर है, या अमित शाह की वो 'फाइनल स्ट्राइक' जिसने जेडीयू के वजूद पर ही सवाल खड़े कर दिए हैं?" चलिए, इस सियासी बिसात की एक-एक चाल को डिकोड करते हैं।
बिहार की सियासत में 1970 के दशक में जयप्रकाश नारायण के आंदोलन से निकला एक 'इंजीनियर', जो लोहिया के समाजवाद का झंडा लेकर चला था। उसने लालू यादव के 'जंगलराज' को चुनौती दी..और 2005 में पहली बार बिहार के सीएम बने .वो दौर ऐसा था कि बिना नीतीश के दिल्ली की गद्दी भी नहीं हिलती थी। अटल बिहारी वाजपेयी के सबसे भरोसेमंद मंत्रियों में से एक, नीतीश कुमार ने रेल मंत्रालय से लेकर कृषि मंत्रालय तक अपनी छाप छोड़ी। ..लेकिन वक्त के साथ नीतीश की पहचान 'सुशासन' से हटकर राजनीती में 'सर्वाइवल' की हो गई। 2013 में मोदी के नाम पर गठबंधन तोड़ा, 2015 में लालू के साथ गए, 2017 में फिर भाजपा, 2022 में फिर आरजेडी और 2024 के चुनाव से ठीक पहले फिर भाजपा। नीतीश ने हर बार पाला बदला ताकि 'कुर्सी' बची रहे। लेकिन इस बार... शतरंज की बिसात बिछाने वाले 'इंजीनियर' खुद अपनी ही चालों में फंस गए।"
दैनिक भास्कर रिपोर्ट के मुताबिक - 20 नवंबर 2025 को जब नीतीश शपथ ले रहे थे, तब गृह मंत्री अमित शाह इसके पक्ष में नहीं थे। बीजेपी ने ऑफर दिया था—'नीतीश जी, आप रिटायर हो जाइए, अपना कोई वारिस चुन लीजिए, हम उसे सीएम मान लेंगे।' लेकिन नीतीश नहीं माने। जेडीयू ने कहा—जनादेश नीतीश के नाम पर है। लेकिन बीजेपी नेतृत्व का रुख साफ था—'अब हम कोई दूसरा नीतीश कुमार पैदा नहीं करना चाहते।' जरा सोचिए, साल 2000 में बीजेपी के पास 67 सीटें थीं और नीतीश की पार्टी के पास सिर्फ 34। फिर भी अटल जी ने नीतीश को नेता माना और बीजेपी उनकी 'पिछलग्गू' बनी रही। लेकिन 2026 की बीजेपी अलग है। 89 सीटों वाली बीजेपी अब किसी की पिछलग्गू नहीं बनेगी।
राजनीति में एक कहावत है—"बीजेपी के साथ दोस्ती, दुश्मनी से ज्यादा खतरनाक है।" इतिहास गवाह है कि जिसने भी बीजेपी के साथ गठबंधन किया .. वो या तो खुद राजनीती से खतम हो गया , या बीजेपी ने उसका राजनितिक वजूद खतम कर दिया ...आज बात सिर्फ नीतीश की नहीं है। आज बात उस पैटर्न की है जिसे 'BJP मॉडल' कहा जाता है। एक ऐसा मॉडल जो अपने दोस्तों को तब तक गले लगाता है, जब तक उनका दम न घुट जाए। शिवसेना, अकाली दल और अब JDU उसी माडल का शायद शिकार हो चुके है !
