भारत में अंग्रेजों ने कई सौ साल इसलिए राज किया क्योकि उनका उद्देश्य था फूट डालो-राज करो’ इसी नीति ने 19 जुलाई 1905 में राजनीतिक फायदे के लिए अंग्रेजों ने बंगाल को बांट दिया. इतिहास में इसे बंगभंग के नाम से भी जाना जाता है लेकिन तब लोगों के बढ़ते आक्रोश और विद्रोह ने एक बार फिर 1911 में बंगाल को एक कर दिया.
बंगाल ने अपनें आपको को टूटते देखा. कभी यहां के रणबांकुरों को आजादी और स्वाभिमान के लिए लड़ते देखा. बंगाल ने दस हिंदू वंशों का शासन देखा तो कभी मुगलों के राज का गवाह भी बना है .
हालाँकि 1905 बंगाल बिभाजन की आग 1947 में देश की आजादी और विभाजन के साथख़त्म हुई . पर क्या आप जानते हैं कि पश्चिम बंगाल भारत के पूर्वी भाग में होते हुए भी पश्चिम बंगाल क्यों कहलाता है.
बंगाल का इतिहास 4 हजार साल से भी ज्यादा पुराना है पहले की सभ्यता के कई अवशेष हैं, जिसे द्रविड़ियन, तिब्बती-बर्मन और ऑस्ट्रो-एशियाई लोगों ने बसाया था. लेकिन सिकंदर ने जब बंगाल में आक्रमण किया तब बंगाल में गंगारिदयी साम्राज्य था. इसके बाद यहां पाल वंश ने विशाल साम्राज्य खड़ा किया और 400 साल तक राज किया.
पाल राजाओं के बाद बंगाल पर सेन राजवंश का अधिकार हुआ लेकिन इन्हे दिल्ली के मुस्लिम शासकों ने हराया और 16 वीं शताब्दी में बंगल मुगल शासन की शुरुआत हुई. मुगलों के बाद सन् 1757 अंग्रेजों ने पहली बार बंगाल और भारत में अपने पांव जमाए थे. और यही के हो गए।
लेकिन 1947 में जब भारत आजाद हुआ तो बंगाल का विभाजन धार्मिक आधारपर हुआ। और पश्चिमी भाग भारत में और पूर्वी भाग पाकिस्तान में शामिल हो गया जो बाद में पूर्वी पाकिस्तान कहलाया. लेकिन 1971 में एक पकिस्तान और बिभाजन हुआ स्वतंत्र बांग्लादेश देश का जन्म हुआ
इस बीच देश आजाद होने के बाद देशी रियासतों के विलय का काम शुरू किया गया. राज्य पुनर्गठन अधिनियम, 1956 के अनुसार पड़ोसी राज्यों के कुछ बांग्लाभाषी क्षेत्रों को भी पश्चिम बंगाल में मिला दिया गया.बाद में बिहार का कुछ हिस्सा भी इसमें शामिल किया गया.
1967 और 1980 बंगाल के लिए हिंसक इन्ही सालों में नक्सलवादी आंदोलन, बिजली के गंभीर संकट,और चेचक के प्रकोप जैसे संकटों के बीच राज्य में आर्थिक गतिविधियाँ थमी सी रहीं. बंगाल में 1967 तक तो कांग्रेस का शासन रहा. 1968 से मार्च 1972 तक एक साल राज्य में राष्ट्रपति शासन जरूर रहा लेकिन बीच बीच सरकार बनती और बिगड़ती रही .
वर्ष 1972 के मार्च में इंदिरा गांधी के चहेते और बांग्लादेश के निर्माण काल के दौरान उनके सहयोगी रहे सिद्धार्थ शंकर रे ने सत्ता संभाली जो आपातकाल के दौरान और उसके बाद चुनाव होने तक सत्ता में रही.
जून 1977 के आपातकाल के बाद देश में परिवर्तन की लहर चली तो पश्चिम बंगाल में भी सत्ता का परिवर्तन हुआ और मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के नेतृत्व वाली सराकर बनी 1947 से 1977 तक राज्य में कुल सात मुख्यमंत्री बदले और तीन बार राष्ट्रपति शासन रहा वहीं 1977 से 2011 तक वाममोर्चा के सिर्फ़ दो मुख्यमंत्रियों ने कामकाज भी संभाला.
पहले ज्योति बसु 21 जून 1977 से छह नवंबर 2000 तक मुख्यमंत्री रहे फिर अपनी उम्र का हवाला देते हुए जब वे मुख्यमंत्री पद से हटे तो बुद्धदेब भट्टाचार्य ने कमान संभाली और 2011 के मई में विधानसभा चुनाव तक पद पर बने हुए हैं.
इस बीच केंद्र में 1996 में यूनाइटेड फ़्रंट की सरकार बनी तो ज्योति बसु को प्रधानमंत्री बनने का प्रस्ताव मिला लेकिन मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी ने इस प्रस्ताव को ठुकरा दिया और अब तक अफ़सोस करती है.

