यूपी में सीएम योगी आदित्यनाथ का बुलडोज़र मॉडल पिछले कई सालों से चर्चा में है। असम में हिमंत बिस्व सरमा वर्षों से घुसपैठियों के खिलाफ "डिटेक्ट, डिलीट, डिपोर्ट" मॉडल पर काम कर रहे हैं। और अब,पश्चिम बंगाल में बीजेपी के सात्ता में आते ही ..कोलकाता एयरपोर्ट की 136 साल पुरानी मस्जिद में एंट्री पर रोक लगा दी गयी है। तो क्या पश्चिम बंगाल की सुवेंदु सरकार भी वही स्क्रिप्ट .लिख रही है... जो यूपी में योगी आदित्यनाथ और असम हिमंत बिस्व सरमा पहले से लागू कर चुके हैं?.. ..... या फिर कहानी कुछ और है सवाल सिर्फ़ एक मस्जिद का नहीं है। सवाल यह है कि आखिर ऐसा क्या बदल गया... कि जिस मस्जिद में दशकों तक लोग नवाज पढ़ते रहे वहां अब अचानक एंट्री पर रोक लगा दी गई? ...
क्या यह फैसला केवल सुरक्षा से जुड़ा है? या फिर यह बीजेपी सरकार की उस सोच का हिस्सा है, जिसके संकेत पश्चिम बंगाल में सरकार बदलने के बाद लगातार दिखाई दे रहे हैं? चलिए इस रिपोर्ट में समझते है ...
आज़ादी लगभग 79 साल बाद जब पश्चिम बंगाल में पहली बार बीजेपी की सरकार बनी.... तो पश्चिम बंगाल में सिर्फ सरकार नहीं बदली ..उसके साथ ही तुस्टीकरण का वो किला भी धरासायी हो गाया ...जो बंगाल को धीरे धीरे खोखला कर रहा था ...लेकिन मुख्यमंत्री बनाने के दो महीने बाद .. सीएम सुबेंदु ने जो किया .... उसने पश्चीम बंगाल से लेकर .. दिल्ली तक .एक नयी सियासी हलचल बढ़ा दी .. सरकार बनते है ..सबसे पहले सुबेंदु सरकार ने "डिटेक्ट, डिलीट, डिपोर्ट" नीति का ऐलान किया। फिर 8,000 से ज़्यादा मदरसों की जाँच के आदेश दे दिए . सभी जिलों में होल्डिंग सेंटर बनाने की तैयारी शुरू की और अब सरकार बानने के सिर्फ़ दो महीने के भीतर...कोलकाता एयरपोर्ट की 136 साल पुरानी बांकड़ा मस्जिद में एंट्री पर रोक लगा दी गई। वैसे तो यह फैसला सीधे राज्य सरकार का नहीं, है बल्कि एयरपोर्ट अथॉरिटी और सिविल एविएशन सिक्योरिटी ने सुरक्षा कारणों से लिया — लेकिन यह रोक तभी लगी जब .बंगाल में बीजेपी सरकार बनी... . ....
बस... यहीं से पूरे देश में एक नई सियासी बहस शुरू हो गई। बहस इस बात की क्या यह वाकई सिर्फ़ एक मस्जिद की कहानी है... या फिर..इसके पीछे उससे भी कहीं बड़ा प्लान है? इसी सवाल का जवाब समझने के लिए... सबसे पहले हमें जानना होगा... की आखिर 136 साल पुरानी इस मस्जिद में अचानक एंट्री रोकने की नौबत क्यों आई? ....... दरसल यह मस्जिद नेताजी सुभाष चंद्र बोस अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे के बेहद Sensitive Zone करीब है। जिस पर एविएशन सिक्योरिटी (Aviation Security) और एयरपोर्ट अथॉरिटी ऑफ इंडिया (AAI) ने पिछले कई सालों में कई बार इस बात को लेकर चिंता जताई थी। सुरक्षा एजेंसियों का तर्क था कि ऐसे क्षेत्र में अनियंत्रित सार्वजनिक आवाजाही जोखिम पैदा कर सकती है।,,,, और इसी की बाद जुलाई २०२६ में यहाँ एंट्री पर रोक लगा दी गयी .
पिछली सरकारों के दौरान 'वोटबैंक' और 'तुष्टिकरण' की राजनीति के चलते, सुरक्षा एजेंसियों की इन चेतावनियों को ठंडे बस्ते में डाल दिया जाता था। दशकों तक यथास्थिति बनी रही, क्योंकि किसी भी सरकार में इतना राजनीतिक साहस नहीं था कि वह एक धर्म विशेष की नाराजगी मोल ले सके।लेकिन जैसे ही राज्य में सुवेंदु अधिकारी के नेतृत्व में बीजेपी की सरकार आई, केंद्र और राज्य की एजेंसियों के बीच तालमेल का एक नया अध्याय शुरू हुआ। एयरपोर्ट अथॉरिटी और सुरक्षा एजेंसियों (CISF) ने अपने सुरक्षा प्रोटोकॉल को सख्ती से लागू करने का फैसला किया। और इस बार... राज्य सरकार की ओर से उन्हें रोकने वाला कोई नहीं था। नतीजा? 136 साल पुरानी इस मस्जिद के रास्तों पर बैरिकेडिंग कर दी गई और आम लोगों की एंट्री पर ब्रेक लग गया।.....
भले ही यह सीधे तौर पर राज्य सरकार का आदेश न हो, लेकिन इसका संदेश बहुत साफ और लाउड है। सुवेंदु सरकार यह बताने की कोशिश कर रही है कि बंगाल में अब कानून और सुरक्षा के नियम सबके लिए बराबर हैं। इसे यूपी के सीएम योगी आदित्यनाथ के 'बुलडोजर मॉडल' और असम के सीएम हिमंत बिस्व सरमा के 'कठोर फैसलों' का ही बंगाली वर्ज़न कहा जा रहा है।
मदरसों की सख्त जांच, होल्डिंग सेंटर्स की तैयारी, "डिटेक्ट, डिलीट, डिपोर्ट" का ऐलान और अब मस्जिद की एंट्री पर यह सख्ती—ये तमाम कदम इस बात की गवाही दे रहे हैं कि बीजेपी बंगाल में अपने 'ज़ीरो टॉलरेंस' और 'राष्ट्रवाद' के एजेंडे को बिना किसी हिचकिचाहट के लागू कर रही है। लेकिन बड़ा सवाल यह है कि... दशकों से तुष्टिकरण की राजनीति के साये में पले-बढ़े बंगाल में, क्या बीजेपी का यह आक्रामक 'यूपी-असम मॉडल' आसानी से ज़मीन पर उतर पाएगा? या फिर आने वाले दिनों में यह बंगाल की सड़कों पर एक नए और भयंकर सियासी संग्राम की नींव रखेगा? आपकी अपनी राय क्या है .. हमें लिखकर बता सकते है .. ब्यूरो रीप्र्ट nio टाइम्स

