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Bengal Politics Exposed: क्यों BJP अब तक नहीं बना पाई सरकार?

Tuesday, April 14, 2026 | Tuesday, April 14, 2026 WIB

 जिस पश्चिम बंगाल में बीजेपी आज तक अपनी सरकार नही बना पाई, जहाँ सत्ता की चाभी हमेशा तुस्टीकरण की तिजोरी में बंद रही, आज उसी बंगाल की धरती पर  बीजेपी ने एक ऐसी लकीर खींच दी है जिसने देश की राजनीति में भूचाल ला दिया है। गृहमंत्री Amit Shah का UCC वाला अल्टीमेटम सिर्फ एक चुनावी वादा नहीं है…ये उस तुष्टिकरण की राजनीति के ताबूत पर आखिरी कील है—जो बंगाल को एक नए बंटवारे की ओर धकेल रही है ...आखिर क्यों वोटिंग से ठीक पहले अमित शाह ने 6 महीने की डेडलाइन तय की? क्या बंगाल भारत का अगला उत्तराखंड बनने जा रहा है? .चलिए समझते है इस एक विडियो में ?  

 




इतिहास गवाह है... बंगाल ने धर्म के नाम पर खुद के टुकड़े होते हुए देखे हैं। फिर चाहे आजादी से पहले की 'डायरेक्ट एक्शन डे' की हिंसा हो या आजादी के बाद  घुसपैठ..से बंगाल की बदलती डेमोग्राफी... आंकड़े गवाह हैं—की 1951 में जो  हिंदू आबादी करीब 78% थी, 2011 तक घटकर 70.5% ही रह गई, जबकि मुस्लिम आबादी 20% से बढ़कर 27% के पार पहुँच गई। ..... आज हालत ऐसे की बंगाल के कुछ इलाकों में 'गजवा-ए-हिंद' के नारे सुनाई देते हैं, तो कही नई 'बाबरी मस्जिद' बनाने की कसमें खाई जाती हैं। ...तो सवाल ये है कि क्या बंगाल में मुख्यमंत्री की कुर्सी का रास्ता सिर्फ 'मुस्लिम तुष्टिकरण' से होकर गुजरता है? क्या वहां का बहुसंख्यक समाज अपने ही राज्य में हाशिए पर धकेल दिया गया है? ..


आज के बंगाल में 'जन-तंत्र' से ज्यादा 'घुसपैठ-तंत्र' हावी दिखता है। मालदा में ड्यूटी पर तैनात 7 न्यायिक अधिकारियों को, 9 घंटे तक बंधक बनाया गया। सुप्रीम कोर्ट ने इसे 'सोची-समझी साजिश' करार देते हुए NIA जांच के आदेश दिए।..दशकों तक वामपंथियों  पर घुसपैठियों को 'सुरक्षित आश्रय' देने के आरोप लगे , लेकिन जब 2011 में ममता बनर्जी 34 साल के कम्युनिस्ट शासन को उखाड़ कर सत्ता में आई , तो लगा की  'मा-माटी-मानुष' की बात होगी। लेकिन सत्ता की मजबूरी कहें या रणनीति—ममता बनर्जी ने उसी तुष्टिकरण की आग को हवा दी जिसने बंगाल को मजहबी राजनीति का केंद्र बना दिया। इमामों को वजीफा देना हो या दुर्गा पूजा के विसर्जन पर पाबंदी—ममता सरकार पर सीधा आरोप लगा कि उन्होंने 'वोट बैंक' की खातिर बंगाल की संस्कृति से समझौता कर लिया ....


