सोचिए आप गहरी नींद में और आपके नीचे से जमीन ही गायब हो जाए. अचानक से सैकड़ों घरों में दरारे आईं.और जमीन में घर धसने लगे. जहां आपका बेड रूम है वहां अचानक से जमीन फट जाए औऱ नदी बहने लगी. उत्तराखंड के जोशीमठ में जो हो रहा है लोगों के अंदर इतना ज्यादा खौफ भर गया है कि लोगों के जहन में 2013 की तबाही वाली तस्वीरे घूमने लगी है. बिगड़ते हालातों को देकते हुए एशिया के सबसे लंबे रोप-वे को बंद कर दिया गया है. लोग अपनी जान बचाकर दूसरी जगह जा रहे हैं. 22 हजार से ज्यादा लोगों की जान खतरे में हैं. लेकिन ऐसे हालत क्यों हुए और इस हालत का जिम्मेदार कौन है. इसकी पूरी कहानी आपको बताते हैं.
उत्तराखंड में जोशीमठ मोरेन पर बसा हुआ शहर है. दावा किया जाता है कई सौ साल पहले जब यहां ग्लेशियर था, उसके ऊपर जो रेत, मिट्टी और पत्थर होते हैं उस मलबे को हम मोरेन कहते हैं. ग्लेशियर पिघल कर पीछे हट गया और वो मलबे का जो पहाड़ है उसमें आने वाले दिनों में यहां जोशीमठ शहर बस गया. जोशीमठ शहर के नीचे एक तरफ अलकनंदा तो दूसरी तरफ धौली गंगा बह रही है. दोनों ही लगातार नीचे से जमीन काट रही हैं. लेकिन पिछले कुछ दिनों से यहां कई सुरेंगे खोदी गई. यहां के लोगों ने इसका विरोध किया लेकिन उनकी नहीं सुनी गई. यहां के लोगों को पता था की आज नहीं को कल ऐसा हालत बन सकते हैं और वही हुआ.
जोशीमठ में सिर्फ देश ही नहीं बल्कि दुनियाभर के टूरिस्ट आते हैं, वैली ऑफ फ्लावर्स भी यही है. इसके अलावा हेमकुंड साहिब जो सिखों का पवित्र तीर्थ है और बद्रीनाथ के लिए यहां लोग आते हैं. ये नैचुरली एक एंट्री पॉइंट है, टूरिजम और ऐडवेंचर स्पोर्ट्स के लिए. जोशीमठ में अचानक से घर क्यों धंसने लगे और महाप्रलय की आहट क्यों दिखने लगी इसकी वजह आपको बताते हैं. उत्तराखंड सरकार यहां पर बड़े-बड़े प्रोजेक्ट लेकर आई ताकि ज्यादा पर्यटक यहां आए और पैसा ज्यादा कमाया जा सके. एक जेपी का प्रोजेक्ट है, एक एनटीपीसी का प्रोजेक्ट है. इन दोनों प्रोजेक्ट का असर जोशीमठ पहाड में हुआ है. पिछले कुछ साल के अंदर ही पूरे पहाड़ को खोखला कर दिया है.
1976 मिश्रा कमेटी की पहली रिपोर्ट आई थी तब पहली बार कहा गया था की जोशीमठ में तोड़फोड नहीं करना चाहिए. पिछले साल दो कमेटियों ने अपनी ब्रीफ रिपोर्ट दी थी. एक रिपोर्ट जाने-माने जियोलॉजिस्ट डॉक्टर नवीन जुयाल की कमेटी की थी. दूसरी कमेटी खुद सरकार के डिजास्टर मैनेजमेंट की थी. दोनों रिपोर्ट को देखने से साफ पता चलता है कि उन्होंने यहां पर कंस्ट्रक्शन के खिलाफ अपनी राय दी थी. लेकिन इसके बाद भी सरकार ने कोई रोक नहीं लगाई.
वीओ: उत्तराखंड सरकार इसे प्राक्रतिक आपदा बताकर खुद को नहीं बचा सकती है. 2013 में उत्तराखंड तबाही देख चुका हैं..लेकिन उससे बाद भी प्रकृति के साथ छेड़छाड होता रहा. सरकार की पनाह में पहाडों को काटा जा रहा है..सिर्फ जोशीमठ ही नहीं ऐसा ही हालत और भी कई जगहों के हैं. जोशीमठ से लोगों को हटाया जा रहा है..ज्यादातर परिवार बेघर होने की कगार पर है..एक घर बसाने में लोगों को जिंदगी गुजर जाती है लेकिन पूरा का पूरा ये शहर खतरे में हैं...सवाल ये भी है कि क्या जोशीमठ में रहने वाले परिवारों को नया घर सरकार देगी या फिर ये परिवार बेघर जोकर जिंदगी भर अपने हक की लड़ाई ही लड़ते रहेंगे.

