मायावती के जिस फैसले का इन्तजार पूरा देश कर रहा था ... उस फैसले पर मायावती ने अपनी अंतिम मोहर लगा दी है ..लेकिन क्या यह सिर्फ 2027 की एक चुनावी बिसात है? या फिर लखनऊ के उस गेस्ट हाउस कांड वो अधूरा हिसाब, जिसे मायावती पिछले 34 सालों से अपने सीने में दबाकर बैठी हैं.जिसकी गूंज आज भी सत्ता के गलियारों में महसूस की जाती है.. तो आखिर क्या है मायावती का वह फैसला…जिसने Rahul Gandhi और Akhilesh Yadav की सियासी नींद उड़ा दी है? क्या यह उनके राजनीतिक करियर में ठोकी गई वह आख़िरी कील है…जिसने मुख्यमंत्री Yogi Adityanath के लिए 2027 का सिंहासन अभी से सुरक्षित कर दिया है? चलिए इस दो मिनिट की रिपोर्ट में समझते है ....
जब भी चुनाव नजदीक आते हैं, हर राजनीतिक दल को 'दलित हित' की याद आने लगती है। कोई संविधान की प्रति लहराता है, तो कोई 15% बनाम 85% का गणित समझाकर समाज को जातियों के खानों में बांटने की बिसात बिछाता है। लेकिन मायावती के फासिले ने इस पर पानी फेर दिया है .. मायावती ने 2027 के विधान सभा इलेक्शन में यूपी की सभी 403 सीटों पर अकेले चुनाव लड़ने का ऐलान कर दिया है। मायावती राहुल गाँधी पर भी सस्वाल उठए है ..की जो आजकल संविधान की कॉपी और कांशीराम जी की फोटो लेकर घूम रहे हैं, क्या वो ये भूल गए कि जब कांशीराम जी का निधन हुआ, तब केंद्र में कांग्रेस की सरकार थी? लेकिन एक दिन का 'राजकीय शोक' तक घोषित नहीं किया आज वही राहुल दलितों के सबसे बड़े मसीहा बनते फिर रहे है ...
दशकों तक सत्ता में रहने वाली पार्टियों को तब दलितों के अधिकार और हक़ क्यों नहीं याद आये ? आज जाति जनगणना का कार्ड खेलकर आप जिसे अपना 'वोट बैंक' समझ रहे हैं, वो समाज अब आपकी इस सियासी बाजीगरी को पहचान चुका है। ........... दरसल ये लडाई चुनव से पहले उस नारेतीव की है जिसके जरिये दलितों वोटो को अपने पाले में ले जा सके .. क्योकी - यूपी में 21% दलित वोटर हैं। प्रदेश की 403 विधानसभा सीटों में 84 एससी के लिए रिजर्व हैं। इसके अलावा 40-50 ऐसी सीटें हैं, जहां दलित 20% से 30% वोटर हैं। मतलब, प्रदेश की 130 सीटों पर दलित निर्णायक असर रखते हैं। ये वजह की दलितों को रीझने के लिए सपा कांग्रेस ,बीजेपी नए नए तरीके अपनाए जा रहे है हालकी 2022 के विधानसभा चुनाव में भाजपा और उसके सहयोगी दलों ने 84 रिजर्व सीटों में 63 जीत ली थीं। वहीं, सपा को 20 सीटों पर सफलता मिली थी। 1 सीट राजा भैया की पार्टी जनसत्ता दल लोकतांत्रिक के खाते में गई थी।
मायावती के अकेले चुनाव लड़ने के फैसले ने विपक्षी गठबंधन के ताबूत में आखिरी कील साबित हो सकता है। यूपी की राजनीति का सीधा गणित है, जब-जब दलित वोट बंटता है, बीजेपी की राह उतनी ही आसान हो जाती है। अखिलेश यादव जिस 'PDA' के सहारे 2027 का सपना देख रहे थे, मायावती ने उस सपने के बीच में 'हाथी' खड़ा कर दिया है। अब दलित वोट बैंक सपा-कांग्रेस गठबंधन में जाने के बजाय, मायावती के पाले में सिमटेगा। और विपक्ष के इसी बिखराव में छिपी है योगी आदित्यनाथ की 2027 की प्रचंड जीत।"
आपको याद होगा जब 2022 में जब मायावती कमजोर पड़ी थीं, तो आरक्षित सीटों पर बीजेपी ने क्लीन स्वीप किया था। 84 में से 63 सीटें! योगी जानते हैं कि अगर मायावती मजबूती से मैदान में रहती हैं, तो वो बीजेपी का वोट नहीं, बल्कि अखिलेश यादव के 'संभावित' वोट बैंक को काटेंगी। यानी मायावती का यह 'अधूरा हिसाब' राहुल और अखिलेश को तो डुबोएगा ही, लेकिन साथ ही ये योगी आदित्यनाथ के लिए वो रेड कारपेट बिछा देगा, जिस पर चलकर वो 2027 में दोबारा लखनऊ की गद्दी संभालेंगे। क्या ये मायावती और बीजेपी के बीच का कोई 'साइलेंट एग्रीमेंट' है? या फिर विपक्षी एकता को खत्म करने का बहनजी का अपना मास्टरप्लान?"
राहुल संविधान दिखाते रह गए, अखिलेश संगठन बनाते रह गए, और यहाँ मायावती ने एक ही चाल में योगी आदित्यनाथ का सिंहासन 2027 के लिए अभी से 'सुरक्षित' कर दिया है। ये है यूपी की राजनीति का वो 'इकोसिस्टम', जिसे समझना बड़े-बड़े दिग्गजों के बस की बात नहीं।" वैसे आपको क्या लगता है