और ऐसा इसलिए क्योकि बिहार में भाजपा अब जूनियर पार्टनर नहीं रही। 101 में से 89 सीटें जीतकर भाजपा नंबर-1 है ।भाजपा अब नीतीश की मोहताज नहीं है। चिराग पासवान क 19, जीतन राम मांझी के 5 और उपेंद्र कुशवाहा के 4 विधायक जोड़ दें तो आंकड़ा 117 पहुँचता है। बहुमत से सिर्फ 5 कदम दूर! और 5 विधायक तोड़ना बीजेपी के लिए 'बाएं हाथ का खेल' है। यानि भाजपा बिना नीतीश के भी सरकार बना सकती है। और यही वो डर है जिसने नीतीश की कलम से इस्तीफे पर साइन करवा लिए।
बीजेपी अब तक गठबंधन के सहारे 3 राज्यों ( महाराष्ट्र, असम, त्रिपुरा) पर पूरी तरह कब्जा कर चुकी है। 2-3 राज्यों में ऐसी ही कोशिशें जारी हैं। हालांकि, 3 राज्यों में यह 'पैटर्न' फेल भी हुआ है, लेकिन बिहार का ये 'ऑपरेशन' सफल होता दिख रहा है।" बीजेपी का एक तय पैटर्न है—पहले क्षेत्रीय दल के कंधे पर बैठकर सत्ता की दहलीज तक पहुंचना, फिर धीरे-धीरे उसी दोस्त का कैडर और वोट बेस निगल लेना। और अंत में? दोस्त गायब,भी गायब हो जाता है
इतिहास गवाह है की 1989 में बीजेपी और शिवसेना गठबंधन शुरू हुआ, तो बीजेपी ' शिवसेना की दोस्ती पक्की थी लेकिन । 2014 में बीजेपी ने अकेले लड़कर शिवसेना को बौना साबित कर दिया। 2022? एकनाथ शिंदे के जरिए शिवसेना को दो फाड़ कर दिया .. 2024 में अजीत पवार के जरिए NCP को तोड़कर अपने साथ मिला लिया —आज महाराष्ट्र में बीजेपी 'सुप्रीम' है और उसके पुराने सहयोगी सिर्फ उसकी परछाईं बनकर रह गए हैं।
कुछ ऐसी ही कहानी ओडिशा की है जहाँ 2000 में बीजेपी नवीन पटनायक के साथ अपना सफर शुरू किया । 2009 में रास्ते अलग हुए, लेकिन बीजेपी ने हार नहीं मानी। 2024 आते-आते बीजेपी ने नवीन बाबू के अभेद्य किले को ढहा दिया। 24 साल तक राज करने वाले पटनायक को अपनी ही पारंपरिक सीट पर बीजेपी के हाथों हार का स्वाद चखना पड़ा।
बीजेपी ने जो उदिशा , महराष्ट्र में किया .. वही खेल अब बिहार में कर चुकी है .. और इस बार शिकार उनके दसको पुराने साथी नितीश कुमार है ....नीतीश को भी ये पता है कि अगर उन्होंने जिद की, तो भाजपा उन्हें बिना पूछे सरकार बना लेगी और वह कहीं के नहीं रहेंगे।अक्सर नीतीश की ताकत विपक्ष (RJD) की मजबूती में होती थी। लेकिन इस बार तेजस्वी यादव भी 25 सीटों पर सिमट गए। अगर नीतीश आज भाजपा छोड़ते हैं, तो उन्हें सरकार बचाने के लिए RJD, कांग्रेस, लेफ्ट और ओवैसी—सबके दरवाजे खटखटाने होंगे होंगे " जो शायद अब नितीश के बस की बात नहीं है - नीतीश की बढ़ती उम्र और कमजोर पड़ते तेजस्वी ने भाजपा को अजेय बना दिया है। अगर आज तेजस्वी के पास 35-40 सीटें होतीं, तो शायद नीतीश आज भाजपा को आंख दिखा रहे होते।
नीतीश को लगता था कि दिल्ली की गद्दी उनके 12 सांसदों के भरोसे टिकी है। उनके 12 सांसद मोदी सरकार की लाइफलाइन हैं। लेकिन गणित बदल चुका है।मोदी सरकार के पास 292 सीटें हैं। अगर JDU के 12 सांसद हट भी जाएं, तो भी NDA के पास 280 सीटें बचती हैं—बहुमत से 8 ज्यादा! यानी केंद्र में भी नीतीश के पास 'ब्लैकमेल' करने की ताकत खत्म हो चुकी है। मोदी सरकार उनके बिना भी सुरक्षित है।
नीतीश कुमार अब 75 के हो चुके हैं। 2030 के चुनाव तक वह 80 के होंगे। भाजपा अब और इंतजार नहीं कर सकती। उन्हें एक ऐसा चेहरा चाहिए जो अगले 20 साल तक बिहार पर राज करे। नीतीश कुमार का स्वास्थ्य और उम्र भाजपा के लिए 'दबाव' का सबसे बड़ा हथियार बन गई है। भाजपा ने साफ कर दिया है—"नीतीश बाबू, अब आराम कीजिए, बिहार हम संभालेंगे। भले ही नीतीश कुमार ने बिहार को सुशासन दिया, सड़कें दीं, बिजली दी। लेकिन राजनीति में 'एक्सपायरी डेट' सबकी आती है। भाजपा ने नीतीश को कमजोर नहीं किया, बल्कि खुद को इतना ताकतवर बना लिया कि नीतीश की जरूरत ही खत्म हो गई।
सवाल अब इससे भी गंभीर है कि क्या नीतीश कुमार का इस्तीफा बिहार में 'क्षेत्रीय दलों' की राजनीति के खात्मे की शुरुआत है? क्या भाजपा अब बिहार में वही करेगी जो उसने महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश में किया? वक्त बदल चुका है, और शायद बिहार का 'चाणक्य' अपनी आखिरी चाल चल चुका है।"वैसे, इस बात से आप कितने सहमत हैं? हमें कमेंट बॉक्स में लिखकर जरूर बताएं। और हां, हमें हमारी इस स्टोरी के लिए फीडबैक भी दीजिए... क्योंकि आपकी राय ही हमें और बेहतर करने की ताकत देती है। जय हिंद।