लेकिन अब कहानी पलट चुकी है । जिस बंगाल में 'घुसपैठ' को राजनीतिक ऑक्सीजन माना जाता था, वहां चुनाव आयोग ने करीब 91 लाख संदिग्ध नामों को वोटर लिस्ट से हटा दिया है। दवा है की इनमे से ज्यादतर वही नाम थे जो...घुसपैठ के जरिये भारत आये और यहाँ के वोटर बन गए ..बीजेपी कहती है कि ये वो 'इलेक्टोरल टूल' थे जिन्हें घुसपैठ के रास्ते सत्ता का रास्ता साफ करने के लिए पाला गया था। तो क्या एक साथ इतनी बड़ी संख्येया में वोट काटने जाना मुस्लिम तुष्टिकरण की उस कहानी का अंत है जो घुसपैठ के रास्ते लिखी गई थी? बीजेपी आज इसी बिसात पर अपनी जीत का रास्ता देख रही है।


 बीजेपी हर हाल में यहाँ सरकार बनाना चाहती है ताकि उस 'पैरेलल सिस्टम' को ध्वस्त किया जा सके जहाँ शरीयत और मजहबी कानून को भारत के संविधान से ऊपर रखा गया है। अमित शाह का UCC कार्ड दरअसल उस तुष्टिकरण के इंजन को हमेशा के लिए बंद करने की एक 'फाइनल सर्जिकल स्ट्राइक' है। आज जब 91 लाख वोटर्स के नाम कटे हैं, तो सबसे ज्यादा शोर उन्हीं इलाकों से आ रहा है।  जहाँ घुसपैठ की आशंका सबसे ज्यादा थी . अब  सवाल ये है कि क्या ये 'Genuine' वोटर्स थे या तुष्टिकरण की राजनीति के तहत बनाए गए 'इलेक्टोरल टूल'? 


बीजेपी के लिए बंगाल सिर्फ एक राज्य नहीं, जनसंघ के संस्थापक श्यामा प्रसाद मुखर्जी इसी मिट्टी के लाल थे। जिस बंगाल की माटी से डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने नारा दिया था—'एक देश में दो विधान, दो प्रधान और दो निशान नहीं चलेंगे', आज उसी बंगाल में बीजेपी अपनी विचारधारा की सबसे निर्णायक जंग लड़ रही है। विडंबना देखिए, जिस पार्टी की जड़ें बंगाल से जुडी है .. उसे यहाँ पैर जमाने में 70 साल लग गए।


1980 से 2010: तक बीजेपी बंगाल में सिर्फ एक 'नाम' थी। 2019: 18 लोकसभा सीटें जीतकर बीजेपी ने सबको चौंकाया।  2021 में 3 सीटों से सीधा 77 सीटों पर पहुँचकर बीजेपी ममता बनर्जी की नीद उड़ा दी ...बीजेपी का उदय बंगाल में 'हिंदू अस्मिता' और 'तुष्टिकरण के खिलाफ गुस्से' की लहर पर सवार होकर हुआ है। आज बीजेपी के लिए बंगाल जीतना मोदी-शाह के उस संकल्प को पूरा करना है जो कभी श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने देखा था।


अमित शाह ने बंगाल की धरती से 6 महीने का अल्टीमेटम दिया है।  की सत्ता में आते ही 6 महीने के भीटर ucc लागु किया जायेगा .. UCC यानी समान नागरिक संहिता। वही कानून जिसे कुछ लोग धरम विरोधी कानून कहते है . ये सिर्फ कानून नहीं, ये उस 'पैरेलल सिस्टम' पर प्रहार है जहाँ मजहबी कानून संविधान से ऊपर माने जाते हैं। क्या मुस्लिम तुष्टिकरण की राजनीति के बिना बंगाल में सीएम बनना मुमकिन है? बीजेपी का दांव साफ है—बहुसंख्यक समाज का एकीकरण और तुष्टिकरण के इंजनों को हमेशा के लिए बंद करना। 91 लाख वोटर्स का कटना, UCC की दस्तक और बदलती डेमोग्राफी—बंगाल आज एक ज्वालामुखी पर खड़ा है। क्या 2026 में बंगाल उस तुष्टिकरण की बेड़ियों को तोड़ पाएगा जिसने इसे दशकों तक जकड़े रखा? या फिर सत्ता का संघर्ष एक नए विवाद को जन्म देगा?  



  

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