चंद्रशेखर आजाद,पूरा नाम चनद्रशेखर तिवारी, आज से ठीक 90 साल पहले, 27 फरवरी 1931 को देश के लिए शहीद हुए थे । पूरी दुनिया उन्हें 'आजाद' के नाम से जानती है।
बात सन 1925 की है. जब पैसेंजर गाड़ी को लूटनें के लिए रामप्रसाद बिस्मिल, मुरारी लाल, मुकुन्दी लाल, केशव चक्रवर्ती, बनवारी लाल, मन्मथ नाथ गुप्त और चंद्रशेखर आज़ाद पैसेंजर ट्रेन में सवार हुए. जैसे ही शाम का अन्धेरा हुआ गाड़ी की ज़ंजीर खींचीकर उसे रोक दिया गया और गाड़ी में रखी तिजोरी को लूट लिया गया ट्रेन में हुई इस डकैती से ब्रिटिश शासन बौखला गया.
डकैती के 47 दिन बाद यानी 26 सितंबर, 1925 को, उत्तर प्रदेश के कई जगहों पर गिरफ़्तारियाँ की गईं. इनमें से चार लोगों को फ़ाँसी पर चढ़ा दिया गया, चार को कालापानी में उम्र क़ैद की सज़ा सुनाई गई और 17 लोगों को लंबी क़ैद की सज़ा सुनाई गई. सिर्फ़ चंद्रशेखर आज़ाद और कुंदन लाल ही पुलिस के हाथ नहीं लगे.
आज़ाद की ये आदत थी कि जब भी उनका कोई ऐसा साथी पकड़ा जाता, तो वे अपने रहने की जगह तुरंत बदल देते थे और ज़रूरत हुई तो अपना शहर भी. शायद यही वजह थी कि लोगों मुखबिरी के बावजूद भी पुलिस बरसों तक उनको नहीं ढूंढ़ पाई.
27 फ़रवरी, 1931 को आज़ाद अपने साथी सुखदेवराज के साथ इलाहाबाद के एल्फ़्रेड पार्क में बैठे बात कर रहे थे तभी सामने से कुछ अंग्रेज़ अफ़सर उनकी ओर आ रहे थे, अंग्रेज अफ़सर हाथ में पिस्तौल लिए सीधा आजाद की तरफ बढ़ रहा था अंग्रेज ने आजाद से पूछ 'तुम लोग कौन हो और यहाँ क्या कर रहे हो?'
सुखदेवराज अपनी पुस्तक में लिखते हैं ''उसके सवाल का जवाब हमनें गोली चलाकर दिया. मगर गोरे अफ़सर की पिस्तौल पहले चली और उसकी गोली आज़ाद की जाँघ में लगी, वहीं आज़ाद की गोली गोरे अफ़सर के कंधे में जाकर धस गई . दोनों तरफ़ से दनादन गोलियाँ चल रही थीं.हमनेंजामुन के पेड़ को आड़ बनाया. आज़ाद ने मुझसे कहा मेरी जाँघ में गोली लग गई है. तुम यहाँ से निकल जाओ.'
सुखदेवराज आगे लिखते हैं, 'आज़ाद के आदेश पर मैंने निकल भागने का रास्ता देखा. बाईं ओर एक समर हाउस था. पेड़ की ओट से निकलकर मैं समर हाउस की तरफ़ दौड़ा. मेरे ऊपर कई गोलियाँ चलाई गईं, लेकिन मुझे एक भी गोली नहीं लगी.
